दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट में इन पदों पर निकली भर्तियां, ऑनलाइन करें आवेदन

नई दिल्‍ली: दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड (DSSSB) ने एलडीसी, फील्‍ड असिस्‍टेंट, फूड सेफ्टी ऑफिसल और लाइब्रेरियन पदों पर भर्ती के लिए नोटिफिकेशन जारी कर आवेदन आमंत्रित किया है. इच्छुक और योग्य अभ्यर्थी 21 अगस्‍त, 2017 तक आवेदन कर सकते हैं. दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड ने कुल 1074 पदों पर भर्ती के लिए आवेदन मंगाया है. इन पदों पर भर्ती की प्रक्रिया 1 अगस्‍त 2017 से शुरू होगी.

शैक्षणिक योग्यता :
दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड के एलडीसी, फील्‍ड असिस्‍टेंट, फूड सेफ्टी ऑफिसल और लाइब्रेरियन पदों पर भर्ती के लिए अलग अलग योग्‍यता निर्धारित की गई है. इनकी अधिक जानकारी के लिए आप बोर्ड की ऑफिशियल वेबसाइट देखें.

आयु सीमा :
इन पदों पर भर्ती के लिए आवेदक की न्‍यूनतम उम्र अलग-अलग पदों के अनुसार 18/20 साल होनी चाहिए. इसके साथ ही आवेदक की अधिकतम उम्र अलग-अलग पदों के अनुसार 20/30/37 साल से ज्‍यादा नहीं होनी चाहिए.

आवेदन शुल्‍क :
दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड के एलडीसी, फील्‍ड असिस्‍टेंट, फूड सेफ्टी ऑफिसल और लाइब्रेरियन पदों पर आवेदन करने के इच्‍छुक सामान्‍य और ओबीसी वर्ग के आवेदक को 100 रुपये ऑनलाइन माध्‍यम से जमा करना होगा. वहीं एससी/एसटी/पीडब्‍ल्‍यूडी वर्ग के आवेदकों के लिए यह निशुल्‍क होगा.

चयन प्रक्रिया :
दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड के एलडीसी, फील्‍ड असिस्‍टेंट, फूड सेफ्टी ऑफिसल और लाइब्रेरियन पदों पर भर्ती के लिए उम्मीदवारों का चयन परीक्षा और स्‍किल टेस्‍ट के आधार पर किया जाएगा. ऑनलाइन परीक्षा केवल दिल्‍ली में आयोजित की जाएगी.

ऐसे करें आवेदन :
दिल्‍ली सब ऑर्डिनेट सर्विसेज सेलेक्‍शन बोर्ड के एलडीसी, फील्‍ड असिस्‍टेंट, फूड सेफ्टी ऑफिसल और लाइब्रेरियन पदों पर भर्ती के लिए इच्‍छुक और योग्‍य उम्मीदवार 21 अगस्‍त, 2017 तक बोर्ड की ऑफिशियल वेबसाइट (www.dsssbonlie.nic.in) पर जाकर दिए गए निर्देशों के अनुसार ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं. इन पदों पर भर्ती के लिए आवेदन प्रक्रिया 1 अगस्‍त 2017 से शुरू होगी. ऑनलाइन आवेदन के बाद आवेदक आगे की चयन प्रक्रिया के लिए फॉर्म का प्रिंटआउट निकाल कर रख लें.

बनना चाहते हैं यूपी पुलिस का सिपाही, तो जान लें बदले हुए नियम

यूपी में अधिकतर युवाओं का सपना होता है कि पुलिस की वर्दी पहनें. अभी तक की प्रक्रिया में वर्तमान की बीजेपी ने सरकार ने कुछ बदलाव किए हैं. उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में पुलिस भर्ती के नियमों में फेरबदल करते हुए आज तय किया कि अब कांस्टेबल की भर्ती के लिए केवल लिखित परीक्षा होगी और उसी के आधार पर चयन होगा. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई राज्य मंत्रिपरिषद की बैठक में यह फैसला किया गया.

बैठक के बाद राज्य सरकार के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा ने कहा, ‘पुलिस भर्ती के कुछ नियम बदले गये हैं. अब पुरूष वर्ग में 18 से 22 वर्ष और महिला वर्ग में 18 से 25 वर्ष आयु के अभ्यर्थी कांस्टेबल पद के लिए आवेदन कर सकते हैं.’ उन्होंने कहा कि पहले दसवीं पास के लिए 100 अंक, 12वीं पास के लिए 200 अंक और शारीरिक दक्षता के लिए 200 अंक जोड़ने की व्यवस्था थी . इस व्यवस्था को समाप्त कर दिया गया है और अब केवल लिखित परीक्षा होगी . शारीरिक दक्षता परीक्षा भी केवल पास करनी होगी.

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शर्मा ने कहा कि शारीरिक दक्षता के मानक पूर्ववत रहेंगे लेकिन इसके अंक जुडे़ंगे नहीं बल्कि इसे केवल पास करना भर पर्याप्त होगा. लेकिन यदि इसमें फेल हो गये तो भर्ती प्रक्रिया से बाहर होना पडे़गा. उन्होंने बताया कि लिखित परीक्षा में ‘नेगेटिव मार्किंग’ होगी और इसका अनुपात भर्ती बोर्ड तय करेगा. शर्मा ने बताया कि नयी व्यवस्था में 300 अंक के वस्तुनिष्ठ प्रश्न होंगे, जिनमें नेगेटिव अंक की व्यवस्था होगी .

प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद प्रमुख सचिव (गृह) अरविन्द कुमार ने कहा कि शारीरिक दक्षता परीक्षा में दौड़ के मानक अब पहले से कडे़ कर दिये गये हैं. पुरूष वर्ग में 4.8 किलोमीटर की दौड़ अब 27 मिनट की बजाय 25 मिनट में पूरी करनी होगी. इसी तरह महिला वर्ग में 2.4 किलोमीटर की दौड़ 16 मिनट की बजाय 14 मिनट में पूरी करनी होगी .

नीतीश सरकार के मंत्री बोले- ‘भारत माता की जय’ न कहने वाले पत्रकार पाकिस्तान समर्थक

पटना: बिहार की नई नीतीश सरकार में मंत्री विनोद कुमार सिंह ने मंगलवार को एक बड़े विवाद को जन्म दे दिया. उन्होंने भाजपा के एक समारोह में उनके साथ ‘भारत माता की जय‘ का नारा न लगाने वाले मीडियाकर्मियों को ‘पाकिस्तान का समर्थक’ करार दे दिया. इससे पहले इसी समारोह में भाजपा की बिहार इकाई के अध्यक्ष नित्यानंद राय ने कहा कि मस्जिदों से अजान और चर्च से घंटियों की आवाज के बजाय ‘भारत माता की जय’ की आवाज आनी चाहिए. राय हालांकि अपनी बात पर ज्यादा देर अडिग न रह सके. बाद में उन्होंने यू-टर्न ले लिया और कहा कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा था. नीतीश कुमार सरकार में खदान एवं भूगर्भीय मामलों के मंत्री व भाजपा नेता विनोद कुमार सिंह ने राज्य की नई सरकार में शामिल भाजपा के 12 मंत्रियों के सम्मान में हुए संकल्प सम्मेलन में लोगों से कहा कि वे उनके साथ ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाएं.

लेकिन, जब कार्यक्रम में मौजूद मीडियाकर्मियों ने यह नारा नहीं लगाया तो सिंह ने इस पर नाराजगी जताई. उन्होंने कहा, “आप पहले भारत माता की संतान हैं, पत्रकार बाद में हैं. अगर आप मेरे साथ जोर से भारत माता की जय का नारा नहीं लगाते तो क्या आप पाकिस्तान माता के समर्थक हैं?” एक-दो को छोड़कर किसी भी पत्रकार ने मंत्री की इस बात पर ऐतराज नहीं जताया

बिहार बीजेपी अध्यक्ष नित्यानंद राय के बयान पर भी विवाद: इससे पहले, समारोह शुरू होने पर बिहार भाजपा के अध्यक्ष नित्यानंद राय ने कहा कि मस्जिद और चर्च से अजान और घंटी के बजाय ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ की आवाज आनी चाहिए.

यह अहसास होने पर कि उन्होंने एक विवादित बयान दे दिया है, राय ने बात बदलते हुए मीडिया से कहा, “मैंने कहा था कि मस्जिद और चर्च से भारत माता की जय और वंदे मातरम् की आवाज आनी चाहिए. मेरा मतलब यह नहीं था कि यह अजान और घंटी की जगह पर आनी चाहिए.”

विपक्षी राजद ने सिंह और राय के बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इन्होंने अपने ‘वास्तविक एजेंडे’ को दिखा दिया है.

जबकि जनता दल (युनाइटेड) प्रवक्ता ने कहा कि यह अभिव्यक्ति की निजी आजादी है और उन्हें इस पर कुछ नहीं कहना है.

याद रहे, नीतीश कुमार चार साल पहले अपनी पार्टी का भाजपा से नाता तोड़ने के बाद पाकिस्तान गए थे, ताकि लोग उन्हें धर्मनिरपेक्ष नेता मानें.

प्रेस रिव्यू: सुभाष बराला के भतीजे पर रेप पीड़िता को धमकाने का आरोप

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने ख़बर दी है कि अब हरियाणा भाजपा अध्यक्ष सुभाषा बराला के भतीजे कुलदीप बराला पर एक नाबालिग बलात्कार पीड़िता को केस वापस लेने के लिए धमकाने का मामला सामने आया है.

अख़बार ने लिखा है कि मामला मई का है और इसमें कुलदीप बराला के एक रिश्तेदार पर अपहरण और बलात्कार के आरोप हैं. पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा पुलिस से मामले पर 31 अगस्त तक स्टेटस रिपोर्ट मांगी है.

सुभाष बराला के बेटे विकास बराला पहले ही चंडीगढ़ में एक आईएएस अफ़सर की बेटी का पीछा करने के केस में फंसे हैं. भाजपा पर उन्हें बचाने की कोशिश के आरोप भी लगे हैं.

ये सिर्फ़ मेरी जीत नहीं, पैसे और ताकत की हार भी है: अहमद पटेल

गुजरात राज्यसभा चुनावों में भारी उठापटक के बाद अहमद पटेल आख़िरकार अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे. उनके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी भी चुनाव जीत गए. अहमद पटेल को 44 वोट मिले जबकि स्मृति ईरानी को 46 और अमित शाह को भी 46 वोट मिले. चौथे उम्मीदवार बलवंत सिंह राजपूत को 38 वोट मिले.

क्रॉस वोटिंग की वजह से अहमद पटेल के जीतने पर संशय था. लेकिन फिर कांग्रेस की मांग मानते हुए चुनाव आयोग ने दो बागी कांग्रेस विधायकों के वोट रद्द कर दिए और भाजपा का गणित बिगड़ गया.

