मोदी राज में नौकरियों का क्यों है इतना बुरा हाल

Tuesday, July 11th, 2017, 5:59 pm

भारत के आईटी सेक्टर ने साल 2016-2017 में 8. 6 प्रतिशत की विकास दर हासिल की मगर इस दौरान नौकरियों की दर सिर्फ़ 5 प्रतिशत ही रही. ये सरकारी आंकड़े हैं.

अनुमान लगाए जा रहे हैं कि अगले तीन सालों के दौरान इस क्षेत्र में नौकरियों में 20 से 25 प्रतिशत तक की गिरावट देखी जा सकती है.

हाल के दिनों में आईटी क्षेत्र की जिन बड़ी कंपनियों में छंटनी देखी गई, उनमें इन्फ़ोसिस, कॉग्निजेंट और विप्रो जैसे नाम हैं.

भारत सरकार द्वारा किए गए रोज़गार और बेरोज़गारी संबंधी सर्वेक्षण के अनुसार केवल पचास प्रतिशत कामगारों की ही रोज़गार में भागेदारी है.

जबकि हर वर्ष 1.20 करोड़ युवक और युवतियां डिग्रियां लेकर रोज़गार के बाज़ार में आते हैं, मगर नौकरियां नहीं हैं.

भारतीय मज़दूर

वित्त मंत्रालय

निजी क्षेत्र हो या फिर सरकारी. रिक्त पद तो हैं मगर उनपर बहाली रुकी हुई है.

इस बीच इसी साल अप्रैल माह में भारत सरकार के वित्त मंत्रालय ने एक अध्यादेश जारी कर कहा है कि पिछले दो तीन सालों के विभिन्न मंत्रालयों के विभागों में जो पद रिक्त पड़े हुए हैं उन्हें निरस्त किया जाता है.

ऐसी कई लड़कियां हैं जिन्होंने अच्छी पढ़ाई की और अब दूसरों के लिए उदाहरण बन रही हैं.

कई विभाग ऐसे हैं जहां पिछले कई सालों से रिक्तियां भरी नहीं जा रही थीं. हालांकि उनके भरने के लिए हर साल विज्ञापन जारी किए जाते रहे हैं. अब वित्त मंत्रालय के नए अध्यादेश के बाद ये पद ही समाप्त किए जा रहे हैं.

सिर्फ़ मंत्रालयों के विभागों की ही बात नहीं है. न्यायपालिका में भी जजों की रिक्तियों को कई सालों से भरा नहीं जा रहा है.

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सरकारी आदेश

मज़दूर संगठनों ने बढ़ती बेरोज़गारी के बीच खाली पड़े पदों पर सरकार को आड़े हाथों लिया है.

संघ परिवार से सम्बद्ध भारतीय मज़दूर संघ यानी बीएमएस का कहना है कि मौजूदा रिक्तियों को ख़त्म कर सरकार उन्ही पदों पर ठेके पर बहालियां कर रही है.

बीएमएस के महासचिव बृजेश उपाध्याय कहते हैं, ”खाली पदों को ख़त्म करने का फ़ैसला बहुत पहले से चला आ रहा है. चाहे वो यूपीए का दौर हो या एनडीए का. हर साल खाली पड़े पदों को सरकारें ख़त्म करती चली आ रही हैं.”

उपाध्याय कहते हैं, “जो थोड़ी बहुत रिक्तियां कहीं कहीं बची हुई भी थीं वो भी हाल के सरकारी आदेश के बाद निरस्त हो गई हैं. थोक के भाव पर सब रिक्तियां ख़त्म. वास्तव में नियमित बहालियों के स्वरूप को बदलकर सरकार ने ठेकेदारी प्रथा शुरू कर दी है.”

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रेलवे में खाली पद

बीएमएस का कहना है कि सरकारी और ग़ैर सरकारी प्रतिष्ठानों में लगभग 67 प्रतिशत नौकरियां पूरी तरह से ठेकेदारी पर आधारित हो गई हैं.

उपाध्याय कहते हैं, “क़ानून बनाने वाली एजेंसी भी सरकार है और क़ानून तोड़ने वाली सबसे बड़ी एजेंसी भी सरकार ही है. क़ानून कहता है कि नियमित स्वरूप के कामों को नियमित कर्मचारियों द्वारा ही किया जाना चाहिए. अगर कोई इस क़ानून को तोड़ता है तो सरकार उसको दंडित करती है. अब सरकार खुद ऐसा ही कर रही है.”

नियमित प्रारूप के कामों में भारतीय रेल का भी नाम है जहां भी बड़े पैमाने पर मौजूद रिक्तियों को ख़त्म किया जा रहा है. मज़दूर यूनियन भी इस मुद्दे को लेकर पिछले कई सालों से संघर्ष करते आ रहे हैं.

‘ऑल इण्डिया रेलवेमेन्स फ़ेडरेशन’ यानी एआईआरएफ़ के शिव गोपाल मिश्रा का कहना है भारतीय रेल के विभिन्न विभागों में 2.5 लाख रिक्तियां हैं जिन्हें भरा नहीं जा रहा है.

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लोकसभा में उठा सवाल

मिश्रा केंद्रीय मज़दूर संगठनों के संयोजक भी हैं. वो कहते हैं कि केंद्र सरकार के विभिन्न मंत्रालयों के अधीन विभागों में 46 लाख कर्मचारी होने चाहिए जबकि उनकी संख्या 32 से 33 लाख के बीच रह गई है. यानी लगभग 13 से 14 लाख पद रिक्त पड़े हुए हैं.

कार्मिक, जन शिकायत और पेंशन राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में कहा था कि लोक सेवा में भी काफी रिक्तियां हैं जिसमे आईएएस, आईपीएस और वन सेवा के पद शामिल हैं.

उन्होंने बताया कि जहां देश भर में 1470 पद रिक्त हैं वहीं आईपीएस अफसरों के 908 पद खाली पड़े हुए हैं. प्रश्न का जवाब देते हुए जितेंद्र सिंह का कहना था कि सबसे ज़्यादा आईएएस के 128 रिक्त पद बिहार में हैं, उत्तर प्रदेश में 117 और पश्चिम बंगाल में 101.

उसी तरह आईपीएस के पदों में सबसे ज़्यादा 114 पद उत्तर प्रदेश में रिक्त हैं जबकि 88 पद पश्चिम बंगाल, 79 ओडिशा में और 72 कर्नाटक में. बिहार में भी आईपीएस के 43 पद रिक्त पड़े हुए हैं.

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सरकारी नौकरियां

इससे पहले संसद की एक स्थायी समिति ने संघीय लोक सेवा के अधिकारियों के रिक्त पदों पर अपनी गहरी चिंता जताई है.

इस कमेटी की सिफ़ारिशों के बाद सरकार का कहना है कि पिछले चार सालों से सरकार ने आईएएस, आईपीएस और आईएफ़एस अफ़सरों की रिक्तियों में बढ़ोतरी की है.

सरकार के कार्मिक मंत्रालय का कहना है कि चालू वित्तीय वर्ष में दो लाख नई सरकारी नौकरियां सृजित की जाएंगी.

मगर अप्रैल में वित्त मंत्रालय के अध्यादेश के बाद यह पता नहीं चल पा रहा है कि यह कैसे संभव हो पाएगा.