अजहरुद्दीन को कोर्ट ने मैच फिक्सिंग से किया मुक्त, क्या BCCI उन्हें देगी करोड़ों रुपए बकाया पेंशन?

नई दिल्ली: प्रशासकों की समिति और बीसीसीआई पदाधिकारियों की मंगलवार को होने वाली बैठक में भारत के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन की लंबी बकाया राशि पर बातचीत की जायेगी. समझा जाता है कि अजहर ने सीओए को बताया है कि आंध्र उच्च न्यायालय ने पांच साल पहले उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए तमाम आरोपों से बरी कर दिया था. उन्होंने अपने बकाया के बारे में भी पूछताछ की जो कुछ करोड़ रुपए हैं.

बीसीसीआई के एक सीनियर अधिकारी ने कहा ,’हां , अजहरूद्दीन के मसले पर सीओए की बैठक में बात की जायेगी. फिलहाल अजहर पर कोई प्रतिबंध नहीं है और वह बीसीसीआई के समारोहों में भाग ले रहे हैं.

आखिरी बार वह 2000 में भारत के लिये खेले थे. उन्हें 17 साल से पेंशन नहीं मिली और एकमुश्त अनुग्रह राशि भी रूकी हुई है. सीओए इस बारे में फैसला लेगा.’

हि‍दुस्‍तान की ऐसी तस्‍वीर जि‍से आप नहीं देखना चाहेंगे

रात को लगभग 11 बजे एक मित्र का फोन आया. बहुत जरूरी हो तभी इस वक्त फोन कोई फोन करता है. बात की तो उन्होंने मुझे कहा कि व्हाट्सऐप पर एक फोटो देखिए. मैंने डेटा ऑन करके उनका भेजा गया फोटो देखा. जब से यह फोटो देखा, रह—रह कर आंखों के सामने घूम रहा है. यह हिंदुस्तान की उन दर्दनाक तस्वीरों सा ही है जो कभी भोपाल की गैस त्रासदी में सामने आता है, कभी किसी अपने की लाश को कांधों पर उठाए बीसियों किलोमीटर चला जाता है. पूरे नौ माह तक अपनी कोख में एक जीवन पाल रही स्त्री के सामने ठीक अंतिम क्षण इतने भारी पड़ने वाले होंगे किसने सोचा होगा. एक शिशु का जन्म लेते ही धरती पर यूं गिर जाना, और जन्म लेते ही मौत को पा जाना, यह दुखों का कितना बड़ा पहाड़ होगा, क्या हम और आप सोच सकते हैं, इस दर्द को महसूस कर सकते हैं, क्या इस दर्द को दूर कर सकते हैं?

यह मामला दो दिन पहले मध्यप्रदेश के कटनी जिले का है. इस जिले के बारे में एनएफएचएस—4 की रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रसव के दौरान यहां पर लोगों को पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ती है. कटनी के पास ग्राम बरमानी निवासी रामलाल सिंह और बीना बाई के घर अच्छी खबर आने वाली थी. सुरक्षित प्रसव हो इसके लिए मध्यप्रदेश में बहुत काम किया गया है. संस्थागत प्रसव पर जोर दिया गया है. इसका असर हुआ और अब लोग घरों के बजाय अस्पतालों में जाकर प्रसव कराने को प्राथमिकता दे रहे हैं. अस्पताल तक पहुंचाने का जिम्मा आशा कार्यकर्ताओं को भी दिया गया है. इसके लिए उन्हें प्रोत्साहन राशि दी जाती है. अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस की सुविधा भी है, इसे जननी एक्सप्रेस नाम दिया गया है. सरकार का दावा है कि अब 80 प्रतिशत से ज्यादा प्रसव अस्पतालों में होने लगे हैं, लेकिन इनमें सुरक्षित प्रसव का प्रतिशत कितना है, यह अभी कहना बाकी है. पर लोगों को उम्मीद तो रहती ही है कि जच्चा—बच्चा का जीवन सुरक्षित रहे.