कांग्रेस ने क्रॉस वोटिंग करने वाले अपनी ही पार्टी के दो विधायकों राघवजी पटेल और भोला गोहिल के वोट रद्द करने की मांग की थी क्योंकि कथित तौर पर उन्होंने अपने मतपत्र अनाधिकारिक लोगों को दिखा दिए थे.

शाम 5 बजे ही गिनती शुरू होनी थी, लेकिन कांग्रेस की शिकायत के बाद गिनती रोक दी गई थी. देर रात वोटों की गिनती शुरू हुई और 174 वोटों को वैध माना गया.

नतीजों के बाद अहमद पटेल ने ट्विटर पर ‘सत्यमेव जयते’ लिखते हुए अपनी जीत का एलान किया. उन्होंने लिखा, ‘यह सिर्फ मेरी जीत नहीं है. यह पैसे, ताक़त और राज्य की मशीनरी के खुले इस्तेमाल की हार है. मैं उस प्रत्येक विधायक को धन्यवाद देता हूं जिन्होंने भाजपा की अभूतपूर्व धमकियों और डर के बावजूद मुझे वोट दिया. भाजपा ने अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी और राजनीतिक आतंक को ही उजागर किया है. गुजरात के लोग चुनाव में उन्हें जवाब देंगे.’

अहमद पटेल का ट्वीटइमेज कॉपीरइटTWITTER/@AHMEDPATEL

दो वोटों की वजह से फंसा था पेंच

कांग्रेस का आरोप था कि उनकी ही पार्टी के विधायक राघवजी पटेल और भोला गोहिल ने वोट डालने के बाद अपने बैलट आधिकारिक पार्टी प्रतिनिधि के अलावा भाजपा प्रतिनिधि को भी दिखाए थे.

नियमों के मुताबिक, वोट करने वाले विधायकों को अपने बैलट सिर्फ़ अपनी पार्टी के आधिकारिक प्रतिनिधि (चुनाव एजेंट) को दिखाने होते हैं.

देर रात 11:40 पर कांग्रेस नेता अर्जुन मोडवाडिया ने दोनों के वोट रद्द होने की पुष्टि की. उन्होंने कहा कि जब दोनों विधायकों ने वोट दिया तो कांग्रेस के चुनाव प्रतिनिधि शक्तिसिंह गोहिल ने उसी समय खड़े होकर आपत्ति दर्ज कराई थी.

उन्होंने कहा, ”उस समय अधिकारियों ने कार्रवाई नहीं की. दोनों वोट बैलट बॉक्स में डाल दिए गए. लेकिन तभी रिटर्निंग अफ़सर ने आश्वासन दिया था कि वीडियो देखकर फ़ैसला करेंगे.”

वीडियो सार्वजनिक किया जाए: भाजपा

गुजरात के उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल ने कहा कि अगर मतदान का वीडियो सार्वजनिक किया जाए तो सबको पता चल जाएगा कि वोट रद्द करने का फ़ैसला ग़लत है. उन्होंने वीडियो सार्वजनिक करने की मांग की और यह भी कहा कि इससे नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा और भाजपा तीनों सीटें जीतेगी.

उन्होंने कहा, ”वीडियो में हमारे चुनाव प्रतिनिधि दिख ही नहीं रहे हैं और दोनों विधायकों का वोट शक्तिसिंह गोहिल के अलावा किसी ने नहीं देखा है, बल्कि नियम का उल्लंघन शक्तिसिंह गोहिल ने किया, जब उन्होंने देखा कि राघवजी पटेल ने कांग्रेस के ख़िलाफ़ वोट दिया है तो वो गुस्से में खड़े हो गए और मतपत्र छीनने की कोशिश की.”

वाघेला खेमे के दोनों विधायक

शंकर सिंह वाघेला
इमेज शंकर सिंह वाघेला ने हाल ही में छोड़ी है कांग्रेस

दोनों विधायक शंकर सिंह वाघेला खेमे के माने जाते हैं जिन्होंने हाल ही में कांग्रेस छोड़ी है. वाघेला ने मंगलवार सुबह समाचार चैनलों से बात करते हुए कहा था कि उन्होंने कांग्रेस को वोट नहीं दिया है क्योंकि अहमद पटेल चुनाव हार रहे हैं और वो अपना वोट ख़राब करना नहीं चाहते.

दोनों पार्टियों के बड़े नेता पहुंचे थे चुनाव आयोग

मंगलवार को मतदान के बाद पहले कांग्रेस शिकायत लेकर चुनाव आयोग गई और उसकी आपत्ति के ख़िलाफ वरिष्ठ भाजपा नेताओं का समूह भी आयोग पहुंच गया. दोनों पार्टियां दिन भर में तीन-तीन बार चुनाव आयोग पहुंचीं. कांग्रेस की तरफ़ से पी चिदंबरम, रणदीप सुरजेवाला और अशोक गहलोत ने चुनाव आयोग में अपनी शिकायत दी.

भाजपा की तरफ़ से अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद, पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमण समेत छह केंद्रीय मंत्रियों ने चुनाव आयोग पहुंचकर कांग्रेस की शिकायत को बेबुनियाद करार दिया.

अमित शाह
GETTY IMAGES

गुजरात से राज्यसभा चुनावों की तीन सीटें हैं और चार उम्मीदवार खड़े थे. भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की जीत की राह आसान मानी जा रही थी, लेकिन तीसरी सीट के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के सलाहकार और वरिष्ठ कांग्रेस नेता अहमद पटेल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी थी. उनका मुक़ाबला हाल ही में कांग्रेस छोड़ भाजपा में आए बलवंत सिंह राजपूत से था.

राहुल गांधी, अहमद पटेल

हाल ही में छह कांग्रेस विधायकों के पार्टी छोड़ने से यह चुनाव कांटे का हो गया था. इन छह में से तीन विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे. इसके बाद कांग्रेस विधायकों को प्रभावित किए जाने से बचाने के लिए पार्टी ने उन्हें बेंगलुरु के एक रिसॉर्ट में भेज दिया था. मतदान से एक दिन पहले ही उन्हें एक साथ अहमदाबाद लाया गया.

नज़रिया: अहमद पटेल की जीत कांग्रेस के लिए संजीवनी बूटी

राज्यसभा के चुनाव गुजरात में पहले भी हुए हैं. अहमद पटेल का ये पांचवा राज्यसभा चुनाव था. इससे पहले राज्यसभा का चुनाव एक फ़्रेंडली मैच की तरह होता था जिसका परिणाम आमतौर पर मालूम होता था कि अगर इतनी सीटें हैं तो कौन-कौन लोग चुनकर आएंगे.

इस बार भी गुजरात का राज्यसभा चुनाव कुछ अलग नहीं था. लेकिन दो बातों की वजह से सारा समीकरण बदल गया. एक तो ये कि शंकरसिंह वाघेला ने नेता विपक्ष के पद से इस्तीफ़ा दिया और दूसरा ये कि बीजेपी ने ये मन बना लिया कि इस चुनाव को वो बहुत ऊंचे स्तर पर ले जाएगी और जीतेगी. इन दो कारकों के होने की वजह से ये एक बहुत हाई वोल्टेज ड्रामा की शक्ल में सामने आया.

घटनाक्रम को देखें तो ये बात समझ में आती है कि बीजेपी ने इस चुनाव को इस स्तर तक ले जाने का काफ़ी पहले ही मन बना लिया था.

इस योजना के तहत बीजेपी ने सबसे पहला काम ये किया कि शंकर सिंह वाघेला पर प्रश्न उठाना शुरू किया और ऐसा माहौल तैयार कर दिया जिससे ये लगने लगा कि वाघेला शायद बीजेपी में जा रहे हैं. जबकि हक़ीक़त ये थी कि उस समय तक वाघेला का ऐसा कोई इरादा नज़र नहीं आ रहा था.

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Image captionसोनिया गांधी और राहुल गांधी

इससे ऐसा संकेत भी मिला की बीजेपी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह के स्तर पर बहुत कुछ खिचड़ी पक रही है.

जैसे-जैसे वक्त गुज़रता गया, कांग्रेस में घटनाक्रम बदले, बाग़ी खड़े हुए और हालत ये हो गई कि पार्टी को अपने विधायकों को टूट से बचाने के लिए गुजरात से बाहर ले जाना पड़ा.

वहां बेंगलुरु में केंद्र सरकार ने जिस तरह इनकम टैक्स और ईडी की मदद से कथित तौर पर दबाव बनाया उससे ये ज़ाहिर होने लगा कि भारतीय जनता पार्टी इस चुनाव में अपना सब-कुछ झोंक रही है.

बीजेपी ने क्यों बनाया इतना महत्वपूर्ण?

अब सवाल उठता है कि ऐसा क्या था इस चुनाव में कि भारतीय पार्टी ने अपने समय, रणनीति, ऊर्जा – सबकुछ लगा दिया.

मुझे लगता है कि बीजेपी चाहती थी कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और गोवा में सरकार बनाने के बाद मिले राजनीतिक लाभ को और मज़बूत करे और मनोवैज्ञानिक रूप से कांग्रेस को भरपूर नुकसान पहुंचाए.

मनोवैज्ञानिक नुकसान का आशय यहां यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार अहमद पटेल अगर अपने गढ़ में ये चुनाव हार जाते हैं तो कांग्रेस के काडर के लिए ये एक बहुत बड़ा सदमा होगा और साथ ही बीजेपी के लिए ये एक बहुत बड़ी राजनीतिक जीत वाली स्थिति होगी.

दूसरी बात ये है कि सोनिया गांधी भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों के दिमाग़ में एक बगवेयर के रूप में बैठी हुई हैं जिनका उत्तरोत्तर कमज़ोर होना पार्टी के हित में है.

बीजेपी ये बात नहीं भूल पाती कि सोनिया गांधी ने अकेले अपने दम पर 2004 में न केवल पार्टी को खड़ा किया था बल्कि अटल जी के इंडिया शाइनिंग की भी हवा निकाल दी थी.

यही वजह है कि बीजेपी के रणनीतिकार ये कोशिश करते हैं कि सोनिया गांधी और उनके नेतृत्व वाली कांग्रेस को जितना संभव हो सके नीचे लाया जाए.

नरेंद्र मोदीइमेज कॉपीरइटEPA
Image captionभारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

दूसरी बात, आरएसएस को ये लगता है कि भारत में हर बात कहीं न कहीं कांग्रेस से जुड़ जाती है. इसलिए वो ऐसे भारत की कल्पना करना चाहती है जिसमें कांग्रेस न हो तभी भारत निर्माण हो सकता है.

यही वजह है कि बीजेपी ने ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा चलाया हुआ है. हालांकि ये बात अलग है कि कांग्रेस मुक्त भारत बनाने की कोशिश में खुद बीजेपी कांग्रेस युक्त होती जा रही है.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व वाली बीजेपी की रणनीति ये है कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में अगर दक्षिणपंथी विचारधारा को आगे बढ़ाना है तो पुरानी सोच और उसके प्रतीकों को उखाड़ना होगा.

