दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट में इन पदों पर निकली भर्तियां, ऑनलाइन करें आवेदन

नई दिल्‍ली: दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड (DSSSB) ने एलडीसी, फील्‍ड असिस्‍टेंट, फूड सेफ्टी ऑफिसल और लाइब्रेरियन पदों पर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी कर आवेदन आमंत्रित किया है. इच्छुक और योग्य अभ्यर्थी 21 अगस्‍त, 2017 तक आवेदन कर सकते हैं. दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड ने कुल 1074 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मंगाया है. इन पदों पर भर्ती की प्रक्रिया 1 अगस्‍त 2017 से शुरू होगी.

शैक्षणिक योग्यता :
दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड के एलडीसी, फील्‍ड असिस्‍टेंट, फूड सेफ्टी ऑफिसल और लाइब्रेरियन पदों पर भर्ती के लिए अलग अलग योग्‍यता निर्धारित की गई है. इनकी अधिक जानकारी के लिए आप बोर्ड की ऑफिशियल वेबसाइट देखें.

आयु सीमा :
इन पदों पर भर्ती के लिए आवेदक की न्‍यूनतम उम्र अलग-अलग पदों के अनुसार 18/20 साल होनी चाहिए. इसके साथ ही आवेदक की अधिकतम उम्र अलग-अलग पदों के अनुसार 20/30/37 साल से ज्‍यादा नहीं होनी चाहिए.

आवेदन शुल्‍क :
दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड के एलडीसी, फील्‍ड असिस्‍टेंट, फूड सेफ्टी ऑफिसल और लाइब्रेरियन पदों पर आवेदन करने के इच्‍छुक सामान्‍य और ओबीसी वर्ग के आवेदक को 100 रुपये ऑनलाइन माध्‍यम से जमा करना होगा. वहीं एससी/एसटी/पीडब्‍ल्‍यूडी वर्ग के आवेदकों के लिए यह निशुल्‍क होगा.

चयन प्रक्रिया :
दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड के एलडीसी, फील्‍ड असिस्‍टेंट, फूड सेफ्टी ऑफिसल और लाइब्रेरियन पदों पर भर्ती के लिए उम्मीदवारों का चयन परीक्षा और स्‍किल टेस्‍ट के आधार पर किया जाएगा. ऑनलाइन परीक्षा केवल दिल्‍ली में आयोजित की जाएगी.

ऐसे करें आवेदन :
दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड के एलडीसी, फील्‍ड असिस्‍टेंट, फूड सेफ्टी ऑफिसल और लाइब्रेरियन पदों पर भर्ती के लिए इच्‍छुक और योग्‍य उम्मीदवार 21 अगस्‍त, 2017 तक बोर्ड की ऑफिशियल वेबसाइट (www.dsssbonlie.nic.in) पर जाकर दिए गए निर्देशों के अनुसार ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं. इन पदों पर भर्ती के लिए आवेदन प्रक्रिया 1 अगस्‍त 2017 से शुरू होगी. ऑनलाइन आवेदन के बाद आवेदक आगे की चयन प्रक्रिया के लिए फॉर्म का प्रिंटआउट निकाल कर रख लें.

बनना चाहते हैं यूपी पुलिस का सिपाही, तो जान लें बदले हुए नियम

यूपी में अधिकतर युवाओं का सपना होता है कि पुलिस की वर्दी पहनें. अभी तक की प्रक्रिया में वर्तमान की बीजेपी ने सरकार ने कुछ बदलाव किए हैं. उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में पुलिस भर्ती के नियमों में फेरबदल करते हुए आज तय किया कि अब कांस्टेबल की भर्ती के लिए केवल लिखित परीक्षा होगी और उसी के आधार पर चयन होगा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक में यह फैसला किया गया.

बैठक के बाद राज्य सरकार के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा ने कहा, ‘पुलिस भर्ती के कुछ नियम बदले गये हैं. अब पुरूष वर्ग में 18 से 22 वर्ष और महिला वर्ग में 18 से 25 वर्ष आयु के अभ्यर्थी कांस्टेबल पद के लिए आवेदन कर सकते हैं.’ उन्होंने कहा कि पहले दसवीं पास के लिए 100 अंक, 12वीं पास के लिए 200 अंक और शारीरिक दक्षता के लिए 200 अंक जोड़ने की व्यवस्था थी . इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है और अब केवल लिखित परीक्षा होगी . शारीरिक दक्षता परीक्षा भी केवल पास करनी होगी.

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शर्मा ने कहा कि शारीरिक दक्षता के मानक पूर्ववत रहेंगे लेकिन इसके अंक जुडे़ंगे नहीं बल्कि इसे केवल पास करना भर पर्याप्त होगा. लेकिन यदि इसमें फेल हो गये तो भर्ती प्रक्रिया से बाहर होना पडे़गा. उन्होंने बताया कि लिखित परीक्षा में ‘नेगेटिव मार्किंग’ होगी और इसका अनुपात भर्ती बोर्ड तय करेगा. शर्मा ने बताया कि नयी व्यवस्था में 300 अंक के वस्तुनिष्ठ प्रश्न होंगे, जिनमें नेगेटिव अंक की व्यवस्था होगी .

