‘इराक में रहना ख़तरनाक है पर यहां भी तो ग़रीबी जान ले रही थी’

“इराक़ में रहना ख़तरनाक है लेकिन घर पर भी तो ग़रीबी परिवार की जान ही ले रही थी”, इराक़ के मूसल में मारे गए दविंदर सिंह की पत्नी मंजीत कौर के इन शब्दों में उनकी बेबसी साफ झलक रही थी.

52 साल के दविंदर उन 39 भारतीयों में शामिल थे, जिनकी हत्या कथित चरमपंथी संगठन आईएसने इराक के मूसल में कर दी थी.

यादों को आंसुओं में समेटे मंजीत आगे कहती हैं, ” जिस दिन वो जा रहे थे, उस दिन उनकी बहन ने बहुत समझाया कि इराक़ में युद्ध चल रहा है, लेकिन उन्होंने कहा कि चिंता मत करो, कुछ नहीं होगा मुझे.”

इतना कहते ही वो आंखें बंद कर लेती हैं. पलकों से ठोकर खाकर पुरानी यादें समेटे उनके आंसू जमीन पर गिरते हैं और लगता कि उनके तमाम सपने बिखर गए हैं.

मंजीत कौर ने बताया, “वो हमेशा कहते थे कि जहां धमाके और संघर्ष हो रहा है, वो जगह उनसे काफी दूर है और उनके आसपास माहौल ठीक है. जून 2014 में जब उनसे अंतिम बार बात हुई थी तब उनका अपहरण हो चुका था पर उन्होंने हमलोगों को जानकारी नहीं दी. वो हमें परेशान नहीं करना चाहते थे. लेकिन अब वो कुछ नहीं कर सकते हैं.”

दविंदर अपने पैतृक गांव रुड़का कलां में मजदूरी करते थे. वो 200 से 250 रुपए तक एक दिन में कमाते थे लेकिन उन्हें रोज काम नहीं मिलता था.

मंजीत कौर के तीन बच्चे हैं, जिनमें से दो जुड़वा हैं. पेट पालने के लिए मंजीत गांव के एक स्कूल में सिलाई सिखाती हैं. इस काम से वो हर महीने ढाई हज़ार रुपए कमाती हैं.

एक कमरे के जर्जर मकान में रहने वाली मंजीत याद करती हैं, “उन्होंने कहा था कि वो तीन-चार साल के लिए इराक़ जा रहे हैं और वहां से आने के बाद उनका अपना घर होगा.”

“वो इराक जा सकें इसके लिए हमलोगों ने एजेंट को देने के लिए डेढ़ लाख रुपए का कर्ज लिया था. एजेंट ने दावा किया था कि वो इलाका अमरीकी सैनिकों के नियंत्रण में हैं और वहां स्थिति बुरी नहीं है.”

दविंदर 2011 में इराक़ गए थे. उस समय उनका बड़ा बेटा छह साल का था और जुड़वा बच्चे महज आठ महीने के थे.

मंजीत कहती हैं, “अपहरण होने से पहले तक वो हर महीने अपनी कमाई के 25 हजार रुपये में से ज्यादातर भेज देते थे.”

पिछले चार सालों से मंजीत की अपने पति से किसी तरह की बात नहीं हुई पर उनकी आंखों में उनके आने की उम्मीदें बरकार थीं. “जब भी मैं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मिलती थी तो वो हमें उम्मीद नहीं खोने को कहती थीं.”

कुछ महीने पहले सरकार ने उनका डीएनए सैंपल लिया था. वो कहती हैं, “डीएनए लेते वक्त हमलोगों को कुछ नहीं बताया गया था कि वो इसे क्यों ले रहे हैं, पर गांव वाले यह अनुमान लगा रहे थे कि शायद दविंदर वहां बीमार हैं, इसलिए ऐसा किया जा रहा है.”

बच्चे की चाहत

मंगलवार को गांव की कुछ महिलाओं ने जब उन्हें सरकार की ओर से दी गई जानकारी के बारे में बताया तो वो भागती हुई अपने मायके पहुंच गईं. “मैं मौत की बात जानकर हैरान थी. मैं अपने मायके चली आई.”