उसी उखाड़ने की प्रक्रिया के तहत अहमद पटेल के बहाने एक सांघातिक प्रहार की कोशिश की गई, लेकिन इसे बीजेपी का दुर्भाग्य कहें या कांग्रेस का सौभाग्य कि बीजेपी का ये पासा उल्टा पड़ गया.

कांग्रेस के लिए अहमद पटेल की जीत के मायने

कांग्रेस के लिए ये जीत बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी क्योंकि कांग्रेस लंबे अरसे से बैकफ़ुट पर चल रही है. अहमद पटेल को हराने के लिए बीजेपी और सरकार दोनों ने मिलकर बेहद आक्रामक रणनीति तैयार की थी. लेकिन अब जबकि अहमद पटेल इस कांटे की टक्कर में विजेता बनकर उभरे हैं तो परसेप्शन के स्तर पर और मनोबल के स्तर पर इसका काफ़ी फ़ायदा कांग्रेस को मिलेगा.

इस साल के आखिर में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं. अहमद पटेल की जीत से कांग्रेस पार्टी के पास एक मौका आ गया है चीज़ों को ठीक करने का.

शंकर सिंह वाघेलाशंकर सिंह वाघेला

मोदीजी के गुजरात से केंद्र में जाने के बाद गुजरात बीजेपी में वैसी बात नहीं रही है जो पहले होती थी. वैसे भी कहते हैं कि वट वृक्ष के नीचे कुछ नहीं पनपता. तो मोदी जी के समय गुजरात बीजेपी में मोदी ही मोदी नज़र आते थे. दूसरे नंबर के नेता का भरपूर अभाव था.

जब मोदी जी केंद्र की राजनीति में चले गए तो उनकी जगह गुजरात में जो नेता उभरे उनमें वो बात नहीं है जो मोदी जी में थी. और सरकार जिस तरीके से चल रही है उसका भी जनता में कोई बहुत अच्छा संदेश नहीं जा रहा. इसका फ़ायदा कांग्रेस को मिल सकता है.

सामाजिक असंतोष भी बीजेपी के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है. पाटीदार, दलित और अन्य पिछड़े तबकों में सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर असंतोष है. इसका फ़ायदा कांग्रेस को मिलता नज़र आ रहा था, लेकिन वाघेला के साथ विधायकों के कांग्रेस छोड़कर जाने से पार्टी की चुनाव तैयारियों को एक धक्का लगा था. लेकिन अहमद पटेल की जीत से कांग्रेस को एक संजीवनी बूटी सी मिल गई है.

अगर पार्टी आलस नहीं करती और इस जीत के पैदा हुई ऊर्जा को संजो कर एक नई रणनीति के साथ चुनाव में उतरती है तो सत्ता का खेल बदल भी सकता है क्योंकि कांग्रेस एक इतना विशालकाय प्राण है कि उसको हिलाना मुश्किल होता है और चलाना और और भी मुश्किल. अगर वो अब भी नहीं चेतेगी तो बहुत मुश्किल हो सकती है.

बीजेपी इससे कैसे उबरेगी

बीजेपी का नियंत्रण इस समय नरेंद्र मोदी और अमित शाह के पास है. इन दोनों नेताओं की कार्यशैली ये है कि बड़ा धक्का लगने पर ये ऐसा कुछ नया कर डालते हैं जिससे सेटबैक का असर नहीं रह जाता. कांग्रेस अभी तक इस बात को समझ नहीं पाई है.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाहबीजेपी अध्यक्ष अमित शाह

ब्लैक मनी का इश्यू चला था तो नोटबंदी से आलोचना के पूरे माहौल को बदल दिया गया. कहने का मतलब है कि बीजेपी सदमे को भुलाकर तुरंत खड़ी हो जाने वाली पार्टी हो गई है और गुजरात को पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व बहुत गंभीरता से ले रहा है क्योंकि वो इसी ज़मीन से निकलकर नरेंद्र मोदी केंद्र तक पहुंचे हैं. इसलिए गुजरात का पार्टी के लिए बहुत बड़ा प्रतीकात्मक महत्व है और वो इसे हाथ से निकलता नहीं देख सकते. इसलिए पार्टी ने अभी से ही बूथ लेवल तक अपनी रणनीति बना ली है. जबकि दूसरी ओर कांग्रेस है जो ऊपर-ऊपर की बातों में उलझी पड़ी है.

अगर कांग्रेस को आगामी चुनाव में जीत के सपने को साकार करना है तो उसे नींद से जागना होगा और अहमद पटेल की जीत से मिली ऊर्जा को बहुत छोटे स्तर पर कार्य कर रहे पार्टी कार्यकर्ताओं तक पहुंचाना होगा. छोटी-छोटी जीत से ही बड़ी जीत का सपना साकार होता है.

आने वाले समय में 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं और कांग्रेस इस जीत से सबक लेकर एक समग्रता वाली रणनीति के साथ पूरी दमखम से काम करती है तो आज जिस हालत में पड़ी है उसका दूसरा पहलू भी देखने को मिल सकता है. लेकिन बीजेपी भी इन बातों को समझती है और वो अपने गढ़ को कमज़ोर होता नहीं देखना चाहेगी.

इटावा: मृत परिजनों को दफनाने के लिए नहीं है कब्रिस्तान, घर में ही बन रही है कब्र

विधानसभा चुनाव के दरम्यान उत्तर प्रदेश मे कब्रिस्तान और शमशान का मुददा बड़े जोर शोर से उछाला गया था लेकिन इस पर अब पूरी तरह से चर्चा बंद हो चुकी है । उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में चंबल नदी के किनारे बसे चकरगनर मे एक ऐसी मुस्लिम बस्ती है जहां के लोग अपने मृत परिजनों को अपने घरों में ही दफनाने मे लगे हैं। चकरनगर के बारे मे कहा जाता है कि महाभारत काल के दौरान पांडवों ने अज्ञातवास यहीं बिताया था  जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित चकरनगर इलाके में एक बस्ती है तकिया। यहां रहने वाली सुशीला बेगम काफी दुखी होकर कहती हैं कि हमें न धन चाहिए , न दौलत, न ही कुछ और। हमें तो सिर्फ दो गज़ जमीन चाहिए लेकिन हम इतने दुर्भाग्यशाली हैं कि हमें वो भी मयस्सर नहीं । यह तकलीफ सिर्फ सुशीला बेगम की नहीं है । बस्ती में रहने वाले करीब 70-80 मुस्लिम परिवारों को भी यही परेशानी है। वे अपने छोटे से घरों या यों कहें कि घरनुमा कमरों में ही अपने पुरखों की कब्र बनाने के लिए मजबूर हैं।

सुशीला बेगम अपने घर मे बनी कब्रों के बारे में बताते हुए वे फूट-फूट कर रोते हुए बताती हैं कि वैसे तो कोई अपना मर जाता है तो इंसान कुछ दिन रोता है, फिर उसकी यादें धुंधली होती जाती हैं लेकिन इन कब्रों के हमेशा सामने होने के कारण हमेशा अपनों के मरने की ही घटना दिखती है। हम जब भी कब्रों को देखते हैं, बातें ताजा हो जाती हैं। यही नहीं, इस बस्ती में कई ऐसे भी घर हैं, जहां कमरे में एक ओर कब्र है तो दूसरी ओर सोने का बिस्तर लगा है। यानी शयन कक्ष और कब्रिस्तान एक साथ हैं ।इसी बस्ती के ही यासीन अली बताते हैं कि हम सभी मजदूरी करते हैं। किसी के पास ज़मीन है ही नहीं । सालों पहले ग्राम समाज से घर के लिए जो जमीन मिली थीं, परिवार बढ़ने के साथ वो कम पड़ने लगीं । पहले हम खाली जमीन पर शव दफनाते थे, लेकिन बाद में जगह नहीं मिलने के कारण घरों में ही दफनाना पड़ रहा है । ऐसा नहीं है कि इस बात की किसी को जानकारी न हो। ये समस्या नई नहीं बल्कि सालों पुरानी है। ये बस्ती फकीर मुसलमानों की है। बस्ती के लोगों का कहना है कि इसके लिए हमने हर जगह दरख्वास्त दी, लेकिन आज तक कोई सुनवाई नहीं हुई।

इटावा के प्रशासनिक अधिकारी भी तकिया में कब्रिस्तान न होने की बात से वाकिफ हैं लेकिन वे भी यही समस्या बता रहे हैं जो कि ग्राम प्रधान राजेश यादव ने बताई। इटावा की जिलाधिकारी सेल्वा कुमारी जे कहती हैं कि आस-पास खाली जमीन है ही नहीं। किसी की निजी जमीन दी नहीं जा सकती है। कुछ दूर पर जमीन मुहैया कराई गई थी लेकिन वहां ये लोग कब्रिस्तान बनाने को राजी नहीं है। सेल्वा कहती हैं कि डेढ़ किलोमीटर दूर चांदई गांव में कब्रिस्तान के लिए उपलब्ध जमीन पर शव दफनाने के लिए लोगों को मनाने की कोशिश हो रही है। तकिया बस्ती की कुछ महिलाएं बताती हैं कि बच्चे अक्सर रात में जग जाते हैं क्योंकि कई घरों में कब्रें बिस्तर के बिल्कुल पास में ही बनी हुई हैं। बहरहाल, प्रशासन और स्थानीय जनप्रतिनिधि तकिया बस्ती के लोगों के लिए आस-पास ही किसी कब्रिस्तान के इंतजाम में लगे हैं लेकिन अभी तो इनकी यही मांग है कि मरने के बाद अपनी मातृभूमि में दफन होने के लिए इन्हें कम से कम दो गज जमीन तो मिल जाए ।

चंडीगढ़ छेड़छाड़ केस: मायावती ने पूछा, खामोश क्यों हैं भाजपा के नेता

हरियाणा भाजपा प्रमुख के बेटे और उसके साथी द्वारा चंडीगढ़ में एक युवती का पीछा करने के मामले में बसपा प्रमुख मायावती ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी की मांग करते हुए पूछा कि इस मामले में भाजपा के बड़े नेता खामोश क्यों हैं? उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के नेता इस मामले को दबा देने की कोशिश में हैं। मायावती ने पूछा, ‘क्या भाजपा नेताओं से जुड़े व्यक्तियों पर देश का कानून लागू नहीं होता? यह दोहरा रवैया क्यों?’  मायावती ने हरियाणा सरकार के ‘बेटी बचाओ’ अभियान के नारे पर तंज कसते हुए कहा कि जिस तरीके से विकास बराला प्रकरण को दबा देने की कोशिश चल रही है, वह बेहद चिंतनीय है। लखनऊ में जारी एक बयान में उन्होंने मांग की कि आरोपियों के खिलाफ तुरंत प्रभाव से अपहरण का मामला दर्ज किया जाए और उनकी अविलंब गिरफ्तारी की जाए।