प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद प्रमुख सचिव (गृह) अरविन्द कुमार ने कहा कि शारीरिक दक्षता परीक्षा में दौड़ के मानक अब पहले से कडे़ कर दिये गये हैं. पुरूष वर्ग में 4.8 किलोमीटर की दौड़ अब 27 मिनट की बजाय 25 मिनट में पूरी करनी होगी. इसी तरह महिला वर्ग में 2.4 किलोमीटर की दौड़ 16 मिनट की बजाय 14 मिनट में पूरी करनी होगी .

नीतीश सरकार के मंत्री बोले- ‘भारत माता की जय’ न कहने वाले पत्रकार पाकिस्तान समर्थक

पटना: बिहार की नई नीतीश सरकार में मंत्री विनोद कुमार सिंह ने मंगलवार को एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया. उन्होंने भाजपा के एक समारोह में उनके साथ ‘भारत माता की जय‘ का नारा न लगाने वाले मीडियाकर्मियों को ‘पाकिस्तान का समर्थक’ करार दे दिया. इससे पहले इसी समारोह में भाजपा की बिहार इकाई के अध्यक्ष नित्यानंद राय ने कहा कि मस्जिदों से अजान और चर्च से घंटियों की आवाज के बजाय ‘भारत माता की जय’ की आवाज आनी चाहिए. राय हालांकि अपनी बात पर ज्यादा देर अडिग न रह सके. बाद में उन्होंने यू-टर्न ले लिया और कहा कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा था. नीतीश कुमार सरकार में खदान एवं भूगर्भीय मामलों के मंत्री व भाजपा नेता विनोद कुमार सिंह ने राज्य की नई सरकार में शामिल भाजपा के 12 मंत्रियों के सम्मान में हुए संकल्प सम्मेलन में लोगों से कहा कि वे उनके साथ ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाएं.

लेकिन, जब कार्यक्रम में मौजूद मीडियाकर्मियों ने यह नारा नहीं लगाया तो सिंह ने इस पर नाराजगी जताई. उन्होंने कहा, “आप पहले भारत माता की संतान हैं, पत्रकार बाद में हैं. अगर आप मेरे साथ जोर से भारत माता की जय का नारा नहीं लगाते तो क्या आप पाकिस्तान माता के समर्थक हैं?” एक-दो को छोड़कर किसी भी पत्रकार ने मंत्री की इस बात पर ऐतराज नहीं जताया

बिहार बीजेपी अध्यक्ष नित्यानंद राय के बयान पर भी विवाद: इससे पहले, समारोह शुरू होने पर बिहार भाजपा के अध्यक्ष नित्यानंद राय ने कहा कि मस्जिद और चर्च से अजान और घंटी के बजाय ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ की आवाज आनी चाहिए.

यह अहसास होने पर कि उन्होंने एक विवादित बयान दे दिया है, राय ने बात बदलते हुए मीडिया से कहा, “मैंने कहा था कि मस्जिद और चर्च से भारत माता की जय और वंदे मातरम् की आवाज आनी चाहिए. मेरा मतलब यह नहीं था कि यह अजान और घंटी की जगह पर आनी चाहिए.”

विपक्षी राजद ने सिंह और राय के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इन्होंने अपने ‘वास्तविक एजेंडे’ को दिखा दिया है.

जबकि जनता दल (युनाइटेड) प्रवक्ता ने कहा कि यह अभिव्यक्ति की निजी आजादी है और उन्हें इस पर कुछ नहीं कहना है.

याद रहे, नीतीश कुमार चार साल पहले अपनी पार्टी का भाजपा से नाता तोड़ने के बाद पाकिस्तान गए थे, ताकि लोग उन्हें धर्मनिरपेक्ष नेता मानें.

प्रेस रिव्यू: सुभाष बराला के भतीजे पर रेप पीड़िता को धमकाने का आरोप

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने ख़बर दी है कि अब हरियाणा भाजपा अध्यक्ष सुभाषा बराला के भतीजे कुलदीप बराला पर एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता को केस वापस लेने के लिए धमकाने का मामला सामने आया है.

अख़बार ने लिखा है कि मामला मई का है और इसमें कुलदीप बराला के एक रिश्तेदार पर अपहरण और बलात्कार के आरोप हैं. पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा पुलिस से मामले पर 31 अगस्त तक स्टेटस रिपोर्ट मांगी है.

सुभाष बराला के बेटे विकास बराला पहले ही चंडीगढ़ में एक आईएएस अफ़सर की बेटी का पीछा करने के केस में फंसे हैं. भाजपा पर उन्हें बचाने की कोशिश के आरोप भी लगे हैं.

ये सिर्फ़ मेरी जीत नहीं, पैसे और ताकत की हार भी है: अहमद पटेल

गुजरात राज्यसभा चुनावों में भारी उठापटक के बाद अहमद पटेल आख़िरकार अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे. उनके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी चुनाव जीत गए. अहमद पटेल को 44 वोट मिले जबकि स्मृति ईरानी को 46 और अमित शाह को भी 46 वोट मिले. चौथे उम्मीदवार बलवंत सिंह राजपूत को 38 वोट मिले.

क्रॉस वोटिंग की वजह से अहमद पटेल के जीतने पर संशय था. लेकिन फिर कांग्रेस की मांग मानते हुए चुनाव आयोग ने दो बागी कांग्रेस विधायकों के वोट रद्द कर दिए और भाजपा का गणित बिगड़ गया.