वो अपने जुड़वा बच्चों में से एक की तरफ देखते हुए कहती हैं, “ये अपने पिता के आने की बात पूछता रहता था और हमलोग हमेशा ये कहते थे कि वो विदेश में रहते हैं. जब वो लौटेंगे तो उनके लिए साइकिल लेकर आएंगे. लेकिन अब वो कभी नहीं आएंगे.”

मूसल में मारे गए 39 लोगों में से 31 पंजाब से थे. बेहतर अवसरों की तलाश में पंजाबियों के विदेश जाने की चाहत जगजाहिर है. राज्य में गरीबी और नौकरियों की कमी के चलते वो युद्ध क्षेत्र में भी जाने से नहीं कतराते हैं.

जाने वालों की मजबूरियां

32 साल के संदीप कुमार का नाम भी उन 39 मृतकों की सूची में शामिल हैं. मल्सियान के नजदीक एक गांव में रहने वाले संदीप भी दिहाड़ी मजदूर थे.

अपनी चार बहनों की परवरिश के लिए वो 2012 में इराक़ गए थे. संदीप के भाई कुलदीप कुमार कहते हैं, “परिवार हर महीने पैसे का इंतजार करता था.”

संदीप के परिवार की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके घर के दरवाजे में किवाड़ तक नहीं हैं.

धूरी के प्रीतपाल शर्मा भी मारे गए 39 लोगों में से एक थे. उनकी पत्नी राज रानी कहती हैं, “वो वहां 2011 में गए थे क्योंकि यहां करने को कुछ नहीं था. हमलोगों को बताया गया था कि इराक़ में बहुत पैसा है लेकिन उन्हें वहां भी कमाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी.”

सेक्स वीडियो पर महिला की खुदकुशी

इटली में एक महिला के सेक्स वीडियो पर खुदकुशी करने के मामले में चार लोगों से पूछताछ की जा रही है.

मंगलवार को 31 साल की तिज़याना कैनटोन ने नेपल्स के नज़दीक म्यूनानो में आत्महत्या कर ली थी.

इस महिला ने महीनों तक अपने सेक्स वीडियो को इंटरनेट से हटाने के लिए लड़ाई लड़ी थी.

ये सेक्स वीडियो उसने अपने पुराने पुरूष मित्र और तीन अन्य लोगों को भेजा था, जिन्होंने इसे ऑनलाइन कर दिया.

उनका वीडियो में कहा शब्द “तुम फ़िल्म बना रहे हो ? ब्रावो”, एक ऑनलाइऩ मज़ाक बन गया.

इसे 10 लाख से अधिक लोगों ने देखा और वह हंसी का पात्र तो बनीं ही, उन पर गालियों की बौछार भी होने लगी.

इस मामले में चार लोगों से महिला की मानहानि करने पर पूछताछ की जा रही है.

सेक्स वीडियो के वायरल होने के बाद तिज़याना ने नौकरी छोड़ दी और जगह बदल दी. यहाँ तक कि वह अपना नाम बदलने की प्रक्रिया में थी ,लेकिन ये कहानी उनका पीछा नहीं छोड़ रही थी.

अदालती मामले में तिज़याना ने ” राइट टू बी फॉरगोटन (भुला दिए जाने का अधिकार)” के तहत ये केस जीता और अदालत ने फेसबुक सहित वीडियो को कई साइट्स और सर्च इंजनों से हटाने का आदेश दिया.

उन्हें मुकदमे की फीस के बीस हजार यूरो अदा करने को भी कहा गया, जिसे स्थानीय मीडिया में ” आखिरी अपमान” कहा गया है.

इटली के प्रधानमंत्री मैटियो रेंजी ने कहा,” एक सरकार के तौर पर हम अधिक नहीं कर सकते हैं. ” यह विशेषतः एक सांस्कृतिक लड़ाई है- एक सामाजिक और राजनीतिक लड़ाई भी. हमारी प्रतिबद्धता जो भी हम कर सकते हैं वह करने के प्रयास की है… महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा ख़त्म न होने वाली घटना नहीं है.”

उनकी शवयात्रा का सीधा प्रसारण किया गया था.