उन्होंने मांग की कि महिला उत्पीड़न के दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाए। मायावती के मुताबिक जिस तरीके से अभियुक्त विकास बराला को हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर बचाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे कमजोर वर्ग में उनके खिलाफ असंतोष पैदा हो रहा है। विकास को पुलिस ने थाने से जाने कैसे दिया?’ उन्होंने कहा कि इन हालात में लोगों का गुस्सा बिल्कुल जायज है।  मायावती ने पूछा कि क्या भाजपा के नेता और उनके संबंधी देश के कानून से ऊपर हैं। क्या उन पर कानून लागू नहीं होता? उन्होंने कहा कि हरियाणा की हाल की घटनाओं से स्पष्ट हो गया है कि बेटी बचाओ, लव जेहाद, महिला सुरक्षा, गो रक्षा और एंटी-रोमियो जैसे नारे गढ़कर भाजपा ने मतदाताओं को लुभाया है और सत्ता पाई है। इन नारों का हकीकत से कोई लेना-देना नहीं है।

देश में भर में अपहरण, छेड़छाड़ और पीछा करने के मामले बढ़े

दिल्ली में महिला के प्रति अपराध के मामले सबसे ज्यादा रहे। यहां 17,104 केस प्रति एक लाख महिला आबादी पर 184.3 की अपराध दर से दर्ज हुए। असम इस मामले में दूसरे और हरियाणा छठे नंबर पर रहा।

देशभर में महिलाओं के संग 2015 में अपहरण, छेड़छाड़ और पीछा करने के मामले बढ़े हैं। हालांकि बलात्कार के मामलों में कमी आई है। ऐसा नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) का कहना है। एनसीआरबी के मुताबिक अगर 2014 से तुलना करें तो निश्चित रूप से बलात्कार के मामले घटे हैं। एनसीआरबी की 2016 के अपराध आंकड़ों की रिपोर्ट अभी आना बाकी है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2014 के मुकाबले 2015 में महिलाओं के प्रति अपराध में 3.1 फीसद की कमी आई। 2015 में जहां 3,27,394 मामले अपराध के दर्ज हुए, वहीं 2014 में यह संख्या 3,37,922 थी। इसी तरह बलात्कार के मामले 2015 में 5.7 फीसद कम हुए। 2014 में 36,735 मामले बलात्कार के दर्ज हुए थे वहीं 2015 में यह संख्या घटकर 3,651 रह गई।

2015 की रिपोर्ट में सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि महिलाओं के यौन प्रताड़ना संबंधी अपराध 2.5 फीसद बढ़ गए। इसमें छेड़छाड़, पीछा करना, घूरना वगैरह शामिल हैं। 2015 में 84,222 ऐसे मामले दर्ज किए गए जबकि 2014 में यह संख्या 82,235 थी। इसी तरह महिलाओं के अपहरण के मामलों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। 2014 में जहां 57,311 अपहरण हुए थे, वहीं 2015 59,277 अपहरण हुए। महिलाओं को शादी के लिए विवश करना अपहरण का प्रमुख कारण है। 2015 में 54 फीसद महिलाएं इसी कारण से अपह्रत की गईं। 2014 में इसी वजह से 50 महिलाएं अगवा की गई थीं। दिल्ली में महिला के प्रति अपराध के मामले सबसे ज्यादा रहे। यहां 17,104 केस प्रति एक लाख महिला आबादी पर 184.3 की अपराध दर से दर्ज हुए। असम इस मामले में दूसरे और हरियाणा छठे नंबर पर रहा।

राज्य मामले राष्ट्रीय हिस्सेदारी दर %
दिल्ली 17,104 52
तेलंगाना 15,135 4.6
ओडीशा 17,144 5.2
राजस्थान 28,165 8.6
हरियाणा 9,446 2.9
पश्चिम बंगाल 33,218 10.1

राज्य घटनाएं प्रति एक लाख महिला आबादी

दिल्ली 2,199 23.7
छत्तीसगढ़ 1,560 12.2
मध्य प्रदेश 4,391 11.9
ओडीशा 2,251 10.8
राजस्थान 3,644 10.5
महाराष्ट्र 4,144 7.3
उत्तर प्रदेश 3,025 3.0

नीतीश को चुनौती देने तैयार हुए शरद यादव? जारी क‍िया ब‍िहार की जनता से सीधा संवाद का कार्यक्रम

बिहार में महागठबंधन की सरकार टूटने के बाद इन दिनों जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव और सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बीच बढ़ती दूरी साफ दिखाई दे रही है। महागठबंधन टूटने के बाद नीतीश ने भाजपा के साथ मिलकर भले ही सरकार बना ली हो लेकिन शरद यादव ने अब नीतीश को चुनौती देने के लिए कमर कस ली है। शरद यादव बहुत ही जल्द बिहार की जनता के साथ सीधे संवाद करते हुए दिखाई देंगे। इस संवाद की जानकारी शरद यादव ने अपने ट्विटर हैंडल पर ट्वीट कर दी है। जनता से किए जाने वाले इस संवाद की एक सूची तैयार की गई है कि किस दिन शरद यादव प्रदेश की जनता के साथ रुबरु होंगे।

इस सूची के अनुसार 10 अगस्त को शरद यादव पटना से सोनपुर जाएंगे। सोनपुर के बाद वे हाजीपुर, सराय, भगवानपुर, गोरौल, कुढ़ानी, तुर्की, रामदयालु नगर, गोबरसाही और फिर भगवानपुर चौक जाएंगे। यहां जनता से संवाद कर शरद यादव मुजफ्फरपुर जाएंगे और यहीं पर रात को ठहरेंगे। इसके बाद 11 अगस्त उनका मुजफ्फरपुर में कार्यक्रम होगा। यहां कार्यक्रम खत्म करने के बाद शरद यादव चांदनी चौक, जीरो माइल, गरहा, बोचाहा, मझौली, सर्फुद्दीनपुर, जारंग, गायघाय, बेनीबाद और दरभंगा में आम जनता के साथ रुबरु होंगे और उनसे उनकी तकलीफों के बारे में जानेंगे।

बिहार की जनता से सीधे संवाद कार्यक्रम के आखिरी दिन 12 अगस्त को शरद यादव मधुबनी, सुपौल, सहरसा और मधेपुरा में आम जनता के बीच पहुंचेंगे और रात को मधेपुरी में ही विश्राम करेंगे। अपने इस कार्यक्रम के जरिए शरद यादव शायद नीतीश को बताना चाहते हैं कि जिस पार्टी के साथ मिलकर उन्होंने सरकार बनाने का कदम उठाया है वह बिलकुल गलत है। ऐसा लगता है कि इन कार्यक्रम के तहत शरद यादव नीतीश कुमार से अपनी नाराजगी जाहिर करना चाह रहे हैं। आपको बता दें कि ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि शरद यादव जल्द ही जदयू से अलग हो सकते हैं क्योंकि वे अपने बयान में पहले ही कह चुके हैं कि वे नीतीश कुमार के फैसले से इत्तेफाक नहीं रखते हैं। इस बयान से शरद यादव की नीतीश के प्रति नाराजगी साफ झलकती है।

गुजरात राज्यसभा चुनाव: अमित शाह की रणनीति फेल, कांग्रेसी अहमद पटेल जीते, चुनाव आयोग में भी बीजेपी की हार

गुजरात राज्यसभा चुनाव 2017 में मंगलवार (8 अगस्त) की रात को नाटकीय ढंग से घटनाक्रम बदले और तीसरी सीट पर कांग्रेस के अहमद पटेल जीत गए। तीन राज्यसभा सीटों में से दो पर भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह और केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की जीत हुई लेकिन इन दोनों की जीत की खुशी तीसरी सीट पर हुई हार के आगे फीकी पड़ गई। आखिर तक किसी को नहीं पता था कि तीसरी सीट जिसपर अहमद पटेल और बीजेपी की तरफ से बलवंत राजपूत आमने-सामने थे उसपर कौन जीतेगा। सारा विवाद दो कांग्रेसी विधायकों के वोट को लेकर खड़ा हुआ। दरअसल दोनों ने अपना वोट डालने के बाद यह दिखा दिया था कि उन्होंने किसको वोट दिया। इसपर कांग्रेस ने हंगामा कर दिया।

कांग्रेस का कहना था कि दोनों ने वोट की गोपनीयता का उल्लंघन किया है इसके चलते दोनों (भोलाभाई गोहिल और राघवजी भाई पटेल) का वोट कैंसल होना चाहिए। इस चीज के लिए कांग्रेस चुनाव आयोग पहुंच गई। इसी बीच वोटों की गिनती रुकवा दी गई। फिर आधी रात तक दोनों ही दलों के बड़े-बड़े नेता चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचने लगे। दोनों की तरफ से अपनी-अपनी दलीलें दी जा रही थी।

लेकिन अंत में चुनाव आयोग ने दोनों के वोट को खारिज कर दिया। आयोग ने निर्वाचन अधिकारी से कांग्रेस विधायक भोलाभाई गोहिल और राघवजी भाई पटेल के मतपत्रों को अलग करके मतगणना करने को कहा। आयोग के आदेश के अनुसार मतदान प्रक्रिया का वीडियो फुटेज देखने के बाद पता चला कि दोनों विधायकों ने मतपत्रों की गोपनीयता का उल्लंघन किया था। वोटों की गिनती रात को एक बजे शुरू हुई और लगभग दो बजे नतीजे आए। जीत के बाद अहमद पटेल ने ट्वीट कर ‘सत्यमेव जयते’ लिखा। उन्होंने कांग्रेस का साथ देने वाले सभी लोगों का शुक्रिया भी किया।

यह सीट अमित शाह और अहमद पटेल के लिए नाक का सवाल बन गई थी। दोनों को ही अपनी-अपनी पार्टी का ‘चाणक्य’ कहा जाता है। लेकिन अंत में बीजेपी दो सीट जीतकर भी खुश नहीं थी और चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ कोर्ट जाने की बात कह रही थी।

अजहरुद्दीन को कोर्ट ने मैच फिक्सिंग से किया मुक्त, क्या BCCI उन्हें देगी करोड़ों रुपए बकाया पेंशन?

नई दिल्ली: प्रशासकों की समिति और बीसीसीआई पदाधिकारियों की मंगलवार को होने वाली बैठक में भारत के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन की लंबी बकाया राशि पर बातचीत की जायेगी. समझा जाता है कि अजहर ने सीओए को बताया है कि आंध्र उच्च न्यायालय ने पांच साल पहले उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए तमाम आरोपों से बरी कर दिया था. उन्होंने अपने बकाया के बारे में भी पूछताछ की जो कुछ करोड़ रुपए हैं.