इसी आस में पति रामलाल सिंह ने प्रसव पीड़ा होने पर बरही अस्पताल पहुंचाने के लिए सुबह 10 बजे जननी एक्सप्रेस को फोन लगाया. समय चलता रहा, पीड़ा बढ़ती रही, लेकिन कोई जननी एक्सप्रेस नहीं आई. हारकर उसने अपनी पत्नी को एक ऑटो में जैसे—तैसे बैठाया और अस्पताल की ओर चल पड़ा. ऑटो अस्पताल से महज 700 मीटर की दूरी पर आकर बंद हो गया. ऐसी अवस्था में प्रसूता के लिए एक कदम में चलना मुश्किल होता है. रामलाल किसी फिल्म का हीरो भी नहीं था, जो अपनी पत्नी को गोद में उठाकर अस्पताल तक पहुंचाने जैसा फिल्मी काम कर सकता. वह दौड़ा, अस्पताल की ओर. रामलाल अस्पताल जाकर कर्मचारियों के सामने एम्बुलेंस भेजने की विनती करता रहा. पत्नी ऑटो में तड़प रही थी.

पति वापस नहीं आया और दर्द जब हद से ज्यादा हुआ तो वह ऑटो से निकल पैदल ही अस्पताल की ओर चलने लगी. कुछ ही दूर चलने पर उसे प्रसव हो गया. उसने एक सुंदर बालक को जन्म दिया, पर—पर—पर वह सड़क पर ऐसे गिरा कि फिर न हिल—डुल सका, न रो सका. आंखें खुलने से पहले ही बंद हो गईं, सांस चलने से पहले रुक गईं, दिल धड़कने से पहले ठिठक कर रूक गया. सड़क पर खून बह रहा था… पता नहीं यह मौत थी या हत्या.

मुझे दस साल पहले संग्राम सिंह की स्टोरी याद आ गई. यह मंडला जिले का मामला था. यहां पर शिशु नहीं मरा था. बैगा महिला थी, जो शिशु को जन्म देते—देते रास्ते में ही मर गई थी. किसी और मसले पर काम करते—करते हमें इस घटना का पता चला था. उसके पिता ने हमें उसकी आपबीती सुनाई थी. इसके कथानक को बदल दीजिए, कुछ दाएं—बाएं होगा, सामने तीन दिन का संग्राम था, यह नाम भी हम पत्रकारों की टोली उस बच्चे को दे आई थी. अगले दस दिन बाद हमने पता किया तो संग्राम भी उसकी मां के पास ही चला गया था. तब से अब तक दस साल का विकास हमारे सामने है. विकास के पैमाने में जिंदगी की सुरक्षा का कोई मानक कितना सुधरा, कैसे कहें, घटनाएं तो निरंतर हमारे सामने है.

हम संसाधनों का हवाला दे सकते हैं, भारत की भिन्न—भिन्न भौगोलिक परिस्थितियों के बीच सुविधाएं पहुंचा पाने की असमर्थकता का भी तर्क मान सकते हैं, पर जो व्यवस्थाएं मौजूद हैं, उनके कुशल संचालन के जिम्मेदारी से कैसे दूर भाग सकते हैं. यदि अस्पताल के ठीक सात सौ मीटर पीछे कोई बच्चा जमीन पर गिरकर मर जाए, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा. क्या हमारा समाज भी इतना निष्ठुर हो गया है कि दर्द से तड़प रही एक महिला को वह अस्पताल तक नहीं पहुंचा सकता ? क्‍या यह कि‍सी धर्म के एजेंडे में नहीं है ? क्‍या ऐसे काम देशप्रेम की सूची में समाहि‍त नहीं होंगे !!! क्‍या ऐसे मसलों पर चर्चा कि‍सी राष्ट्रवाद से कम है?

यह घटना हुई इससे ठीक एक दि‍न बाद देश की संसद में स्‍वास्‍थ्‍य एवं परि‍वार कल्‍याण मंत्री फग्‍गन सि‍ह कुलस्‍ते ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि भारत के महापंजीयक का नमूना पंजीकरण प्रणाली यानी एसआरएस की रि‍पोर्ट के मुताबि‍क 2015 में देश में प्रति एक हजार शि‍शु जन्‍म पर 37 बच्‍चों की मौत हो जाती है. पांच साल तक के बालकों की  मृत्यु दर यानी अंडर फाइव मोर्टेलि‍टी के मामले में यह आंकडा प्रति हजार जीवि‍त जन्‍म पर 43 है. इसी तरह मात मृत्यु दर के मामले में यह संख्‍या प्रति एक लाख प्रसव पर 167 है.