कांग्रेस ने क्रॉस वोटिंग करने वाले अपनी ही पार्टी के दो विधायकों राघवजी पटेल और भोला गोहिल के वोट रद्द करने की मांग की थी क्योंकि कथित तौर पर उन्होंने अपने मतपत्र अनाधिकारिक लोगों को दिखा दिए थे.

शाम 5 बजे ही गिनती शुरू होनी थी, लेकिन कांग्रेस की शिकायत के बाद गिनती रोक दी गई थी. देर रात वोटों की गिनती शुरू हुई और 174 वोटों को वैध माना गया.

नतीजों के बाद अहमद पटेल ने ट्विटर पर ‘सत्यमेव जयते’ लिखते हुए अपनी जीत का एलान किया. उन्होंने लिखा, ‘यह सिर्फ मेरी जीत नहीं है. यह पैसे, ताक़त और राज्य की मशीनरी के खुले इस्तेमाल की हार है. मैं उस प्रत्येक विधायक को धन्यवाद देता हूं जिन्होंने भाजपा की अभूतपूर्व धमकियों और डर के बावजूद मुझे वोट दिया. भाजपा ने अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी और राजनीतिक आतंक को ही उजागर किया है. गुजरात के लोग चुनाव में उन्हें जवाब देंगे.’

अहमद पटेल का ट्वीटइमेज कॉपीरइटTWITTER/@AHMEDPATEL

दो वोटों की वजह से फंसा था पेंच

कांग्रेस का आरोप था कि उनकी ही पार्टी के विधायक राघवजी पटेल और भोला गोहिल ने वोट डालने के बाद अपने बैलट आधिकारिक पार्टी प्रतिनिधि के अलावा भाजपा प्रतिनिधि को भी दिखाए थे.

नियमों के मुताबिक, वोट करने वाले विधायकों को अपने बैलट सिर्फ़ अपनी पार्टी के आधिकारिक प्रतिनिधि (चुनाव एजेंट) को दिखाने होते हैं.

देर रात 11:40 पर कांग्रेस नेता अर्जुन मोडवाडिया ने दोनों के वोट रद्द होने की पुष्टि की. उन्होंने कहा कि जब दोनों विधायकों ने वोट दिया तो कांग्रेस के चुनाव प्रतिनिधि शक्तिसिंह गोहिल ने उसी समय खड़े होकर आपत्ति दर्ज कराई थी.

उन्होंने कहा, ”उस समय अधिकारियों ने कार्रवाई नहीं की. दोनों वोट बैलट बॉक्स में डाल दिए गए. लेकिन तभी रिटर्निंग अफ़सर ने आश्वासन दिया था कि वीडियो देखकर फ़ैसला करेंगे.”

वीडियो सार्वजनिक किया जाए: भाजपा

गुजरात के उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने कहा कि अगर मतदान का वीडियो सार्वजनिक किया जाए तो सबको पता चल जाएगा कि वोट रद्द करने का फ़ैसला ग़लत है. उन्होंने वीडियो सार्वजनिक करने की मांग की और यह भी कहा कि इससे नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा और भाजपा तीनों सीटें जीतेगी.

उन्होंने कहा, ”वीडियो में हमारे चुनाव प्रतिनिधि दिख ही नहीं रहे हैं और दोनों विधायकों का वोट शक्तिसिंह गोहिल के अलावा किसी ने नहीं देखा है, बल्कि नियम का उल्लंघन शक्तिसिंह गोहिल ने किया, जब उन्होंने देखा कि राघवजी पटेल ने कांग्रेस के ख़िलाफ़ वोट दिया है तो वो गुस्से में खड़े हो गए और मतपत्र छीनने की कोशिश की.”

वाघेला खेमे के दोनों विधायक

शंकर सिंह वाघेला
इमेज शंकर सिंह वाघेला ने हाल ही में छोड़ी है कांग्रेस

दोनों विधायक शंकर सिंह वाघेला खेमे के माने जाते हैं जिन्होंने हाल ही में कांग्रेस छोड़ी है. वाघेला ने मंगलवार सुबह समाचार चैनलों से बात करते हुए कहा था कि उन्होंने कांग्रेस को वोट नहीं दिया है क्योंकि अहमद पटेल चुनाव हार रहे हैं और वो अपना वोट ख़राब करना नहीं चाहते.

दोनों पार्टियों के बड़े नेता पहुंचे थे चुनाव आयोग

मंगलवार को मतदान के बाद पहले कांग्रेस शिकायत लेकर चुनाव आयोग गई और उसकी आपत्ति के ख़िलाफ वरिष्ठ भाजपा नेताओं का समूह भी आयोग पहुंच गया. दोनों पार्टियां दिन भर में तीन-तीन बार चुनाव आयोग पहुंचीं. कांग्रेस की तरफ़ से पी चिदंबरम, रणदीप सुरजेवाला और अशोक गहलोत ने चुनाव आयोग में अपनी शिकायत दी.

भाजपा की तरफ़ से अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद, पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमण समेत छह केंद्रीय मंत्रियों ने चुनाव आयोग पहुंचकर कांग्रेस की शिकायत को बेबुनियाद करार दिया.