बीसीसीआई के एक सीनियर अधिकारी ने कहा ,’हां , अजहरूद्दीन के मसले पर सीओए की बैठक में बात की जायेगी. फिलहाल अजहर पर कोई प्रतिबंध नहीं है और वह बीसीसीआई के समारोहों में भाग ले रहे हैं.

आखिरी बार वह 2000 में भारत के लिये खेले थे. उन्हें 17 साल से पेंशन नहीं मिली और एकमुश्त अनुग्रह राशि भी रूकी हुई है. सीओए इस बारे में फैसला लेगा.’

हि‍दुस्‍तान की ऐसी तस्‍वीर जि‍से आप नहीं देखना चाहेंगे

रात को लगभग 11 बजे एक मित्र का फोन आया. बहुत जरूरी हो तभी इस वक्त फोन कोई फोन करता है. बात की तो उन्होंने मुझे कहा कि व्हाट्सऐप पर एक फोटो देखिए. मैंने डेटा ऑन करके उनका भेजा गया फोटो देखा. जब से यह फोटो देखा, रह—रह कर आंखों के सामने घूम रहा है. यह हिंदुस्तान की उन दर्दनाक तस्वीरों सा ही है जो कभी भोपाल की गैस त्रासदी में सामने आता है, कभी किसी अपने की लाश को कांधों पर उठाए बीसियों किलोमीटर चला जाता है. पूरे नौ माह तक अपनी कोख में एक जीवन पाल रही स्त्री के सामने ठीक अंतिम क्षण इतने भारी पड़ने वाले होंगे किसने सोचा होगा. एक शिशु का जन्म लेते ही धरती पर यूं गिर जाना, और जन्म लेते ही मौत को पा जाना, यह दुखों का कितना बड़ा पहाड़ होगा, क्या हम और आप सोच सकते हैं, इस दर्द को महसूस कर सकते हैं, क्या इस दर्द को दूर कर सकते हैं?

यह मामला दो दिन पहले मध्यप्रदेश के कटनी जिले का है. इस जिले के बारे में एनएफएचएस—4 की रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रसव के दौरान यहां पर लोगों को पूरे प्रदेश में सबसे ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ती है. कटनी के पास ग्राम बरमानी निवासी रामलाल सिंह और बीना बाई के घर अच्छी खबर आने वाली थी. सुरक्षित प्रसव हो इसके लिए मध्यप्रदेश में बहुत काम किया गया है. संस्थागत प्रसव पर जोर दिया गया है. इसका असर हुआ और अब लोग घरों के बजाय अस्पतालों में जाकर प्रसव कराने को प्राथमिकता दे रहे हैं. अस्पताल तक पहुंचाने का जिम्मा आशा कार्यकर्ताओं को भी दिया गया है. इसके लिए उन्हें प्रोत्साहन राशि दी जाती है. अस्पताल तक पहुंचाने के लिए एम्बुलेंस की सुविधा भी है, इसे जननी एक्सप्रेस नाम दिया गया है. सरकार का दावा है कि अब 80 प्रतिशत से ज्यादा प्रसव अस्पतालों में होने लगे हैं, लेकिन इनमें सुरक्षित प्रसव का प्रतिशत कितना है, यह अभी कहना बाकी है. पर लोगों को उम्मीद तो रहती ही है कि जच्चा—बच्चा का जीवन सुरक्षित रहे.

इसी आस में पति रामलाल सिंह ने प्रसव पीड़ा होने पर बरही अस्पताल पहुंचाने के लिए सुबह 10 बजे जननी एक्सप्रेस को फोन लगाया. समय चलता रहा, पीड़ा बढ़ती रही, लेकिन कोई जननी एक्सप्रेस नहीं आई. हारकर उसने अपनी पत्नी को एक ऑटो में जैसे—तैसे बैठाया और अस्पताल की ओर चल पड़ा. ऑटो अस्पताल से महज 700 मीटर की दूरी पर आकर बंद हो गया. ऐसी अवस्था में प्रसूता के लिए एक कदम में चलना मुश्किल होता है. रामलाल किसी फिल्म का हीरो भी नहीं था, जो अपनी पत्नी को गोद में उठाकर अस्पताल तक पहुंचाने जैसा फिल्मी काम कर सकता. वह दौड़ा, अस्पताल की ओर. रामलाल अस्पताल जाकर कर्मचारियों के सामने एम्बुलेंस भेजने की विनती करता रहा. पत्नी ऑटो में तड़प रही थी.

पति वापस नहीं आया और दर्द जब हद से ज्यादा हुआ तो वह ऑटो से निकल पैदल ही अस्पताल की ओर चलने लगी. कुछ ही दूर चलने पर उसे प्रसव हो गया. उसने एक सुंदर बालक को जन्म दिया, पर—पर—पर वह सड़क पर ऐसे गिरा कि फिर न हिल—डुल सका, न रो सका. आंखें खुलने से पहले ही बंद हो गईं, सांस चलने से पहले रुक गईं, दिल धड़कने से पहले ठिठक कर रूक गया. सड़क पर खून बह रहा था… पता नहीं यह मौत थी या हत्या.

मुझे दस साल पहले संग्राम सिंह की स्टोरी याद आ गई. यह मंडला जिले का मामला था. यहां पर शिशु नहीं मरा था. बैगा महिला थी, जो शिशु को जन्म देते—देते रास्ते में ही मर गई थी. किसी और मसले पर काम करते—करते हमें इस घटना का पता चला था. उसके पिता ने हमें उसकी आपबीती सुनाई थी. इसके कथानक को बदल दीजिए, कुछ दाएं—बाएं होगा, सामने तीन दिन का संग्राम था, यह नाम भी हम पत्रकारों की टोली उस बच्चे को दे आई थी. अगले दस दिन बाद हमने पता किया तो संग्राम भी उसकी मां के पास ही चला गया था. तब से अब तक दस साल का विकास हमारे सामने है. विकास के पैमाने में जिंदगी की सुरक्षा का कोई मानक कितना सुधरा, कैसे कहें, घटनाएं तो निरंतर हमारे सामने है.

हम संसाधनों का हवाला दे सकते हैं, भारत की भिन्न—भिन्न भौगोलिक परिस्थितियों के बीच सुविधाएं पहुंचा पाने की असमर्थकता का भी तर्क मान सकते हैं, पर जो व्यवस्थाएं मौजूद हैं, उनके कुशल संचालन के जिम्मेदारी से कैसे दूर भाग सकते हैं. यदि अस्पताल के ठीक सात सौ मीटर पीछे कोई बच्चा जमीन पर गिरकर मर जाए, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा. क्या हमारा समाज भी इतना निष्ठुर हो गया है कि दर्द से तड़प रही एक महिला को वह अस्पताल तक नहीं पहुंचा सकता ? क्‍या यह कि‍सी धर्म के एजेंडे में नहीं है ? क्‍या ऐसे काम देशप्रेम की सूची में समाहि‍त नहीं होंगे !!! क्‍या ऐसे मसलों पर चर्चा कि‍सी राष्ट्रवाद से कम है?

यह घटना हुई इससे ठीक एक दि‍न बाद देश की संसद में स्‍वास्‍थ्‍य एवं परि‍वार कल्‍याण मंत्री फग्‍गन सि‍ह कुलस्‍ते ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि भारत के महापंजीयक का नमूना पंजीकरण प्रणाली यानी एसआरएस की रि‍पोर्ट के मुताबि‍क 2015 में देश में प्रति एक हजार शि‍शु जन्‍म पर 37 बच्‍चों की मौत हो जाती है. पांच साल तक के बालकों की  मृत्यु दर यानी अंडर फाइव मोर्टेलि‍टी के मामले में यह आंकडा प्रति हजार जीवि‍त जन्‍म पर 43 है. इसी तरह मात मृत्यु दर के मामले में यह संख्‍या प्रति एक लाख प्रसव पर 167 है.

इसी सवाल के जवाब में बताया गया कि देश में 39 प्रतिशत बच्‍चों की मौत कम वजन या समय से पूर्व प्रसव के कारण, 10 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत एक्‍सपीसिया या जन्‍म आघात के कारण, 8 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत गैर संचारी रोगों के कारण, 17 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत नि‍मोनि‍या के कारण, 7 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत डायरि‍या के कारण, 5 प्रतिशत बच्‍चों की मौत अज्ञात कारण, 4 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत जन्‍मजात वि‍संगति‍यों के काराण, 4 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत संक्रमण के कारण, 2 प्रति‍शत बच्‍चों की मौत चोट के कारण, डेढ प्रति‍शत बच्‍चों की मौत बुखार के कारण और पांच बच्‍चों की मौत अन्‍य कारणों से होती है.

कटनी में हुई बच्‍चे की मौत इसमें से कि‍स श्रेणी में आएगी… सोचना होगा! सोचना यह भी होगा कि सड़क पर जो लहू बह रहा है वह मौत का है या हत्‍या का. और इसका जि‍म्‍मेदार कौन है? आखि‍र ऐसी भी क्‍या परि‍स्‍थि‍ति है कि अस्‍पताल के ठीक सामने एक प्रसूता प्रसव करती है, बच्‍चे की मौत हो जाती है; हमारा समाज उसकी मौत को खड़े-खड़े देखता रहता है. इस मौत का मुकदमा कि‍स अदालत में चलाया जाएगा, और क्‍या कठघरे में हम सभी नहीं होंगे? सरकार की नीति और नीयत का सवाल तो है ही पर क्‍या समाज की संवेदना भी उसी सि‍स्‍टम की भेंट चढ़ गई है.

दुनि‍याभर में इस सदी की शुरुआत में मि‍लेनि‍यम डेवलपमेंट गोल्‍स तय कि‍ए गए थे. इसमें भुखमरी को दूर कर देने, गरीबी को हटा देने, शि‍शु और बाल मृत्‍यु दर को कम करने सहि‍त कई बि‍दु थे. जब 2015 तक यह तय नहीं हो पाए तो अब सतत वि‍कास लक्ष्‍यों का नया एजेंडा तय कि‍या गया है. अब 2030 तक इसमें तय कि‍ए गए लक्ष्यों को हासि‍ल करने का वायदा कि‍या गया है.