रोहिंग्या संकट: मुझे नहीं पता था कि मेरे साथ रेप करेंगे

बांग्लादेश के रोहिंग्या शरणार्थी कैंपों से वेश्यावृत्ति के लिए किशोरावस्था में लड़कियों की तस्करी की गई.

इन कैंपों से विदेशियों को आसानी से सेक्स मुहैया कराया जा रहा है. ये लड़कियां म्यांमार में जारी संघर्ष से जान बचाकर अपने परिवार के साथ बांग्लादेश भागकर आई हैं.

अनवरा की उम्र 14 साल हो रही है. म्यांमार में अपने परिवार के मारे जाने के बाद वो बांग्लादेश आ गई थी. वो मदद के लिए बांग्लादेश की सड़क पर भटक रही थी. अनवरा ने कहा, ”एक वैन से महिलाएं आईं. उन्होंने मुझसे साथ आने के लिए कहा.”

मदद स्वीकार लेने के बाद उसे कार में गठरी की तरह डाला दिया गया. अनवरा से सुरक्षित और नई ज़िंदगी का वादा किया गया था. अनवरा को पास के शहर के बजाय कॉक्स बाज़ार ले जाया गया.”

अनवरा ने कहा, ”कुछ ही समय में मेरे पास दो लड़कों को लाया गया. उन्होंने मुझे चाक़ू दिखाकर मेरे पेट पर घूंसा मारा. मेरी पिटाई की गई क्योंकि मैं उन्हें सहयोग नहीं कर रही था. इसके बाद दोनों लड़कों ने मेरे साथ रेप किया. मैं उनके साथ संबंध नहीं बनाना चाहती थी, लेकिन मेरे साथ रेप कभी थमा नहीं.”

यहां के आसपास के शरणार्थी कैंपों में वेश्यावृत्ति के लिए तस्करी के क़िस्से आम है. इसमें महिलाएं और बच्चियां मुख्य रूप से पीड़ित हैं. फाउंडेशन सेंटनल एनजीओ के साथ बीबीसी की टीम बाल शोषण के ख़िलाफ़ इन कैंपो में क़ानूनी मदद पहुंचा रही है.

बांग्लादेश की जांच एजेंसी भी पूरे मामले में शामिल नेटवर्क का पता करने की कोशिश कर रही है.

बच्चों और उनके माता-पिता का कहना है कि उन्होंने विदेशों में नौकरी और राजधानी ढाका में मेड और होटल में काम दिलाने की पेशकश की थी.

सेक्स इंडस्ट्री से इन कैंपों से लड़कियों के लाने के लिए बड़े ऑफर दिए जा रहे हैं. लोगों को मुश्किल घड़ी में अच्छी ज़िंदगी देने की बात कही जा रही है और इसी आधार पर वेश्यावृत्ति के लिए तस्करी हो रही है.

मासुदा की उम्र 14 साल हो रही है. अभी उन्हें एक स्थानीय धर्मशाला में मदद के लिए लाया गया है. उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें कैंप से तस्करों के पास पहुँचा दिया गया.

मासुदा ने कहा, ”मुझे नहीं पता था कि मेरे साथ क्या होने जा रहा है. एक महिला ने मुझे नौकरी देने का वादा किया. सभी को पता है कि वो लोगों को सेक्स के लिए लाती है. वो एक रोहिंग्या है और यहां लंबे समय से है. हमलोग उसे जानते हैं. लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था. यहां मेरे लिए कुछ भी नहीं था.”

मासुदा ने कहा, ”मैं अपने परिवार से बिछड़ गई हूं. मेरे पास कोई पैसा नहीं है. मेरे साथ म्यांमार में भी रेप हुआ था. मैं जंगल में अपने भाई और बहन के साथ खेलने जाती थी. अब मुझे नहीं पता है कि कैसे खेला जाता है.”

कई माता-पिता डरे हुए हैं कि वो अपने बच्चों को फिर कभी नहीं देख पाएंगे. वहीं कई लोगों को लगता है कि कैंप से बाहर की जिंदगी बेहतर होगी.

लेकिन इन बच्चों कौन ले जाता है और कहां ले जाता है? हाल ही में बीबीसी की जांच टीम ने कैंपों में लड़कियों तक पहुंचने की कोशिश की. बीबीसी की टीम ने विदेशी बनकर इसे परखने की कोशिश की.