अमित शाह
GETTY IMAGES

गुजरात से राज्यसभा चुनावों की तीन सीटें हैं और चार उम्मीदवार खड़े थे. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की जीत की राह आसान मानी जा रही थी, लेकिन तीसरी सीट के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सलाहकार और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अहमद पटेल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी. उनका मुक़ाबला हाल ही में कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए बलवंत सिंह राजपूत से था.

राहुल गांधी, अहमद पटेल

हाल ही में छह कांग्रेस विधायकों के पार्टी छोड़ने से यह चुनाव कांटे का हो गया था. इन छह में से तीन विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे. इसके बाद कांग्रेस विधायकों को प्रभावित किए जाने से बचाने के लिए पार्टी ने उन्हें बेंगलुरु के एक रिसॉर्ट में भेज दिया था. मतदान से एक दिन पहले ही उन्हें एक साथ अहमदाबाद लाया गया.

नज़रिया: अहमद पटेल की जीत कांग्रेस के लिए संजीवनी बूटी

राज्यसभा के चुनाव गुजरात में पहले भी हुए हैं. अहमद पटेल का ये पांचवा राज्यसभा चुनाव था. इससे पहले राज्यसभा का चुनाव एक फ़्रेंडली मैच की तरह होता था जिसका परिणाम आमतौर पर मालूम होता था कि अगर इतनी सीटें हैं तो कौन-कौन लोग चुनकर आएंगे.

इस बार भी गुजरात का राज्यसभा चुनाव कुछ अलग नहीं था. लेकिन दो बातों की वजह से सारा समीकरण बदल गया. एक तो ये कि शंकरसिंह वाघेला ने नेता विपक्ष के पद से इस्तीफ़ा दिया और दूसरा ये कि बीजेपी ने ये मन बना लिया कि इस चुनाव को वो बहुत ऊंचे स्तर पर ले जाएगी और जीतेगी. इन दो कारकों के होने की वजह से ये एक बहुत हाई वोल्टेज ड्रामा की शक्ल में सामने आया.

घटनाक्रम को देखें तो ये बात समझ में आती है कि बीजेपी ने इस चुनाव को इस स्तर तक ले जाने का काफ़ी पहले ही मन बना लिया था.

इस योजना के तहत बीजेपी ने सबसे पहला काम ये किया कि शंकर सिंह वाघेला पर प्रश्न उठाना शुरू किया और ऐसा माहौल तैयार कर दिया जिससे ये लगने लगा कि वाघेला शायद बीजेपी में जा रहे हैं. जबकि हक़ीक़त ये थी कि उस समय तक वाघेला का ऐसा कोई इरादा नज़र नहीं आ रहा था.

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Image captionसोनिया गांधी और राहुल गांधी

इससे ऐसा संकेत भी मिला की बीजेपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के स्तर पर बहुत कुछ खिचड़ी पक रही है.

जैसे-जैसे वक्त गुज़रता गया, कांग्रेस में घटनाक्रम बदले, बाग़ी खड़े हुए और हालत ये हो गई कि पार्टी को अपने विधायकों को टूट से बचाने के लिए गुजरात से बाहर ले जाना पड़ा.

वहां बेंगलुरु में केंद्र सरकार ने जिस तरह इनकम टैक्स और ईडी की मदद से कथित तौर पर दबाव बनाया उससे ये ज़ाहिर होने लगा कि भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में अपना सब-कुछ झोंक रही है.

बीजेपी ने क्यों बनाया इतना महत्वपूर्ण?

अब सवाल उठता है कि ऐसा क्या था इस चुनाव में कि भारतीय पार्टी ने अपने समय, रणनीति, ऊर्जा – सबकुछ लगा दिया.

मुझे लगता है कि बीजेपी चाहती थी कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा में सरकार बनाने के बाद मिले राजनीतिक लाभ को और मज़बूत करे और मनोवैज्ञानिक रूप से कांग्रेस को भरपूर नुकसान पहुंचाए.

मनोवैज्ञानिक नुकसान का आशय यहां यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल अगर अपने गढ़ में ये चुनाव हार जाते हैं तो कांग्रेस के काडर के लिए ये एक बहुत बड़ा सदमा होगा और साथ ही बीजेपी के लिए ये एक बहुत बड़ी राजनीतिक जीत वाली स्थिति होगी.

दूसरी बात ये है कि सोनिया गांधी भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों के दिमाग़ में एक बगवेयर के रूप में बैठी हुई हैं जिनका उत्तरोत्तर कमज़ोर होना पार्टी के हित में है.

बीजेपी ये बात नहीं भूल पाती कि सोनिया गांधी ने अकेले अपने दम पर 2004 में न केवल पार्टी को खड़ा किया था बल्कि अटल जी के इंडिया शाइनिंग की भी हवा निकाल दी थी.

यही वजह है कि बीजेपी के रणनीतिकार ये कोशिश करते हैं कि सोनिया गांधी और उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस को जितना संभव हो सके नीचे लाया जाए.

नरेंद्र मोदीइमेज कॉपीरइटEPA
Image captionभारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

दूसरी बात, आरएसएस को ये लगता है कि भारत में हर बात कहीं न कहीं कांग्रेस से जुड़ जाती है. इसलिए वो ऐसे भारत की कल्पना करना चाहती है जिसमें कांग्रेस न हो तभी भारत निर्माण हो सकता है.