इसी सवाल के जवाब में बताया गया कि देश में 39 प्रतिशत बच्‍चों की मौत कम वजन या समय से पूर्व प्रसव के कारण, 10 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत एक्‍सपीसिया या जन्‍म आघात के कारण, 8 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत गैर संचारी रोगों के कारण, 17 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत नि‍मोनि‍या के कारण, 7 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत डायरि‍या के कारण, 5 प्रतिशत बच्‍चों की मौत अज्ञात कारण, 4 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत जन्‍मजात वि‍संगति‍यों के काराण, 4 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत संक्रमण के कारण, 2 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत चोट के कारण, डेढ प्रति‍शत बच्‍चों की मौत बुखार के कारण और पांच बच्‍चों की मौत अन्‍य कारणों से होती है.

कटनी में हुई बच्‍चे की मौत इसमें से कि‍स श्रेणी में आएगी… सोचना होगा! सोचना यह भी होगा कि सड़क पर जो लहू बह रहा है वह मौत का है या हत्‍या का. और इसका जि‍म्‍मेदार कौन है? आखि‍र ऐसी भी क्‍या परि‍स्‍थि‍ति है कि अस्‍पताल के ठीक सामने एक प्रसूता प्रसव करती है, बच्‍चे की मौत हो जाती है; हमारा समाज उसकी मौत को खड़े-खड़े देखता रहता है. इस मौत का मुकदमा कि‍स अदालत में चलाया जाएगा, और क्‍या कठघरे में हम सभी नहीं होंगे? सरकार की नीति और नीयत का सवाल तो है ही पर क्‍या समाज की संवेदना भी उसी सि‍स्‍टम की भेंट चढ़ गई है.

दुनि‍याभर में इस सदी की शुरुआत में मि‍लेनि‍यम डेवलपमेंट गोल्‍स तय कि‍ए गए थे. इसमें भुखमरी को दूर कर देने, गरीबी को हटा देने, शि‍शु और बाल मृत्‍यु दर को कम करने सहि‍त कई बि‍दु थे. जब 2015 तक यह तय नहीं हो पाए तो अब सतत वि‍कास लक्ष्‍यों का नया एजेंडा तय कि‍या गया है. अब 2030 तक इसमें तय कि‍ए गए लक्ष्यों को हासि‍ल करने का वायदा कि‍या गया है.

पर देखि‍ए कि देश की स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं का क्‍या हाल है. ऐसी वीभत्‍स तस्‍वीरें और खबरें जहां से आती हैं, वह एकदम ग्रामीण इलाका ही होता है. ऐसी जगहों पर छोटी-छोटी सेवाएं बड़ा काम करती हैं, मसलन प्राथमि‍क स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र. यह सार्वजनि‍क स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की पहली और महत्‍वपूर्ण कड़ी है. इसके बारे में घटना के ठीक एक दि‍न बाद केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य एवं परि‍वार स्‍वास्‍थ्‍य कल्‍याण मंत्री जेपी नड्डा ने जो जवाब दि‍या है वह बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के लि‍ए कतई ठीक नहीं माना जा सकता है. लोकसभा में प्रस्‍तुत जवाब के मुताबि‍क देश में आबादी के हि‍साब से अब भी 22 प्रति‍शत स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों की कमी है. यही जानकारी इन केन्‍द्रों में पदस्‍थ डॉक्‍टरों के बारे में है. देश के प्राथमि‍क स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों में 34 हजार 68 डॉक्‍टरों के पद स्‍वीकृत हैं इनमें से 8774 पद खाली पड़े हैं. इस संदर्भ में और जानकारि‍यां हैं, जो लगभग ऐसी ही हैं. अब सवाल यही है कि ऐसी स्‍थितियों में ऐसी कहानि‍यां क्‍यों न सामने आएं.

राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के पूर्व फेलो हैं, और सामाजिक सरोकार के मसलों पर शोधरत हैं…

ये हैं इंग्लैंड के मोईन अली, किया ऐसा कारनामा जो क्रिकेट में कभी नहीं हुआ

इंग्लैंड ने दक्षिण अफ्रीका को ओल्ड ट्रैफर्ड में खेले गए चौथे और अंतिम टेस्ट में 177 रन से हरा दिया. इस जीत के साथ इंग्लैंड ने सीरीज पर 3-1 से कब्जा जमा लिया