48 घंटों के भीतर यहां हर चीज़ की व्यवस्थ हो गई. पुलिस को बताकर बीबीसी की टीम ने दलालों से विदेशियों के लिए रोहिंग्या लड़कियों को लेकर बात की. इनमें से एक व्यक्ति ने कहा, ”हमलोग के पास कई जवान लड़कियां हैं, लेकिन आपको रोहिंग्या ही क्यों चाहिए? ये तो बिल्कुल गंदी होती हैं.” वेश्यावृत्ति के पेशे में रोहिंग्या लड़कियों को सबसे सुलभ और सस्ता माना जाता है.

एक नेटवर्क में काम करने वाले कई दलालों ने हमें लड़कियों की पेशकश की. बातचीत के दौरान हमने ज़ोर देकर कहा कि हम लड़कियों के साथ तुरंत रात बिताना चाहते हैं.

तुरंत 13 से 17 साल के बीच की लड़कियों की तस्वीरें हमारे सामने आना शुरू हो गईं. नेटवर्क का फैलाव और लड़कियों की संख्या हैरान करने वाली थी.

अगर हमें तस्वीरों में लड़कियां पसंद नहीं आतीं तो वे और तस्वीरें लेकर हाज़िर हो जाते. अधिकतर लड़कियां दलालों के साथ रहती हैं. जब वो किसी ग्राहक के साथ नहीं होती हैं तो वे खाना बना रही होती हैं या झाड़ू-पोंछा लगा रही होती हैं.

हमें बताया गया, ‘हम लड़कियों को लंबे समय तक नहीं रखते. ज़्यादातर बांग्लादेशी मर्द ही यहां आते हैं. कुछ वक्त के बाद ये लोग बोर हो जाते हैं. छोटी उम्र की लड़कियां काफ़ी हंगामा करती हैं इसलिए हम उनसे जल्द ही छुटकारा पा लेते हैं.’

रिकॉर्डिंग और निगरानी के बाद हमने अपने सबूत स्थानीय पुलिस को दिखाए. एक स्टिंग ऑपरेशन के लिए एक छोटी सी टीम बनाई गई.

पुलिस ने तुरंत दलाल को पहचान लिया, “हम उसे अच्छी तरह से जानते हैं.”

ये समझ नहीं आया कि पुलिस वाला क्या कहना चाहता था. शायद वो दलाल ख़बरी था या एक घोषित अपराधी.

स्टिंग की शुरुआत हमने दलाल से उन दो लड़कियों की मांग से की जिनकी तस्वीरें हमें पहले दिखाई गई थीं.

हमने कहा कि लड़कियां कॉक्स बाज़ार के एक मशहूर होटल में शाम आठ बजे पहुंचाई जाएं.

फ़ाउंडेशन सेंटिनेल संस्था के विदेशी सदस्य को अंडरकवर ग्राहक बनाकर, एक अनुवादक के साथ होटल के बाहर खड़ा कर दिया गया.

जैसे ही मिलने का वक्त क़रीब आया, दलाल और अंडरकवर ग्राहक के बीच फ़ोन पर कई बार बातचीत हुई.

दलाल चाहता था कि ग्राहक होटल से बाहर आए. हमने मना कर दिया. दलाल ने दो लड़कियों को एक ड्राइवर के साथ हमारे पास भेजा.

पैसे के लेन-देन के समय हमारे अंडरकवर ग्राहक ने पूछा, “अगर आज सबकुछ ठीक रहा तो क्या आगे भी इसे जारी रख सकते हैं?”

ड्राइवर ने हां में सिर हिलाया.

इसके बाद पुलिस एक्शन में आ गई. ड्राइवर को गिरफ़्तार किया गया. बच्चों के साथ काम करने वाले विशेषज्ञों और मानव-तस्करी के जानकारों की मदद से लड़कियों के रहने के लिए जगह खोजी गई.

एक लड़की ने वहां जाने से मना कर दिया. लेकिन दूसरी मान गई.

लड़कियां ग़रीबी और वेश्यावृत्ति के बीच फंसी हुई थीं. उनका कहना था कि वेश्यावृत्ति के बिना न तो वो अपना पेट भर पाएंगी और न ही अपने परिवार का.