यही वजह है कि बीजेपी ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा चलाया हुआ है. हालांकि ये बात अलग है कि कांग्रेस मुक्त भारत बनाने की कोशिश में खुद बीजेपी कांग्रेस युक्त होती जा रही है.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी की रणनीति ये है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में अगर दक्षिणपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाना है तो पुरानी सोच और उसके प्रतीकों को उखाड़ना होगा.

उसी उखाड़ने की प्रक्रिया के तहत अहमद पटेल के बहाने एक सांघातिक प्रहार की कोशिश की गई, लेकिन इसे बीजेपी का दुर्भाग्य कहें या कांग्रेस का सौभाग्य कि बीजेपी का ये पासा उल्टा पड़ गया.

कांग्रेस के लिए अहमद पटेल की जीत के मायने

कांग्रेस के लिए ये जीत बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी क्योंकि कांग्रेस लंबे अरसे से बैकफ़ुट पर चल रही है. अहमद पटेल को हराने के लिए बीजेपी और सरकार दोनों ने मिलकर बेहद आक्रामक रणनीति तैयार की थी. लेकिन अब जबकि अहमद पटेल इस कांटे की टक्कर में विजेता बनकर उभरे हैं तो परसेप्शन के स्तर पर और मनोबल के स्तर पर इसका काफ़ी फ़ायदा कांग्रेस को मिलेगा.

इस साल के आखिर में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं. अहमद पटेल की जीत से कांग्रेस पार्टी के पास एक मौका आ गया है चीज़ों को ठीक करने का.

शंकर सिंह वाघेलाशंकर सिंह वाघेला

मोदीजी के गुजरात से केंद्र में जाने के बाद गुजरात बीजेपी में वैसी बात नहीं रही है जो पहले होती थी. वैसे भी कहते हैं कि वट वृक्ष के नीचे कुछ नहीं पनपता. तो मोदी जी के समय गुजरात बीजेपी में मोदी ही मोदी नज़र आते थे. दूसरे नंबर के नेता का भरपूर अभाव था.

जब मोदी जी केंद्र की राजनीति में चले गए तो उनकी जगह गुजरात में जो नेता उभरे उनमें वो बात नहीं है जो मोदी जी में थी. और सरकार जिस तरीके से चल रही है उसका भी जनता में कोई बहुत अच्छा संदेश नहीं जा रहा. इसका फ़ायदा कांग्रेस को मिल सकता है.

सामाजिक असंतोष भी बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. पाटीदार, दलित और अन्य पिछड़े तबकों में सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष है. इसका फ़ायदा कांग्रेस को मिलता नज़र आ रहा था, लेकिन वाघेला के साथ विधायकों के कांग्रेस छोड़कर जाने से पार्टी की चुनाव तैयारियों को एक धक्का लगा था. लेकिन अहमद पटेल की जीत से कांग्रेस को एक संजीवनी बूटी सी मिल गई है.

अगर पार्टी आलस नहीं करती और इस जीत के पैदा हुई ऊर्जा को संजो कर एक नई रणनीति के साथ चुनाव में उतरती है तो सत्ता का खेल बदल भी सकता है क्योंकि कांग्रेस एक इतना विशालकाय प्राण है कि उसको हिलाना मुश्किल होता है और चलाना और और भी मुश्किल. अगर वो अब भी नहीं चेतेगी तो बहुत मुश्किल हो सकती है.

बीजेपी इससे कैसे उबरेगी

बीजेपी का नियंत्रण इस समय नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पास है. इन दोनों नेताओं की कार्यशैली ये है कि बड़ा धक्का लगने पर ये ऐसा कुछ नया कर डालते हैं जिससे सेटबैक का असर नहीं रह जाता. कांग्रेस अभी तक इस बात को समझ नहीं पाई है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाहबीजेपी अध्यक्ष अमित शाह

ब्लैक मनी का इश्यू चला था तो नोटबंदी से आलोचना के पूरे माहौल को बदल दिया गया. कहने का मतलब है कि बीजेपी सदमे को भुलाकर तुरंत खड़ी हो जाने वाली पार्टी हो गई है और गुजरात को पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बहुत गंभीरता से ले रहा है क्योंकि वो इसी ज़मीन से निकलकर नरेंद्र मोदी केंद्र तक पहुंचे हैं. इसलिए गुजरात का पार्टी के लिए बहुत बड़ा प्रतीकात्मक महत्व है और वो इसे हाथ से निकलता नहीं देख सकते. इसलिए पार्टी ने अभी से ही बूथ लेवल तक अपनी रणनीति बना ली है. जबकि दूसरी ओर कांग्रेस है जो ऊपर-ऊपर की बातों में उलझी पड़ी है.

अगर कांग्रेस को आगामी चुनाव में जीत के सपने को साकार करना है तो उसे नींद से जागना होगा और अहमद पटेल की जीत से मिली ऊर्जा को बहुत छोटे स्तर पर कार्य कर रहे पार्टी कार्यकर्ताओं तक पहुंचाना होगा. छोटी-छोटी जीत से ही बड़ी जीत का सपना साकार होता है.