नई दिल्ली: दक्षिण अफ्रीका को अपनी धरती पर टेस्ट सीरीज में शिकस्त देने के लिए इंग्लैंड को 19 साल इंतजार करना पड़ा. इस ऐतिहासिक जीत के हीरो रहे इंग्लैंड के ऑलराउंडर मोईन अली. इस ऑलराउंड प्रदर्शन के दम पर यह उपलब्धि हासिल करने वाले मोईन 8वें क्रिकेटर बन गए हैं. इंग्लैंड ने दक्षिण अफ्रीका को ओल्ड ट्रैफर्ड में खेले गए चौथे और अंतिम टेस्ट में 177 रन से हरा दिया. इस जीत के साथ इंग्लैंड ने सीरीज पर 3-1 से कब्जा जमा लिया. मोईन अली ने दूसरी पारी में 69 रन देकर पांच विकेट लिए. इतना ही नहीं, मोईन अली ने दूसरी पारी में 75 रन की नाबाद पारी खेलकर टीम को 243 के सम्माजनक स्कोर पर पहुंचाया था.

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मोईन अली से जुड़ी 5 बातें

  1. मोईन अली ने चार मैचों की सीरीज में बल्ले से अहम योगदान देते हुए 252 रन बनाए. उन्होंने अपनी फिरकी के जाल में विपक्षी बल्लेबाजों को फांसते हुए 15.64 के औसत से 25 विकेट लिए. टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में यह पहला मौका है, जब किसी खिलाड़ी ने चार मैचों की सीरीज में 250 से ज्यादा रन बनाने के साथ 25 विकेट भी चटकाए हो.
  2. पांच या उससे ज्यादा मैचों की सीरीज में आठ प्लेयर यह करिश्मा कर चुके हैं.
  3. मोईन इंग्लैंड की तरफ से 8वें ऐसे खिलाड़ी बन गए हैं, जिन्होंने किसी टेस्ट सीरीज में 200 रन बनाए और 20 विकेट भी लिए.
  4. साल 2005 में इंग्लैंड के ऑलराउंडर एंड्रयू फ्लिंटॉप ने ऐसा ही कारनामा किया था, यानी मोईन ने 12 साल के बाद एक ऑलराउंडर के तौर पर ऐसे प्रदर्शन को फिर से दोहराया.
  5. मोइन अली ने द. अफ्रीका के खिलाफ पिछले तीन टेस्ट मैचों में 87, 7, 18, 27, 16 और 8 रन की पारी खेली. वहीं इन मैचों में विकेट की बात करें तो उन्होंने क्रमश: 4, 6, 0, 4, 0 और 4 विकेट लिए.

हरियाणा के बीजेपी नेता पर सरेआम भड़क गईं अभिनेत्री रवीना टंडन, बोलीं- तुम कायर हो

हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष रामवीर भट्टी द्वारा IAS की बेटी पर दिये बयान के चलते फिल्म अभिनेत्री रवीना टंडन ने उन्हें खरी-खोटी सुनाई है। रवीना टंडन ने बीजेपी नेता रामवीर भट्टी पर भड़कते हुए कहा है कि ये कायर हैं, इन लोगों का बस चले तो ये सूरज ढलने के बाद अपनी बेटियों को ताले में बंद कर दें। आपको बता दें कि रामवीर भट्टी ने सोमवार को हरियाणा में बीजेपी अध्यक्ष के बेटे द्वारा एक आइएएस की बेटी को रात के अंधेरे में छेड़ने के मामले में विवादित बयान देते हुए कहा था कि उस लड़की को इतनी रात में अकेले नहीं घूमना चाहिए था। रामवीर भट्टी ने ये भी कहा था कि इस समय माहौल बहुत खराब है, इसलिए रात 12 बजो के बाद लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। बीजेपी नेता के इस बयान के मीडिया में आने के बाद राजनीतिक दलों से लेकर सोशल मीडिया तक पर उनकी जमकर आलोचना हुई। खुद भारतीय जनता पार्टी के सासंद सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि वो रामवीर के इस बयान के लिए उनपर कोर्ट में मुकदमा करेंगे। रामवीर भट्टी की आलोचना करनेवालों में एक नाम रवीना टंडन का भी जुड़ गया है। रवीना ने रामबीर भट्टी के बयान को रिट्वीट करते हुए ट्वीट किया कि ये कायर लोग अब बी उस लड़के की तरफदारी में उलजलूल बातें बोल रहे हैं। रवीना ने लिखा कि ये लोग सूरज ढलने के बाद अपनी बेटियों को ताले में बंद कर देने वाले लोग हैं।