पर देखि‍ए कि देश की स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं का क्‍या हाल है. ऐसी वीभत्‍स तस्‍वीरें और खबरें जहां से आती हैं, वह एकदम ग्रामीण इलाका ही होता है. ऐसी जगहों पर छोटी-छोटी सेवाएं बड़ा काम करती हैं, मसलन प्राथमि‍क स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्र. यह सार्वजनि‍क स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं की पहली और महत्‍वपूर्ण कड़ी है. इसके बारे में घटना के ठीक एक दि‍न बाद केन्‍द्रीय स्‍वास्‍थ्‍य एवं परि‍वार स्‍वास्‍थ्‍य कल्‍याण मंत्री जेपी नड्डा ने जो जवाब दि‍या है वह बेहतर स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के लि‍ए कतई ठीक नहीं माना जा सकता है. लोकसभा में प्रस्‍तुत जवाब के मुताबि‍क देश में आबादी के हि‍साब से अब भी 22 प्रति‍शत स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों की कमी है. यही जानकारी इन केन्‍द्रों में पदस्‍थ डॉक्‍टरों के बारे में है. देश के प्राथमि‍क स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों में 34 हजार 68 डॉक्‍टरों के पद स्‍वीकृत हैं इनमें से 8774 पद खाली पड़े हैं. इस संदर्भ में और जानकारि‍यां हैं, जो लगभग ऐसी ही हैं. अब सवाल यही है कि ऐसी स्‍थितियों में ऐसी कहानि‍यां क्‍यों न सामने आएं.

राकेश कुमार मालवीय एनएफआई के पूर्व फेलो हैं, और सामाजिक सरोकार के मसलों पर शोधरत हैं…

ये हैं इंग्लैंड के मोईन अली, किया ऐसा कारनामा जो क्रिकेट में कभी नहीं हुआ

इंग्लैंड ने दक्षिण अफ्रीका को ओल्ड ट्रैफर्ड में खेले गए चौथे और अंतिम टेस्ट में 177 रन से हरा दिया. इस जीत के साथ इंग्लैंड ने सीरीज पर 3-1 से कब्जा जमा लिया

नई दिल्ली: दक्षिण अफ्रीका को अपनी धरती पर टेस्ट सीरीज में शिकस्त देने के लिए इंग्लैंड को 19 साल इंतजार करना पड़ा. इस ऐतिहासिक जीत के हीरो रहे इंग्लैंड के ऑलराउंडर मोईन अली. इस ऑलराउंड प्रदर्शन के दम पर यह उपलब्धि हासिल करने वाले मोईन 8वें क्रिकेटर बन गए हैं. इंग्लैंड ने दक्षिण अफ्रीका को ओल्ड ट्रैफर्ड में खेले गए चौथे और अंतिम टेस्ट में 177 रन से हरा दिया. इस जीत के साथ इंग्लैंड ने सीरीज पर 3-1 से कब्जा जमा लिया. मोईन अली ने दूसरी पारी में 69 रन देकर पांच विकेट लिए. इतना ही नहीं, मोईन अली ने दूसरी पारी में 75 रन की नाबाद पारी खेलकर टीम को 243 के सम्माजनक स्कोर पर पहुंचाया था.

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मोईन अली से जुड़ी 5 बातें

  1. मोईन अली ने चार मैचों की सीरीज में बल्ले से अहम योगदान देते हुए 252 रन बनाए. उन्होंने अपनी फिरकी के जाल में विपक्षी बल्लेबाजों को फांसते हुए 15.64 के औसत से 25 विकेट लिए. टेस्ट क्रिकेट के इतिहास में यह पहला मौका है, जब किसी खिलाड़ी ने चार मैचों की सीरीज में 250 से ज्यादा रन बनाने के साथ 25 विकेट भी चटकाए हो.
  2. पांच या उससे ज्यादा मैचों की सीरीज में आठ प्लेयर यह करिश्मा कर चुके हैं.
  3. मोईन इंग्लैंड की तरफ से 8वें ऐसे खिलाड़ी बन गए हैं, जिन्होंने किसी टेस्ट सीरीज में 200 रन बनाए और 20 विकेट भी लिए.
  4. साल 2005 में इंग्लैंड के ऑलराउंडर एंड्रयू फ्लिंटॉप ने ऐसा ही कारनामा किया था, यानी मोईन ने 12 साल के बाद एक ऑलराउंडर के तौर पर ऐसे प्रदर्शन को फिर से दोहराया.
  5. मोइन अली ने द. अफ्रीका के खिलाफ पिछले तीन टेस्ट मैचों में 87, 7, 18, 27, 16 और 8 रन की पारी खेली. वहीं इन मैचों में विकेट की बात करें तो उन्होंने क्रमश: 4, 6, 0, 4, 0 और 4 विकेट लिए.

हरियाणा के बीजेपी नेता पर सरेआम भड़क गईं अभिनेत्री रवीना टंडन, बोलीं- तुम कायर हो

हरियाणा में भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष रामवीर भट्टी द्वारा IAS की बेटी पर दिये बयान के चलते फिल्म अभिनेत्री रवीना टंडन ने उन्हें खरी-खोटी सुनाई है। रवीना टंडन ने बीजेपी नेता रामवीर भट्टी पर भड़कते हुए कहा है कि ये कायर हैं, इन लोगों का बस चले तो ये सूरज ढलने के बाद अपनी बेटियों को ताले में बंद कर दें। आपको बता दें कि रामवीर भट्टी ने सोमवार को हरियाणा में बीजेपी अध्यक्ष के बेटे द्वारा एक आइएएस की बेटी को रात के अंधेरे में छेड़ने के मामले में विवादित बयान देते हुए कहा था कि उस लड़की को इतनी रात में अकेले नहीं घूमना चाहिए था। रामवीर भट्टी ने ये भी कहा था कि इस समय माहौल बहुत खराब है, इसलिए रात 12 बजो के बाद लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए। बीजेपी नेता के इस बयान के मीडिया में आने के बाद राजनीतिक दलों से लेकर सोशल मीडिया तक पर उनकी जमकर आलोचना हुई। खुद भारतीय जनता पार्टी के सासंद सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि वो रामवीर के इस बयान के लिए उनपर कोर्ट में मुकदमा करेंगे। रामवीर भट्टी की आलोचना करनेवालों में एक नाम रवीना टंडन का भी जुड़ गया है। रवीना ने रामबीर भट्टी के बयान को रिट्वीट करते हुए ट्वीट किया कि ये कायर लोग अब बी उस लड़के की तरफदारी में उलजलूल बातें बोल रहे हैं। रवीना ने लिखा कि ये लोग सूरज ढलने के बाद अपनी बेटियों को ताले में बंद कर देने वाले लोग हैं।

रवीना टंडन के इस ट्वीट को सोशल मीडिया पर लोग खूब पसंद कर रहे हैं। यूजर्स रवीना की बातों से सहमति जताते हुए रामवीर भट्टी जैसे लोगों की मानसिकता पर सवाल उटा रहे हैं।

 

आपको बता दें कि हरियाणा में एक IAS की बटी ने बीजेपी नेता सुभाष बराला के बेटे विकास पर छेड़छाड़ का आरोप लगाया था। लड़की का आरोप है कि विकास बराला और उसका दोस्त आशीष कुमार एक पेट्रोल पंप से ही उनकी कार का पीछा कर रहे थे और कार का दरवाज़ा खोलने की कोशिश की। लड़की के कई बार फोन करने पर पुलिस वहां पहुंची और दोनों लड़कों को गिरफ़्तार कर लिया। गिरफ्तार करने के अगले दिन ही उन सबको जमानत मिल गई। पीड़िता ने उस रात की घटना का जिक्र करते हुए अपने फेसबुक पेज पर अपना दर्द बयां करते हुए लिखा कि मैं खुशकिस्मत हूं कि रेप के बाद नाले में नहीं मिली।

पाकिस्तान के कई परिवार गाय के गोश्त को हाथ नहीं लगाते

कुछ दिनों पहले कुछ बड़ों के साथ बैठे थे और भारत में गोमांस पर होने वाली हिंसक घटनाओं पर बात हो रही थी कि अचानक उनमें से एक बुज़ुर्ग ने कहा कि भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि जिसने गाय बनाई.

पाकिस्तान के पंजाब सूबे के शहर के बीच हाफ़िज़ाबाद में होने वाली इस बातचीत के दौरान थोड़ी चुप्पी के बाद उदास आंखों के साथ पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए बुज़ुर्ग ग़ुलाम हसन कहते हैं कि हमारे यहां बाप-दादा के समय से गाय पाली तो जाती है लेकिन कभी उसके मांस घर की दहलीज के अंदर नहीं आने दिया.

 

उन्होंने कहा, “आने भी क्यों देते … मेरा जिगरी दोस्त डॉक्टर हीरालाल पड़ोसी था, ग़मी व खुशी में बढ़-चढ़ कर शरीक होता था तो किस मुंह से गाय का मांस खाते जिसे वह पवित्र मानता था.”

पाकिस्तान का एक परिवार
पाकिस्तान में अब भी कई परिवार हैं जो दालें खाना पसंद नहीं करते

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के शहर हाफ़िज़ाबाद के निवासी ग़ुलाम हसन की बातें आज भी विभाजन से पहले यहां पाई जाने वाली धार्मिक सहिष्णुता के दर्शाती है जिसे सत्तर वर्ष बीतने के बाद आज भी कई परिवार जीवित रखे हुए हैं.

इन परंपराओं के इतिहास के बारे में जिज्ञासा हुई तो पंजाब की तारीख़ और संस्कृति पर कई पुस्तकों के लेखक प्रोफ़ेसर असद सलीम शेख़ से संपर्क किया और अपने प्रश्न उनके सामने रखे.

प्रोफ़ेसर असद सलीम शेख़

प्रोफ़ेसर असद सलीम शेख़ ने बताया कि भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों के दो वर्ग हैं जिनमें एक वर्ग स्थानीय नहीं था जो अरब, तुर्की, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान आदि से आने वाले मुसलमान थे और उन सभी मुसलमानों के रस्मो-रिवाज, सभ्यता वह संस्कृति वही थी जो वे अपने क्षेत्रों से लाए थे.

 

वो कहते हैं, “दूसरा वर्ग वह था जो स्थानीय हिंदुओं का था और धर्म बदल कर मुसलमान हुआ था. इसमें दूसरे क्षेत्रों से आने वाले मुसलमान हर तरह के मांस का उपयोग करते थे लेकिन दूसरा वर्ग गाय का मांस खाने से परहेज़ करता रहा क्योंकि वह हिंदुओं के साथ सदियों से रह रहे थे और उनकी सभ्यता उनके अंदर रची-बसी रही और मुसलमान होने के बावजूद उन्होंने इन पहलुओं को छोड़ा नहीं.”

लेकिन क्या केवल यही पहलू था जिसकी वजह से बहुत सारे मुसलमान घरों में बकरे का मांस इस्तेमाल किया जाता है लेकिन गोमांस पसंद नहीं किया जाता?

इस पर प्रोफ़ेसर असद ने बताया, “उपमहाद्वीप में अक्सर स्थानों पर हिंदुओं के अनुपात में मुसलमान अल्पसंख्यक थे जिसकी वजह से यह पहलू भी था कि किसी ऐसी परंपरा को नहीं अपनाया जाए जिसके कारण बहुमत की धार्मिक भावनाएं आहत हों या जिससे झगड़े का ख़तरा हो.”