आने वाले समय में 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और कांग्रेस इस जीत से सबक लेकर एक समग्रता वाली रणनीति के साथ पूरी दमखम से काम करती है तो आज जिस हालत में पड़ी है उसका दूसरा पहलू भी देखने को मिल सकता है. लेकिन बीजेपी भी इन बातों को समझती है और वो अपने गढ़ को कमज़ोर होता नहीं देखना चाहेगी.

इटावा: मृत परिजनों को दफनाने के लिए नहीं है कब्रिस्तान, घर में ही बन रही है कब्र

विधानसभा चुनाव के दरम्यान उत्तर प्रदेश मे कब्रिस्तान और शमशान का मुददा बड़े जोर शोर से उछाला गया था लेकिन इस पर अब पूरी तरह से चर्चा बंद हो चुकी है । उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में चंबल नदी के किनारे बसे चकरगनर मे एक ऐसी मुस्लिम बस्ती है जहां के लोग अपने मृत परिजनों को अपने घरों में ही दफनाने मे लगे हैं। चकरनगर के बारे मे कहा जाता है कि महाभारत काल के दौरान पांडवों ने अज्ञातवास यहीं बिताया था  जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित चकरनगर इलाके में एक बस्ती है तकिया। यहां रहने वाली सुशीला बेगम काफी दुखी होकर कहती हैं कि हमें न धन चाहिए , न दौलत, न ही कुछ और। हमें तो सिर्फ दो गज़ जमीन चाहिए लेकिन हम इतने दुर्भाग्यशाली हैं कि हमें वो भी मयस्सर नहीं । यह तकलीफ सिर्फ सुशीला बेगम की नहीं है । बस्ती में रहने वाले करीब 70-80 मुस्लिम परिवारों को भी यही परेशानी है। वे अपने छोटे से घरों या यों कहें कि घरनुमा कमरों में ही अपने पुरखों की कब्र बनाने के लिए मजबूर हैं।

सुशीला बेगम अपने घर मे बनी कब्रों के बारे में बताते हुए वे फूट-फूट कर रोते हुए बताती हैं कि वैसे तो कोई अपना मर जाता है तो इंसान कुछ दिन रोता है, फिर उसकी यादें धुंधली होती जाती हैं लेकिन इन कब्रों के हमेशा सामने होने के कारण हमेशा अपनों के मरने की ही घटना दिखती है। हम जब भी कब्रों को देखते हैं, बातें ताजा हो जाती हैं। यही नहीं, इस बस्ती में कई ऐसे भी घर हैं, जहां कमरे में एक ओर कब्र है तो दूसरी ओर सोने का बिस्तर लगा है। यानी शयन कक्ष और कब्रिस्तान एक साथ हैं ।इसी बस्ती के ही यासीन अली बताते हैं कि हम सभी मजदूरी करते हैं। किसी के पास ज़मीन है ही नहीं । सालों पहले ग्राम समाज से घर के लिए जो जमीन मिली थीं, परिवार बढ़ने के साथ वो कम पड़ने लगीं । पहले हम खाली जमीन पर शव दफनाते थे, लेकिन बाद में जगह नहीं मिलने के कारण घरों में ही दफनाना पड़ रहा है । ऐसा नहीं है कि इस बात की किसी को जानकारी न हो। ये समस्या नई नहीं बल्कि सालों पुरानी है। ये बस्ती फकीर मुसलमानों की है। बस्ती के लोगों का कहना है कि इसके लिए हमने हर जगह दरख्वास्त दी, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई।

इटावा के प्रशासनिक अधिकारी भी तकिया में कब्रिस्तान न होने की बात से वाकिफ हैं लेकिन वे भी यही समस्या बता रहे हैं जो कि ग्राम प्रधान राजेश यादव ने बताई। इटावा की जिलाधिकारी सेल्वा कुमारी जे कहती हैं कि आस-पास खाली जमीन है ही नहीं। किसी की निजी जमीन दी नहीं जा सकती है। कुछ दूर पर जमीन मुहैया कराई गई थी लेकिन वहां ये लोग कब्रिस्तान बनाने को राजी नहीं है। सेल्वा कहती हैं कि डेढ़ किलोमीटर दूर चांदई गांव में कब्रिस्तान के लिए उपलब्ध जमीन पर शव दफनाने के लिए लोगों को मनाने की कोशिश हो रही है। तकिया बस्ती की कुछ महिलाएं बताती हैं कि बच्चे अक्सर रात में जग जाते हैं क्योंकि कई घरों में कब्रें बिस्तर के बिल्कुल पास में ही बनी हुई हैं। बहरहाल, प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधि तकिया बस्ती के लोगों के लिए आस-पास ही किसी कब्रिस्तान के इंतजाम में लगे हैं लेकिन अभी तो इनकी यही मांग है कि मरने के बाद अपनी मातृभूमि में दफन होने के लिए इन्हें कम से कम दो गज जमीन तो मिल जाए ।