रवीना टंडन के इस ट्वीट को सोशल मीडिया पर लोग खूब पसंद कर रहे हैं। यूजर्स रवीना की बातों से सहमति जताते हुए रामवीर भट्टी जैसे लोगों की मानसिकता पर सवाल उटा रहे हैं।

 

आपको बता दें कि हरियाणा में एक IAS की बटी ने बीजेपी नेता सुभाष बराला के बेटे विकास पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। लड़की का आरोप है कि विकास बराला और उसका दोस्त आशीष कुमार एक पेट्रोल पंप से ही उनकी कार का पीछा कर रहे थे और कार का दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। लड़की के कई बार फोन करने पर पुलिस वहां पहुंची और दोनों लड़कों को गिरफ़्तार कर लिया। गिरफ्तार करने के अगले दिन ही उन सबको जमानत मिल गई। पीड़िता ने उस रात की घटना का जिक्र करते हुए अपने फेसबुक पेज पर अपना दर्द बयां करते हुए लिखा कि मैं खुशकिस्मत हूं कि रेप के बाद नाले में नहीं मिली।

पाकिस्तान के कई परिवार गाय के गोश्त को हाथ नहीं लगाते

कुछ दिनों पहले कुछ बड़ों के साथ बैठे थे और भारत में गोमांस पर होने वाली हिंसक घटनाओं पर बात हो रही थी कि अचानक उनमें से एक बुज़ुर्ग ने कहा कि भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि जिसने गाय बनाई.

पाकिस्तान के पंजाब सूबे के शहर के बीच हाफ़िज़ाबाद में होने वाली इस बातचीत के दौरान थोड़ी चुप्पी के बाद उदास आंखों के साथ पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए बुज़ुर्ग ग़ुलाम हसन कहते हैं कि हमारे यहां बाप-दादा के समय से गाय पाली तो जाती है लेकिन कभी उसके मांस घर की दहलीज के अंदर नहीं आने दिया.

 

उन्होंने कहा, “आने भी क्यों देते … मेरा जिगरी दोस्त डॉक्टर हीरालाल पड़ोसी था, ग़मी व खुशी में बढ़-चढ़ कर शरीक होता था तो किस मुंह से गाय का मांस खाते जिसे वह पवित्र मानता था.”

पाकिस्तान का एक परिवार
पाकिस्तान में अब भी कई परिवार हैं जो दालें खाना पसंद नहीं करते

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के शहर हाफ़िज़ाबाद के निवासी ग़ुलाम हसन की बातें आज भी विभाजन से पहले यहां पाई जाने वाली धार्मिक सहिष्णुता के दर्शाती है जिसे सत्तर वर्ष बीतने के बाद आज भी कई परिवार जीवित रखे हुए हैं.

इन परंपराओं के इतिहास के बारे में जिज्ञासा हुई तो पंजाब की तारीख़ और संस्कृति पर कई पुस्तकों के लेखक प्रोफ़ेसर असद सलीम शेख़ से संपर्क किया और अपने प्रश्न उनके सामने रखे.

प्रोफ़ेसर असद सलीम शेख़

प्रोफ़ेसर असद सलीम शेख़ ने बताया कि भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों के दो वर्ग हैं जिनमें एक वर्ग स्थानीय नहीं था जो अरब, तुर्की, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान आदि से आने वाले मुसलमान थे और उन सभी मुसलमानों के रस्मो-रिवाज, सभ्यता वह संस्कृति वही थी जो वे अपने क्षेत्रों से लाए थे.

 

वो कहते हैं, “दूसरा वर्ग वह था जो स्थानीय हिंदुओं का था और धर्म बदल कर मुसलमान हुआ था. इसमें दूसरे क्षेत्रों से आने वाले मुसलमान हर तरह के मांस का उपयोग करते थे लेकिन दूसरा वर्ग गाय का मांस खाने से परहेज़ करता रहा क्योंकि वह हिंदुओं के साथ सदियों से रह रहे थे और उनकी सभ्यता उनके अंदर रची-बसी रही और मुसलमान होने के बावजूद उन्होंने इन पहलुओं को छोड़ा नहीं.”

लेकिन क्या केवल यही पहलू था जिसकी वजह से बहुत सारे मुसलमान घरों में बकरे का मांस इस्तेमाल किया जाता है लेकिन गोमांस पसंद नहीं किया जाता?