 

उन्होंने कहा कि इसके अलावा “भाईचारा और सहिष्णुता भी थी जिसकी वजह से बाद में किसी क्षेत्र में अगर मुसलमान बहुमत में आ गए तो भी उन्होंने गोमांस खाने परहेज़ ही किया” और इसी वजह से अकबर बादशाह चूँकि सक्योलर था तो उसने धार्मिक सहिष्णुता को बनाए रखने के लिए गाय के ज़बह करने पर पाबंदी भी लगाई.

गाय

प्रोफ़ेसर असद की बातें उस वक़्त साफ़ हुईं जब हाफ़िज़ाबाद की तहसील पिंडी भट्टयाँ के एक घर में जाने का मौक़ा मिला.

गृहिणी शाज़िया तुफ़ैल जब दस्तरख़ान पर खाना परोस रहीं थीं तो मैंने पूछ लिया कि क्या आपने गाय का मांस कभी पकाया है, उस पर उनकी प्रतिक्रिया ऐसे थी जैसे कोई गुस्ताख़ी कर दी हो.

शाज़िया ने दोनों कानों को हाथ लगाते हुए कहा “ना ना हमारे घर कभी गाय का गोश्त नहीं आया. हमारे बुज़ुर्गों से रवायत है कि गाय का मांस कभी घर नहीं लाया गया और न ही इसे पसंद किया जाता है. यह परंपरा दशकों से चली आ रही है और यही कोशिश है कि अगली पीढ़ी भी इसका पालन करे.”

इस इलाक़े में शाज़िया तुफ़ैल ऐसी एकमात्र महिला नहीं जिनके यहाँ गाय का गोश्त इस्तेमाल नहीं किया जाता बल्कि कई ऐसे परिवार हैं जिन्होंने धार्मिक सहिष्णुता की अनमोल यादों को संभाल कर रखा हुआ है.

मोदीजी के राज में संवाद नहीं केवल बल प्रयोग: मेधा पाटकर

मध्य प्रदेश में बांध प्रभावितों के लिए मुआवज़े और पुनर्वास की मांग को लेकर अनशन कर रहीं सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर को पुलिस ने अनशन स्थल से हटाकर ज़बरदस्ती अस्पताल में भर्ती करा दिया है.

मेधा पाटकर समेत 12 लोग सरदार सरोवर बांध के प्रभावितों की मांगों को लेकर धार ज़िले के चिखल्दा गांव में अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठै थे.

अनशन के 12वें दिन पुलिस ने मेधा पाटकर समेत छह लोगों को भारी पुलिस बल की मौजूदगी में अनशन स्थल से ज़बरदस्ती हटा दिया.

नर्मदा बचाओ आंदोलन से जुड़े लोगों का आरोप है कि इस दौरान पुलिस ने लाठीचार्ज भी किया जिसमें कई लोग घायल हुए हैं

‘कील वाले डंडे’

आंदोलनकर्मी
कार्यकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने बल प्रयोग किया

आंदोलन की कार्यकर्ता हिमशी सिंह उस वक़्त वहां मौजूद थीं. उनका कहना है कि चिखल्दा गांव में इस वक़्त ख़ौफ का माहौल है.

हिमशी सिंह का आरोप है कि पुलिस ने मेधा पाटकर को ले जाने के दौरान भारी बल प्रयोग किया जिसमें कई लोगों को गंभीर चोटें आई हैं.

उन्होंने कहा, ”पुलिस जिन डंडों का इस्तेमाल कर रही थी, उसमें कीलें लगी हुई थीं.”

गिरफ्तारी नहीं, इलाज: शिवराज

मेधा पाटकर

वहीं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि मेधा पाटकर को गिरफ्तार नहीं किया गया है बल्कि अस्पताल में भर्ती कराया गया है.

शिवराज ने ट्वीट कर कहा, ‘मैं संवेदनशील व्यक्ति हूं. चिकित्सकों की सलाह पर मेधा पाटकर जी व उनके साथियों को अस्पताल में भर्ती कराया गया, उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया है.’

उन्होंने आगे लिखा कि ‘मेधा पाटकर और उनके साथियों की स्थिति हाई कीटोन और शुगर की वजह से चिंतनीय थी. उनके स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के लिए हम प्रयासरत हैं’.

डूब क्षेत्र से 40 हज़ार लोग प्रभावित

शिवराज चौहान के ट्वीट

उधर अनशन स्थल से हटाए जाने से पहले मेधा पाटकर ने कहा, ”आज मध्य प्रदेश सरकार हमारे 12 दिनों से बैठे 12 साथियों को मात्र गिरफ्तार करके जवाब दे रही है. यह कोई अहिंसक आंदोलन का जवाब नहीं है. मोदी जी के राज में, शिवराज जी चौहान के राज में एक गहरा संवाद नहीं, जो हुआ उस पर जवाब नहीं. आंकड़ों का खेल, कानून का उल्लंघन और केवल बल प्रयोग.”

सरदार सरोवर बांध से 192 गांवों के 40 हज़ार परिवार प्रभावित होंगे. उनका पूरा इल़ाका डूब जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि 31 जुलाई तक पूरी तरह पुनर्वास के बाद ही बांध की ऊंचाई बढ़ाई जाए.

लेकिन पुनर्वास के लिए जो जगह बनाई गई है, उसकी हालत भी रहने लायक नहीं है.

गाय के नाम पर गबन: हरियाणा गौसेवा आयोग के सदस्य पर गौशाला संघ के 13 लाख रुपए हड़पने का आरोप

हरियाणा के सीएम मनोहर लाल खट्टर ने 2015 में गौसेवा आयोग का गठन किया। इसमें कुल 11 सदस्य हैं जिनमे योगेंद्र आर्य भी शामिल हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा गौसेवा कल्याण बोर्ड के एक सदस्य पर संस्था का प्रमुख रहने के दौरान 13 लाख रुपये के गबन का आरोप है। कोलकाता से निकलने वाले अंग्रेजी दैनिक द टेलीग्राफ की रिपोर्ट के अनुसार पूरे राज्य में गौशालाएं चलाने वाले बोर्ड के पूर्व प्रमुख योगेंद्र आर्य हरियाणा गौ सेवा आयोग के सदसय् हैं। साल 2012 में वो आर्य समाज द्वारा चलाए जाने वाले हरियाणा राज्य गौशाला संघ के प्रमुख थे। करीब एक महीने पहले हरियाणा के कुरुक्षेत्र में 35 गायें मर गई थीं। कहा गया कि ये गायें चारे, पानी और आश्रय के अभाव में मर गईं। गायों की मौत के बाद ही आर्य पर मुकदमा दर्ज किया गया।

योगेंद्र आर्य पर जनवरी 2012 से सितंबर 2012 के बीच गौशाला संघ के बैंक खाते से 11.68 रुपये निकालने का आरोप है। आर्य पर गौशाला के लिए चंदे के रूप में इकट्ठा हुए 1.12 लाख रुपये न जमा करने का भी आरोप है। गौशाला संघ पूरे हरियाणा में करीब 225 गौशालाएं चलाता है। योगेंद्र आर्य के खिलाफ मामला तब दर्ज हुआ जब गौशाला संघ के वर्तमान प्रमुख शमशेर सिंह आर्य ने इस बाबत शिकायत दर्ज करायी। अपनी शिकायत में शमशेर आर्य ने योगेंद्र आर्य की गौसेवा आयोग की सदस्यता समाप्त करने की भी मांग की है। गौसेवा आयोग का गठन राज्य के वर्तमान मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने किया है।

हरियाणा में साल 2015 में पहली बार भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की सरकार बनी। बीजेपी सरकार बनने के बाद सीएम खट्टर ने गौसेवा आयोग का गठन किया। इस आयोग में कुल 11 सदस्य हैं जिनमे योगेंद्र भी शामिल हैं। योगेंद्र ने खुद पर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए टेलीग्राफ से कहा कि उनके खिलाफ उनके दुश्मनों ने शिकायत की है।

हरियाणा में खट्टर सरकार ने गौवंश से जुड़ा बेहद कड़ा कानून बनाया है। गौवंश के किसी जानवर की हत्या पर 10 साल तक की जेल और 10 लाख रुपये तक का जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। राज्य पशुपालन विभाग के निदेशक ने टेलीग्राफ से कहा कि मामले की रिपोर्ट राज्य सरकार के पास भेज दी गयी है। गौसेवा आयोग के चेयरमैन भानी राम मंगल ने अखबार से कहा कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है लेकिन आयोग के सदस्य दोषी होंगे तो उन पर कार्रवाई की जाएगी।

‘We need to talk about male rape’: DR Congo survivor speaks out

“If I talked about it, I would have been separated from the people. Even those who treated me would not have shaken my hands.”

Stephen Kigoma was raped during the conflict in his home country, the Democratic Republic of Congo.

He described his ordeal in an interview with the BBC’s Alice Muthengi, calling for more survivors to come forward.

“I hid that I was a male rape survivor. I couldn’t open up – it’s a taboo,” he said.

“As a man, I can’t cry. People will tell you that you are a coward, you are weak, you are stupid.”

The rape took place when men attacked Stephen’s home in Beni, a city in north-eastern DR Congo.

“They killed my father. Three men raped me, and they said: ‘You are a man, how are you going to say you were raped?’

“It’s a weapon they use to make you silent.”

After fleeing to Uganda in 2011, Stephen got medical help – but only after a physiotherapist treating him for a back problem realised there was more to his injuries.

He was taken to see a doctor treating survivors of sexual violence, where he was the only man in the ward.

“I felt undermined. I was in a land I didn’t belong to, having to explain to the doctor how it happened. That was my fear.”

Stephen was able to get counselling through the Refugee Law Project, an NGO in Uganda’s capital, Kampala, where he was one of six men speaking about their ordeal.

But they’re far from being the only ones.

Police not an option

The Refugee Law Project, which has investigated male rape in DR Congo, has also published a report on sexual violence among South Sudanese refugees in northern Uganda.

It found that more than 20% of women reported being raped – compared to just 4% of men.

“The main reason that fewer men come forward is that people assume they should be invulnerable, they should fight back. They have allowed it so they must be homosexual,” Dr Chris Dolan, director of the organisation, told the BBC’s Focus on Africa programme.

Legal challenges pose a problem when it comes to men reporting rape, he added.

“In the Rome Statute [which established the International Criminal Court] you have a definition of rape that is wide enough to include women and men, but in most domestic legislation, the definition of rape involves the penetration of the vagina by the penis. That means if a man comes forward, they’ll be told it wasn’t rape, it was sexual assault.

“There’s the problem of criminalisation of same-sex activity – it revolves around penetration of the male body, not around consent or lack of consent.”

In 2016, Uganda took in more refugees than any other country in the world, and has been praised for having some of the world’s most welcoming policies towards them.

But for male rape survivors like Stephen, life there can be tough. Homosexual acts are illegal in Uganda, and going to the police to report rape is not always an option.

“When I asked the police, they said that if it has anything to do with penetration between a man and a man, it is gay,” he said.