चंडीगढ़ छेड़छाड़ केस: मायावती ने पूछा, खामोश क्यों हैं भाजपा के नेता

हरियाणा भाजपा प्रमुख के बेटे और उसके साथी द्वारा चंडीगढ़ में एक युवती का पीछा करने के मामले में बसपा प्रमुख मायावती ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी की मांग करते हुए पूछा कि इस मामले में भाजपा के बड़े नेता खामोश क्यों हैं? उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के नेता इस मामले को दबा देने की कोशिश में हैं। मायावती ने पूछा, ‘क्या भाजपा नेताओं से जुड़े व्यक्तियों पर देश का कानून लागू नहीं होता? यह दोहरा रवैया क्यों?’  मायावती ने हरियाणा सरकार के ‘बेटी बचाओ’ अभियान के नारे पर तंज कसते हुए कहा कि जिस तरीके से विकास बराला प्रकरण को दबा देने की कोशिश चल रही है, वह बेहद चिंतनीय है। लखनऊ में जारी एक बयान में उन्होंने मांग की कि आरोपियों के खिलाफ तुरंत प्रभाव से अपहरण का मामला दर्ज किया जाए और उनकी अविलंब गिरफ्तारी की जाए।

उन्होंने मांग की कि महिला उत्पीड़न के दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए। मायावती के मुताबिक जिस तरीके से अभियुक्त विकास बराला को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर बचाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे कमजोर वर्ग में उनके खिलाफ असंतोष पैदा हो रहा है। विकास को पुलिस ने थाने से जाने कैसे दिया?’ उन्होंने कहा कि इन हालात में लोगों का गुस्सा बिल्कुल जायज है।  मायावती ने पूछा कि क्या भाजपा के नेता और उनके संबंधी देश के कानून से ऊपर हैं। क्या उन पर कानून लागू नहीं होता? उन्होंने कहा कि हरियाणा की हाल की घटनाओं से स्पष्ट हो गया है कि बेटी बचाओ, लव जेहाद, महिला सुरक्षा, गो रक्षा और एंटी-रोमियो जैसे नारे गढ़कर भाजपा ने मतदाताओं को लुभाया है और सत्ता पाई है। इन नारों का हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है।

देश में भर में अपहरण, छेड़छाड़ और पीछा करने के मामले बढ़े

दिल्ली में महिला के प्रति अपराध के मामले सबसे ज्यादा रहे। यहां 17,104 केस प्रति एक लाख महिला आबादी पर 184.3 की अपराध दर से दर्ज हुए। असम इस मामले में दूसरे और हरियाणा छठे नंबर पर रहा।

देशभर में महिलाओं के संग 2015 में अपहरण, छेड़छाड़ और पीछा करने के मामले बढ़े हैं। हालांकि बलात्कार के मामलों में कमी आई है। ऐसा नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का कहना है। एनसीआरबी के मुताबिक अगर 2014 से तुलना करें तो निश्चित रूप से बलात्कार के मामले घटे हैं। एनसीआरबी की 2016 के अपराध आंकड़ों की रिपोर्ट अभी आना बाकी है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2014 के मुकाबले 2015 में महिलाओं के प्रति अपराध में 3.1 फीसद की कमी आई। 2015 में जहां 3,27,394 मामले अपराध के दर्ज हुए, वहीं 2014 में यह संख्या 3,37,922 थी। इसी तरह बलात्कार के मामले 2015 में 5.7 फीसद कम हुए। 2014 में 36,735 मामले बलात्कार के दर्ज हुए थे वहीं 2015 में यह संख्या घटकर 3,651 रह गई।

2015 की रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि महिलाओं के यौन प्रताड़ना संबंधी अपराध 2.5 फीसद बढ़ गए। इसमें छेड़छाड़, पीछा करना, घूरना वगैरह शामिल हैं। 2015 में 84,222 ऐसे मामले दर्ज किए गए जबकि 2014 में यह संख्या 82,235 थी। इसी तरह महिलाओं के अपहरण के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2014 में जहां 57,311 अपहरण हुए थे, वहीं 2015 59,277 अपहरण हुए। महिलाओं को शादी के लिए विवश करना अपहरण का प्रमुख कारण है। 2015 में 54 फीसद महिलाएं इसी कारण से अपह्रत की गईं। 2014 में इसी वजह से 50 महिलाएं अगवा की गई थीं। दिल्ली में महिला के प्रति अपराध के मामले सबसे ज्यादा रहे। यहां 17,104 केस प्रति एक लाख महिला आबादी पर 184.3 की अपराध दर से दर्ज हुए। असम इस मामले में दूसरे और हरियाणा छठे नंबर पर रहा।

राज्य मामले राष्ट्रीय हिस्सेदारी दर %
दिल्ली 17,104 52
तेलंगाना 15,135 4.6
ओडीशा 17,144 5.2
राजस्थान 28,165 8.6
हरियाणा 9,446 2.9
पश्चिम बंगाल 33,218 10.1

राज्य घटनाएं प्रति एक लाख महिला आबादी

दिल्ली 2,199 23.7
छत्तीसगढ़ 1,560 12.2
मध्य प्रदेश 4,391 11.9
ओडीशा 2,251 10.8
राजस्थान 3,644 10.5
महाराष्ट्र 4,144 7.3
उत्तर प्रदेश 3,025 3.0

नीतीश को चुनौती देने तैयार हुए शरद यादव? जारी क‍िया ब‍िहार की जनता से सीधा संवाद का कार्यक्रम