महिलाओं और बच्चों को अंतरराष्ट्रीय सीमा के आर-पार ले जाने के लिए एक नेटवर्क की ज़रूरत होती है.

इसे इंटरनेट पूरा करता है. इंटरनेट के ज़रिए संगठित अपराध के अलग-अलग सदस्य एक दूसरे के संपर्क में रहते हैं और सेक्स बेचने का धंधा भी होता है.

हमने रोहिंग्या बच्चों को बांग्लादेश के ढाका और चटगाँव, नेपाल के काठमांडू और भारत में कोलकाता ले जाए जाने की मिसालें देखीं.

कोलकाता की सेक्स इंडस्ट्री में उन्हें भारतीय पहचान पत्र दिए जाते हैं जिसकी वजह से उनकी असली पहचान ग़ायब हो जाती है.

ढाका में साइबर क्राइम यूनिट ने हमें बताया कि कैसे मानव तस्कर इंटरनेट के ज़रिए लड़कियों को बेचते हैं.

फ़ेसबुक पर बने ग्रुप सेक्स इंडस्ट्री को लुका-छिपे जारी रखने में मददगार साबित होते हैं.

हमें डार्क वेब के बारे में बताया गया जिसपर मौजूद इनक्रिप्टेड वेबसाइट्स इन गोरखधंधों को आसान बना देती हैं.

डार्क वेब पर एक यूज़र ने शरणार्थी संकट में फंसे रोहिंग्या बच्चों से फ़ायदा उठाने के तरीके बताए.

ये यूज़र आगे ये भी बताता है कि इन बच्चों को खोजने की बेहतर जगह कौन सी है.

इस बातचीत को अब सरकार ने इंटरनेट से हटा दिया है. लेकिन इससे हमें पता चलता है कि कैसे शरणार्थी संकट मानव तस्करों और बच्चों का यौन शोषण करने वालों का केंद्र बनते जा रहे हैं.

बांग्लादेश में ऑनलाइन और ऑफ़लाइन दोनों ही तरीकों से, मानव तस्करों का एक जाल फैलता जा रहा है.

रोहिंग्या संकट ने बांग्लादेश में सेक्स इंडस्ट्री शुरू नहीं की लेकिन इस संकट के बाद इसमें भारी इज़ाफ़ा हुआ है.

It will take longer than the age of the universe for fastest computer to decode Aadhaar data, UIDAI CEO tells SC

Aadhaar data is protected by a 2048-bit encryption and “once biometrics comes to us, it will never go away”, says Ajay Bhushan Pandey.

It will take “more than the age of the universe for the fastest computer on earth, or any supercomputer, to break one key of Aadhaar encryption,” according to CEO of Unique Identification Authority of India (UIDAI) Ajay Bhushan Pandey.

Mr. Pandey, who has been steering the Aadhaar project from its beginnings in 2010, was given the unique opportunity to conduct a presentation in a courtroom presided by a five-judge Constitution Bench led by Chief Justice of India Dipak Misra in the Supreme Court on Thursday.

In the hour-long presentation, which would continue on March 27, Mr. Pandey said the Aadhaar data was protected by a 2048-bit encryption and “once biometrics comes to us, it will never go away”.

Recounting his own life experience as a small town person who did not have a photo identity till he joined the Indian Administrative Service in the late 80s, Mr. Pandey said Aadhaar offered the answer to the ancient question, often asked by sages, i.e., “who am I?”

A “portable entitlement” against poverty

He said that for the first time Aadhaar offered the billion plus population of India a “robust, lifetime, nationally online, verifiable identity”. Through a massive exercise that would benefit mankind, India had “leap-frogged” to Aadhaar identity from proxy and local identification mechanisms like ration card. He termed Aadhaar a “portable entitlement” against poverty.

But Justice A.K. Sikri questioned Mr. Pandey’s narrative about the infallibility of Aadhaar, asking why then did the UIDAI blacklist 49,000 registered operators. The CEO replied that these operators were de-registered for corruption, carelessness and harassment of the public. “Some of them used to take money from the public, others would not enter the details properly. We have a zero-tolerance policy,” he said.