इस पर प्रोफ़ेसर असद ने बताया, “उपमहाद्वीप में अक्सर स्थानों पर हिंदुओं के अनुपात में मुसलमान अल्पसंख्यक थे जिसकी वजह से यह पहलू भी था कि किसी ऐसी परंपरा को नहीं अपनाया जाए जिसके कारण बहुमत की धार्मिक भावनाएं आहत हों या जिससे झगड़े का ख़तरा हो.”

 

उन्होंने कहा कि इसके अलावा “भाईचारा और सहिष्णुता भी थी जिसकी वजह से बाद में किसी क्षेत्र में अगर मुसलमान बहुमत में आ गए तो भी उन्होंने गोमांस खाने परहेज़ ही किया” और इसी वजह से अकबर बादशाह चूँकि सक्योलर था तो उसने धार्मिक सहिष्णुता को बनाए रखने के लिए गाय के ज़बह करने पर पाबंदी भी लगाई.

गाय

प्रोफ़ेसर असद की बातें उस वक़्त साफ़ हुईं जब हाफ़िज़ाबाद की तहसील पिंडी भट्टयाँ के एक घर में जाने का मौक़ा मिला.

गृहिणी शाज़िया तुफ़ैल जब दस्तरख़ान पर खाना परोस रहीं थीं तो मैंने पूछ लिया कि क्या आपने गाय का मांस कभी पकाया है, उस पर उनकी प्रतिक्रिया ऐसे थी जैसे कोई गुस्ताख़ी कर दी हो.

शाज़िया ने दोनों कानों को हाथ लगाते हुए कहा “ना ना हमारे घर कभी गाय का गोश्त नहीं आया. हमारे बुज़ुर्गों से रवायत है कि गाय का मांस कभी घर नहीं लाया गया और न ही इसे पसंद किया जाता है. यह परंपरा दशकों से चली आ रही है और यही कोशिश है कि अगली पीढ़ी भी इसका पालन करे.”

इस इलाक़े में शाज़िया तुफ़ैल ऐसी एकमात्र महिला नहीं जिनके यहाँ गाय का गोश्त इस्तेमाल नहीं किया जाता बल्कि कई ऐसे परिवार हैं जिन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की अनमोल यादों को संभाल कर रखा हुआ है.

मोदीजी के राज में संवाद नहीं केवल बल प्रयोग: मेधा पाटकर

मध्य प्रदेश में बांध प्रभावितों के लिए मुआवज़े और पुनर्वास की मांग को लेकर अनशन कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को पुलिस ने अनशन स्थल से हटाकर ज़बरदस्ती अस्पताल में भर्ती करा दिया है.

मेधा पाटकर समेत 12 लोग सरदार सरोवर बांध के प्रभावितों की मांगों को लेकर धार ज़िले के चिखल्दा गांव में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठै थे.

अनशन के 12वें दिन पुलिस ने मेधा पाटकर समेत छह लोगों को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में अनशन स्थल से ज़बरदस्ती हटा दिया.

नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि इस दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया जिसमें कई लोग घायल हुए हैं

‘कील वाले डंडे’

आंदोलनकर्मी
कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने बल प्रयोग किया

आंदोलन की कार्यकर्ता हिमशी सिंह उस वक़्त वहां मौजूद थीं. उनका कहना है कि चिखल्दा गांव में इस वक़्त ख़ौफ का माहौल है.

हिमशी सिंह का आरोप है कि पुलिस ने मेधा पाटकर को ले जाने के दौरान भारी बल प्रयोग किया जिसमें कई लोगों को गंभीर चोटें आई हैं.

उन्होंने कहा, ”पुलिस जिन डंडों का इस्तेमाल कर रही थी, उसमें कीलें लगी हुई थीं.”

गिरफ्तारी नहीं, इलाज: शिवराज

मेधा पाटकर

वहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि मेधा पाटकर को गिरफ्तार नहीं किया गया है बल्कि अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

शिवराज ने ट्वीट कर कहा, ‘मैं संवेदनशील व्यक्ति हूं. चिकित्सकों की सलाह पर मेधा पाटकर जी व उनके साथियों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है.’

उन्होंने आगे लिखा कि ‘मेधा पाटकर और उनके साथियों की स्थिति हाई कीटोन और शुगर की वजह से चिंतनीय थी. उनके स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के लिए हम प्रयासरत हैं’.