बिहार में महागठबंधन की सरकार टूटने के बाद इन दिनों जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव और सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच बढ़ती दूरी साफ दिखाई दे रही है। महागठबंधन टूटने के बाद नीतीश ने भाजपा के साथ मिलकर भले ही सरकार बना ली हो लेकिन शरद यादव ने अब नीतीश को चुनौती देने के लिए कमर कस ली है। शरद यादव बहुत ही जल्द बिहार की जनता के साथ सीधे संवाद करते हुए दिखाई देंगे। इस संवाद की जानकारी शरद यादव ने अपने ट्विटर हैंडल पर ट्वीट कर दी है। जनता से किए जाने वाले इस संवाद की एक सूची तैयार की गई है कि किस दिन शरद यादव प्रदेश की जनता के साथ रुबरु होंगे।

इस सूची के अनुसार 10 अगस्त को शरद यादव पटना से सोनपुर जाएंगे। सोनपुर के बाद वे हाजीपुर, सराय, भगवानपुर, गोरौल, कुढ़ानी, तुर्की, रामदयालु नगर, गोबरसाही और फिर भगवानपुर चौक जाएंगे। यहां जनता से संवाद कर शरद यादव मुजफ्फरपुर जाएंगे और यहीं पर रात को ठहरेंगे। इसके बाद 11 अगस्त उनका मुजफ्फरपुर में कार्यक्रम होगा। यहां कार्यक्रम खत्म करने के बाद शरद यादव चांदनी चौक, जीरो माइल, गरहा, बोचाहा, मझौली, सर्फुद्दीनपुर, जारंग, गायघाय, बेनीबाद और दरभंगा में आम जनता के साथ रुबरु होंगे और उनसे उनकी तकलीफों के बारे में जानेंगे।

बिहार की जनता से सीधे संवाद कार्यक्रम के आखिरी दिन 12 अगस्त को शरद यादव मधुबनी, सुपौल, सहरसा और मधेपुरा में आम जनता के बीच पहुंचेंगे और रात को मधेपुरी में ही विश्राम करेंगे। अपने इस कार्यक्रम के जरिए शरद यादव शायद नीतीश को बताना चाहते हैं कि जिस पार्टी के साथ मिलकर उन्होंने सरकार बनाने का कदम उठाया है वह बिलकुल गलत है। ऐसा लगता है कि इन कार्यक्रम के तहत शरद यादव नीतीश कुमार से अपनी नाराजगी जाहिर करना चाह रहे हैं। आपको बता दें कि ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि शरद यादव जल्द ही जदयू से अलग हो सकते हैं क्योंकि वे अपने बयान में पहले ही कह चुके हैं कि वे नीतीश कुमार के फैसले से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। इस बयान से शरद यादव की नीतीश के प्रति नाराजगी साफ झलकती है।

गुजरात राज्यसभा चुनाव: अमित शाह की रणनीति फेल, कांग्रेसी अहमद पटेल जीते, चुनाव आयोग में भी बीजेपी की हार

गुजरात राज्यसभा चुनाव 2017 में मंगलवार (8 अगस्त) की रात को नाटकीय ढंग से घटनाक्रम बदले और तीसरी सीट पर कांग्रेस के अहमद पटेल जीत गए। तीन राज्यसभा सीटों में से दो पर भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की जीत हुई लेकिन इन दोनों की जीत की खुशी तीसरी सीट पर हुई हार के आगे फीकी पड़ गई। आखिर तक किसी को नहीं पता था कि तीसरी सीट जिसपर अहमद पटेल और बीजेपी की तरफ से बलवंत राजपूत आमने-सामने थे उसपर कौन जीतेगा। सारा विवाद दो कांग्रेसी विधायकों के वोट को लेकर खड़ा हुआ। दरअसल दोनों ने अपना वोट डालने के बाद यह दिखा दिया था कि उन्होंने किसको वोट दिया। इसपर कांग्रेस ने हंगामा कर दिया।

कांग्रेस का कहना था कि दोनों ने वोट की गोपनीयता का उल्लंघन किया है इसके चलते दोनों (भोलाभाई गोहिल और राघवजी भाई पटेल) का वोट कैंसल होना चाहिए। इस चीज के लिए कांग्रेस चुनाव आयोग पहुंच गई। इसी बीच वोटों की गिनती रुकवा दी गई। फिर आधी रात तक दोनों ही दलों के बड़े-बड़े नेता चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचने लगे। दोनों की तरफ से अपनी-अपनी दलीलें दी जा रही थी।

लेकिन अंत में चुनाव आयोग ने दोनों के वोट को खारिज कर दिया। आयोग ने निर्वाचन अधिकारी से कांग्रेस विधायक भोलाभाई गोहिल और राघवजी भाई पटेल के मतपत्रों को अलग करके मतगणना करने को कहा। आयोग के आदेश के अनुसार मतदान प्रक्रिया का वीडियो फुटेज देखने के बाद पता चला कि दोनों विधायकों ने मतपत्रों की गोपनीयता का उल्लंघन किया था। वोटों की गिनती रात को एक बजे शुरू हुई और लगभग दो बजे नतीजे आए। जीत के बाद अहमद पटेल ने ट्वीट कर ‘सत्यमेव जयते’ लिखा। उन्होंने कांग्रेस का साथ देने वाले सभी लोगों का शुक्रिया भी किया।

यह सीट अमित शाह और अहमद पटेल के लिए नाक का सवाल बन गई थी। दोनों को ही अपनी-अपनी पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाता है। लेकिन अंत में बीजेपी दो सीट जीतकर भी खुश नहीं थी और चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने की बात कह रही थी।