Justice Sikri persisted, “It sounds somehow strange that you blacklisted 49,000 of your operators for harassing people.”

Mr. Pandey said, “Initially we trusted these operators, but they ended up registering trees… Jamun trees.”

Mr. Pandey explained that biometric changes could be updated through a process called ‘Aadhaar update’.

Justice Sikri asked, “Aadhaar update can be done if a person knows there is such an option. You have covered a wide area of the country and brought tribal people and those living in the fringes under the Aadhaar regime. They are poor and illiterate. How will they know what to do.”

Justice Chandrachud said that eventually the onus was on the individual to get an Aadhaar update if she wanted to continue receiving her rightful entitlements. He went on to ask whether the UIDAI had any statistics on the number of Aadhaar authentication failures so far.

Other alternatives to biometric authentication

To this, Mr. Pandey referred to the provisions in the Aadhaar (Authentication) Regulations of 2016 to point out that there were other alternatives to biometric authentication like demographics and electronic One Time PIN (OTP).

He said the UIDAI cannot promise 100% authentication everytime. There may be connectivity or other technological issues across India, especially when the scheme covered over 1.2 billion people. “When biometric authentication does not work, we have instructed our officers to check the Aadhaar card and see that the case is genuine. A person should not be denied benefits because there is failure in authentication.”

Aadhaar, he said, was not the solution for a shopkeeper who refused a woman her ration under the PDS despite the successful authentication of her biometrics.

Justice Chandrachud said, “So you say that failure of service because of failure of authentication can be addressed. But failure of service despite authentication needs to be addressed separately.”

Additional Solicitor General Tushar Mehta answered the judge’s question, saying the conduct of the shopkeeper in question was the “failure of honesty”.

कभी कंगना के पैदा होने से नाखुश थे पेरेंट्स, देखें बचपन से अब तक के

मुंबई।एक्ट्रेस कंगना रनोट 31 साल की होने वाली हैं। 23 मार्च, 1987 को हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला के पास स्थित सुरजपूर (भाबंला) में जन्मी कंगना अपने बोल्ड किरदार, बड़बोलेपन, एक्टिंग स्किल्स या फिर पर्सनल लाइफ के चलते हमेशा सुर्खियों में रहती हैं। फिलहाल कंगना पर कॉल डिटेल्स रिकॉर्ड मामले में आरोप लगे हैं। इसके मुताबिक, उन्होंने 2016 में रितिक रोशन का मोबाइल नंबर रिजवान सिद्दीकी से शेयर किया था। कंगना को अनवॉन्टेड चाइल्ड मानते थे पेरेंट्स…

कुछ साल पहले वुमन्स डे के मौके पर दिए इंटरव्यू में कंगना ने बताया था कि जब वे पैदा हुई थीं, तब उनके पेरेंट्स नाखुश थे। दरअसल, जब उनकी बड़ी बहन का जन्म हुआ था तो घरवाले बेहद खुश थे। लेकिन दूसरे बच्चे के तौर पर जब घर में लड़की हुई, तो परिवार वाले नाखुश हो गए। उस दौरान कंगना को अनवॉन्टेड चाइल्ड माना जाता था।
कंगना की फेवरेट हैं उनकी बड़ी बहन…
कंगना के पिता अमरदीप रनोट बिजनेसमैन है और मां आशा रनोट स्कूल में टीचर हैं। उनकी बड़ी बहन रंगोली, उनकी फेवरेट हैं। रंगोली, कंगना की मैनेजर है। एसिड अटैक जैसे दर्दनाक हादसे से गुजरने और नए सिरे से जिंदगी जीने वाली रंगोली की लाइफ पर कंगना बायोपिक बनाने की चाहत भी जाहिर कर चुकी हैं। उनका एक छोटा भाई भी है, जिसका नाम अक्षत है।

– कंगना को शुरु से मॉडलिंग का शौक था। एक्टिंग के लिए वो महज 15 साल की उम्र में बिना परमिशन लिए चंडीगढ़ से दिल्ली आ गईं थीं।
– दिल्ली में इंडिया हैबिटेट सेंटर में काफी मेहनत के बाद एक्टिंग करने को मिला। 5-6 महीने के बाद एक्टिंग वर्कशॉप के अरविंद गौड़ ने कंगना को मौका दिया।
– बैक स्टेज एक्टिंग करते-करते कंगना को एक बार एंकर बनने का मौका मिला। इस एंकरिंग को ही कंगना अपना पहला ब्रेक मानती हैं और इसके बाद वो मुंबई के लिए निकल पड़ी।