डूब क्षेत्र से 40 हज़ार लोग प्रभावित

शिवराज चौहान के ट्वीट

उधर अनशन स्थल से हटाए जाने से पहले मेधा पाटकर ने कहा, ”आज मध्य प्रदेश सरकार हमारे 12 दिनों से बैठे 12 साथियों को मात्र गिरफ्तार करके जवाब दे रही है. यह कोई अहिंसक आंदोलन का जवाब नहीं है. मोदी जी के राज में, शिवराज जी चौहान के राज में एक गहरा संवाद नहीं, जो हुआ उस पर जवाब नहीं. आंकड़ों का खेल, कानून का उल्लंघन और केवल बल प्रयोग.”

सरदार सरोवर बांध से 192 गांवों के 40 हज़ार परिवार प्रभावित होंगे. उनका पूरा इल़ाका डूब जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि 31 जुलाई तक पूरी तरह पुनर्वास के बाद ही बांध की ऊंचाई बढ़ाई जाए.

लेकिन पुनर्वास के लिए जो जगह बनाई गई है, उसकी हालत भी रहने लायक नहीं है.

गाय के नाम पर गबन: हरियाणा गौसेवा आयोग के सदस्य पर गौशाला संघ के 13 लाख रुपए हड़पने का आरोप

हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर ने 2015 में गौसेवा आयोग का गठन किया। इसमें कुल 11 सदस्य हैं जिनमे योगेंद्र आर्य भी शामिल हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा गौसेवा कल्याण बोर्ड के एक सदस्य पर संस्था का प्रमुख रहने के दौरान 13 लाख रुपये के गबन का आरोप है। कोलकाता से निकलने वाले अंग्रेजी दैनिक द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार पूरे राज्य में गौशालाएं चलाने वाले बोर्ड के पूर्व प्रमुख योगेंद्र आर्य हरियाणा गौ सेवा आयोग के सदसय् हैं। साल 2012 में वो आर्य समाज द्वारा चलाए जाने वाले हरियाणा राज्य गौशाला संघ के प्रमुख थे। करीब एक महीने पहले हरियाणा के कुरुक्षेत्र में 35 गायें मर गई थीं। कहा गया कि ये गायें चारे, पानी और आश्रय के अभाव में मर गईं। गायों की मौत के बाद ही आर्य पर मुकदमा दर्ज किया गया।

योगेंद्र आर्य पर जनवरी 2012 से सितंबर 2012 के बीच गौशाला संघ के बैंक खाते से 11.68 रुपये निकालने का आरोप है। आर्य पर गौशाला के लिए चंदे के रूप में इकट्ठा हुए 1.12 लाख रुपये न जमा करने का भी आरोप है। गौशाला संघ पूरे हरियाणा में करीब 225 गौशालाएं चलाता है। योगेंद्र आर्य के खिलाफ मामला तब दर्ज हुआ जब गौशाला संघ के वर्तमान प्रमुख शमशेर सिंह आर्य ने इस बाबत शिकायत दर्ज करायी। अपनी शिकायत में शमशेर आर्य ने योगेंद्र आर्य की गौसेवा आयोग की सदस्यता समाप्त करने की भी मांग की है। गौसेवा आयोग का गठन राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने किया है।

हरियाणा में साल 2015 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार बनी। बीजेपी सरकार बनने के बाद सीएम खट्टर ने गौसेवा आयोग का गठन किया। इस आयोग में कुल 11 सदस्य हैं जिनमे योगेंद्र भी शामिल हैं। योगेंद्र ने खुद पर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए टेलीग्राफ से कहा कि उनके खिलाफ उनके दुश्मनों ने शिकायत की है।

हरियाणा में खट्टर सरकार ने गौवंश से जुड़ा बेहद कड़ा कानून बनाया है। गौवंश के किसी जानवर की हत्या पर 10 साल तक की जेल और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। राज्य पशुपालन विभाग के निदेशक ने टेलीग्राफ से कहा कि मामले की रिपोर्ट राज्य सरकार के पास भेज दी गयी है। गौसेवा आयोग के चेयरमैन भानी राम मंगल ने अखबार से कहा कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है लेकिन आयोग के सदस्य दोषी होंगे तो उन पर कार्रवाई की जाएगी।