– रिपोर्ट्स के मुताबिक कंगना के घर से भागने और फिल्मों में काम करने की वजह से कंगना के पिता ने उनसे सालों तक बात नहीं की थी।
– कंगना ज्योतिष में काफी विश्वास करती हैं। वे जब भी मंडी आती हैं यहां के ज्योतिष लेखराज शर्मा से जरूर मुलाकात करती हैं।

कंगना की बहन रंगोली के मुताबिक, “मुझे याद है, बचपन से उन्हें फैशन के कीड़े ने काट रखा था। भाबंला जैसी छोटी जगह में भी वह पब्लिक जगहों पर अजीबो-गरीब कपड़े पहनती थीं। वह शॉर्ट पेंट्स, व्हाइट शर्ट और हैट पहनकर घूमती थी। छोटी-सी जगह में इस तरह के कपड़े पहनने से लोग सोचते थे कि वह अजीब है। मुझे उसके साथ चलने में शर्मिंदगी महसूस होती थी। तो मैं कंगना के साथ जाना अवॉइड करती थी। उसके ड्रेसिंग की वजह से डैड उसे लेडी डायना बुलाते थे।

कंगना के मुताबिक, ‘बचपन में मैं बहुत आलसी हुआ करती थी। यहां तक कि नहाने में भी आना-कानी किया करती थी। मेरे घर वाले इस आदत से बहुत दुखी थे। अब मैं सोचती हूं कि शायद इसी कारण तब कोई मेरा दोस्त नहीं बना। हालांकि जैसे ही मैंने अपनी सफाई पर ध्यान देना शुरू किया, मेरे जीवन में बहुत कुछ अच्छा होना शुरू हो गया।

कंगना के माता-पिता चाहते थे कि वे डॉक्टर बनें, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। कंगना ने कम उम्र में ही मॉडलिंग की राह अपनाई और दिल्ली में रहकर मशहूर थिएटर डायरेक्टर अरविंद गौड़ से एक्टिंग की ट्रेनिंग ली। वे अरविंद के थिएटर इंडिया हैबिटेट सेंटर का हिस्सा बनीं और कई नाटकों में काम किया। उनका पहला प्ले गिरीश कर्नाड का ‘रक्त कल्याण’ था।

मौत से पहले फोन पर रो-रोकर बेटी ने कही थी मुझसे ये बातें, पिता ने सुनाई आपबीती

नोएडा.टीचर के टॉर्चर और गंदी नीयत से परेशान होकर 9वीं की छात्रा इकिशा शाह ने खुदकुुुशी कर ली। लेकिन उसका परिवार अब भी यह मानने को तैयार नहीं कि उनकी बेटी अब उनके बीच नहीं है। पिता का रो-रो कर बुरा हाल है। वे आरोपी टीचर्स को सलाखों के पीछे देखना चाहते हैं। वहीं, मां का कहना है कि अगर उन्हें इंसाफ नहीं मिला तो पूरे परिवार के साथ आत्महत्या कर लेंगी। आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। मौत से 20 मिनट पहले बेटी ने फोन पर पिता से कही थी ये बातें…

– इकिशा दिल्ली के मयूर विहार स्थित एल्कॉन इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ती थी। उसका परिवार नोएडा सेक्टर-52 में रहता है।
– पिता राघव शाह प्रसिद्ध कथक डांसर और बिरजू महाराज के शिष्य हैं।
– मंगलवार शाम मौत से 20 मिनट पहले इकिशा ने पिता से फोन पर बात कर खुदकुशी कर ली।
– रोते हुए पिता ने बताया- ‘मंगलवार शाम करीब 4.15 मिनट पर मेरी इकिशा से फोन पर बात हुई।’
– ‘पापा कहते ही रोने लगी। कहा- मैंने पूरा कोर्स तैयार कर लिया है।’
– ‘लेकिन ये दोनों बहुत गंदे लोग हैं। मुझे फिर फेल कर देंगे।’
– ‘फोन पर मैं उसे दिलासा देता रहा, बेटी कुछ नहीं हुआ। घर आकर बात करता हूं।’

कमरे का दरवाजा तोड़ा, तो दिखा ऐसा मंजर
– पिता राघव शाह के मुताबिक, जब वे घर पहुंचे तो बेटी के कमरे का दरवाजा अंदर से बंद था।
– ‘मैं बहुत घबराया हुआ था। आवाज लगाने पर भी इकिशा दरवाजा नहीं खोल रही थी।’
– ‘मैंने फिर से आवाज लगाई। फिर दरवाजा तोड़कर भीतर देखा…।’
– ‘वो फंदे से लटकी हुई थी। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि बेटी ने आत्महत्या कर ली है।’
– ‘उसे फौरन फंदे से निकालकर हम पास के अस्पताल पहुंचे। जहां डॉक्टरों ने उसे डेड डिक्लेयर कर दिया।’

आखिर क्या हुआ था इकिशा के साथ, क्यों थी परेशान?
– पिता के मुताबिक, पिछले कुछ समय से इकिशा बहुत परेशान रह रही थी।
– जब उन्होंने बेटी से पूछा- आखिर क्या बात है, तो उसकी बातें सुन पिता हैरान रह गए।
– इकिशा ने स्कूल के ही दो टीचर राजीव सहगल (एसएसटी) और नीरज आनंद (साइंस) पर गंदी नीयत से देखने और छेड़खानी का आरोप लगाया।
– राघव शाह ने बताया, दोनों टीचर अकेले में उसे गंदी नीयत से छूने की कोशिश करते थे।
– ‘मैंने प्रिंसिपल से इसकी शिकायत की। सुनने की बजाए उलटा उन्होंने मुझे बेटी को स्कूल से निकालने की धमकी दे दी।

एक्जाम में किया फेल
– ‘मेरी बेटी पढ़ाई में बहुत अच्छी थी। शिकायत के बाद से ही टीचर उसे परेशान करने लगे।’
– ’16 मार्च को उसका रिजल्ट आया। हैरानी की बात यह है कि उन्हीं दो सब्जेक्ट में इकिशा फेल हुई थी।’
– राघव शाह ने बताया, इसके बाद मैंने प्रिंसिपल से रि-चेकिंग की बात की। पर उन्होंने मुझे अनसुना कर दिया।
– ‘उसी दिन कॉरिडोर में मुझे वो दोनों टीचर मिले। दोनों मुझे देख कर हंस रहे थे।’
– बेटी बैक पेपर की तैयारी में लगी थी। लेकिन मेंटली टॉर्चर्ड महसूस कर रही थी।
– ‘वह बार-बार मुझसे कहती थी कि वो उसे फिर से फेल कर देंगे। मैं ही उसे समझ नहीं पाया।’

Just keep going: Irrfan Khan shares touching post

New Delhi [India], Mar 20 (ANI): National Award winning actor Irrfan Khan, who is suffering from a rare disease, has posted a touching message on social media.

With a photo of his reflection, the ‘Hindi Medium’ star wrote a philosophical quote by Rainer Maria Rilke.

He shared on Instagram, “God speaks to each of us as he makes us, then walks with us silently out of the night. These are the words we dimly hear: You, sent out beyond your recall, go to the limits of your longing. Embody me.n Flare up like a flame and make big shadows I can move in.”

“Let everything happen to you: beauty and terror. Just keep going. No feeling is final. Don’t let yourself lose me. Nearby is the country they call life. You will know it by its seriousness. Give me your hand #rainermariarilke.”

The 51-year-old revealed last week that he is diagnosed with NeuroEndocrine Tumour. The actor is currently in London for his treatment.

irrfanGod speaks to each of us as he makes us,
then walks with us silently out of the night.

These are the words we dimly hear:

You, sent out beyond your recall,
go to the limits of your longing.
Embody me.

Flare up like a flame
and make big shadows I can move in.

Let everything happen to you: beauty and terror.
Just keep going. No feeling is final.

Don’t let yourself lose me.

Nearby is the country they call life.
You will know it by its seriousness.