“If it happens to a woman, we listen to them, treat them, care and listen to them – give them a voice. But what happens to men?”

Modi taking no chances with V-P elections

NDA MPs to take part in mock voting.

The vice-presidential election, scheduled for Saturday, may look like it is in the bag for the ruling NDA, but Prime Minister Narendra Modi is taking no chances.

On Friday evening, he will meet all MPs of the NDA and the parties that have pledged support to its candidate M. Venkaiah Naidu at the G.M.C. Balayogi Auditorium in the Parliament House complex. The meeting will be different from the routine as it involves an exercise of mock voting with replicas of the ballot.

Two names

“There were 21 invalid votes polled in the presidential election, and many of them were from the BJP. It was felt, therefore, that there should be a demo of the voting process again,” said a senior office-bearer of the BJP.

The ballot will have the names of the two candidates in the fray: Mr. Naidu and Gopalkrishna Gandhi, who has been put up by the Opposition. Mr. Modi will also take part in the exercise as an MP.

At the meeting, all parties of the NDA will express their support for Mr. Naidu. This will be followed by a cultural programme and a dinner. The cultural programme is being arranged by Union Minister Mahesh Sharma.

Drug companies flock to supercharged T-cells in fight against autoimmune disease

Researchers in both academia and industry are turning to immune-suppressing cells to clamp down on autoimmune disorders, and the effort is building to a fever pitch.

On 24 July, pharmaceutical firm Eli Lilly of Indianapolis, Indiana, announced that it would pay up to US$400 million to support the development of a drug — which entered clinical trials in March — that stimulates these cells, called regulatory T cells. And in January, Celgene of Summit, New Jersey, announced plans to buy a company working on a similar therapy for $300 million.

Other companies, from tiny biotechs to pharmaceutical heavyweights, are also investing in an approach that could yield treatments for a variety of disorders caused by an immune attack on the body’s own cells. Such conditions include type 1 diabetes, lupus and rheumatoid arthritis.

“It’s a field that’s just, like, crazy,” says David Klatzmann, an immunologist at Pierre and Marie Curie University in Paris, who has been studying regulatory T cells and advises a Paris company called ILTOO Pharma. “The competition is coming very hard. It’s going to be exciting to see where it goes.”

Booster molecule

T cells are often thought of as key foot soldiers in the immune system’s battle against foreign invaders. But there are many kinds of T cell, each armed with a different set of skills. Regulatory T cells serve to dampen immune responses — rather than attack invaders — and are important for preventing autoimmunity.

People with disorders caused by an autoimmune attack often also have reduced levels of regulatory T-cell activity, leading scientists to suspect that bolstering such cells could reduce the immune system’s attack on the body.

To boost these cells, many researchers — now including those at Lilly and Celgene — are turning to a molecule called interleukin-2 (IL-2). High doses of IL-2 stimulate the ‘effector’ T cells that attack invaders, and in 1992, US regulators approved the treatment for some people with cancer, to prompt immune responses against the tumours. But low doses of IL-2 — roughly ten times lower than those used to treat cancer — instead stimulate regulatory T cells, and have relatively little effect on effector T cells.

This observation was made in the 1990s, but some researchers resisted the idea of using IL-2 to treat people with autoimmune disorders, even at low doses. The high doses used in cancer treatment are notoriously toxic, and can be fatal. “Initially, lots of people were so afraid to use it,” says Di Yu, an immunologist at the Australian National University in Canberra. “They have some bitter memories of IL-2.”

Molecular tweaks

Gradually, a handful of promising small clinical trials have begun to overcome those concerns. And in 2011, a pair of studies provided the first clinical evidence that the approach could work. One of these was in graft-versus-host disease1, a condition that can occur when transplanted bone marrow produces immune cells that attack its new host, and the other was in an autoimmune disorder caused by hepatitis C virus infection2. Researchers have also launched other studies in type 1 diabetes and lupus. The lower doses seem, so far, to be much safer than the doses used for cancer treatment.

Even so, there are still concerns about how specific the IL-2 treatment can be — any potential stimulation of effector T-cell responses in a patient who is already undergoing an autoimmune attack could be dangerous. “It’s a robust field, but a challenging field,” says Jeffrey Bluestone, an immunologist at the University of California, San Francisco, who has advised several companies on regulatory T-cell projects. “It’s still unclear that you can get a regulatory T-specific response without any other effects.”

Instead, many companies are interested in tweaking IL-2 to make it more specific. Lilly’s $400-million investment went to Nektar Therapeutics, a biotech company in San Francisco, California, that has produced chemically modified IL-2 that is less likely to bind to effector T cells. Delinia, the company that Celgene bought, which is based in Cambridge, Massachusetts, was developing a mutated form of IL-2 that has a similar effect.

Other researchers are investigating possible cell therapies, for example extracting regulatory T cells from a patient’s blood, expanding and activating the cells in the laboratory, and then reintroducing them into the patient. Another approach, still in the early stages of development, is to engineer regulatory T cells taken from the body to help the cells better recognize the molecules that are provoking an autoimmune response and to shut that response down.

And basic researchers are still discovering more about the biology of regulatory T cells that could aid the development of future therapies. Hongbo Chi, an immunologist at St. Jude Children’s Research Hospital in Memphis, Tennessee, has been studying how the metabolism of regulatory T cells differs from that of other T cells. And Alexander Rudensky, an immunologist at the Memorial Sloan Kettering Cancer Center in New York City, and his colleagues, this year reported a new subset of regulatory T cell that may have a more specific function[3].

Although Chi is not directly seeking out new drugs, he has noted industry’s enthusiasm with interest. “It’s really encouraging to see those therapeutics go into clinical trials,” he says. “That motivates us basic researchers to understand the mechanism.”

चरमपंथ के ख़िलाफ़ सेना का साथ क्यों दे रहे कश्मीरी?

पिछले दो महीनों से कश्मीर घाटी में जारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों को रोकने की कार्रवाइयों में खासा वृद्धि हुई है. खासकर उस दक्षिणी हिस्से में जिसे नई पीढ़ी के चरमपंथ का गढ़ माना जाता है.
जून-जुलाई 2017 के महीने में लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख अबू दुजाना और लश्कर के ही एक और शीर्ष कमांडर बशीर लश्करी समेत कश्मीर घाटी में लगभग 36 चरमपंथी मारे गए, इनमें हिज़बुल मुज़ाहिद्दीन के कई शीर्ष चरमपंथी भी शामिल थे. इस सूची में नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिश में मारे गए चरमपंथी शामिल नहीं हैं.

एक ओर पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां चरमपंथ को बेअसर करने में मिली कामयाबी का जश्न मना रही हैं, तो वहीं दूसरी तरफ़ अलगाववादियों को यह पसंद नहीं आ रहा. जेल में बंद आसिया अंद्राबी के नेतृत्व वाले महिलाओं के कट्टरवादी संगठन दुख़्तरान-ए-मिल्लत ने मारे गए चरमपंथियों की संख्या में वृद्धि पर खुलकर अपनी चिंता व्यक्त की है.

दुख़्तरान-ए-मिल्लत की महासचिव नाहिदा नसरीन ने 22 जून को एक बयान में कहा, “मारे जा रहे चरमपंथियों की संख्या बढ़ गई है. हम आज़ादी के समर्थक और चरमपंथी गुटों से आग्रह करते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में मुजाहिदीनों की मौत के पीछे कमियों को तलाशें और साथ ही गोलीबारी के दौरान उन्हें बचाने की कोशिश में लगे युवाओं की पहचान करें.

पुलिस और सेना समेत अन्य सुरक्षाकर्मियों को चरमपंथियों की मौज़ूदगी की अधिक से अधिक सटीक सूचनाएं मिल रही हैं. जहां एक ओर यह उनके संबंधित ख़ुफ़िया विभागों की दक्षता को दिखाता है तो वहीं दूसरी तरफ़ एक कठोर सच को भी ज़ाहिर करता है कि अब पहले की तुलना में कश्मीर के लोग सुरक्षाबलों की मदद के लिए आगे आ रहे हैं. दुख़्तरान-ए-मिल्लत का बयान यही इशारा करता है.

योगी आदित्यनाथ की सरकार में अपने ही क्यों हैं ख़फ़ा?

उत्तर प्रदेश सरकार स्वच्छ प्रशासन, कार्यकुशलता और जनता के हित में कार्य करने के जहां तमाम दावे कर रही है, वहीं उसकी पार्टी के ही ज़िम्मेदार नेता और मंत्री उस पर सवाल उठाकर सरकार की कार्यप्रणाली पर संदेह खड़े कर रहे हैं.

सरकार को बने अभी चार महीने ही हुए हैं, लेकिन पार्टी के कई नेताओं और विधायकों की तो छोड़िए एक विभाग के कैबिनेट मंत्री ही दूसरे विभाग की कार्यप्रणाली पर नाराज़गी ज़ाहिर कर चुके हैं.

राज्य के आबकारी मंत्री जय प्रताप सिंह ने पिछले दिनों ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को पत्र लिखकर उनके इलाक़े में बिजली व्यवस्था की अनियमतितताओं की ओर ध्यान दिलाया तो ये पत्र राजनीतिक जगत में सुर्खियों में आ गया.

बिजली का मुद्दा

जय प्रताप सिंह कहते हैं, “दरअसल, हमें क़रीब डेढ़ दशक से जर्जर व्यवस्था हर क्षेत्र में मिली है. ज़ाहिर है बिजली भी उनमें से एक है. हमारे इलाक़े के कुछ विधायकों ने शिकायत की बिजली की स्थिति ख़राब है. उन लोगों ने इस बारे में मुख्यमंत्री से भी बात की थी. लेकिन जब बात नहीं बनी तो हमने ऊर्जा मंत्री को पत्र लिखा.”

जय प्रताप सिंह ने अपने पत्र में साफ़-साफ़ लिखा कि मुख्यमंत्री और ऊर्जा मंत्री के निर्देशों के बावजूद उनके इलाक़े में लोगों को पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही है और यदि यही स्थिति बनी रही तो ये पार्टी और सरकार के लिए ठीक नहीं होगा.

दरअसल, ये अकेला मामला नहीं बल्कि इस तरह के कई मौक़े आए जब पार्टी के जनप्रतिनिधियों ने अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली पर उंगली उठाई. हमीरपुर के एक विधायक अशोक चंदेल तो विधान सभा में कहने लगे कि छोटे-मोटे प्रशासनिक अधिकारी तक उनकी बात नहीं सुनते हैं.

आम आदमी तक…

वहीं बांदा ज़िले के एक विधायक राजकरन पिछले दिनों अवैध खनन के ख़िलाफ़ धरने पर बैठ गए. उनका कहना था कि प्रशासन उनकी बातें नहीं सुनता है और वो पार्टी में या मंत्रियों से शिकायत करते हैं तो उनकी सुनी नहीं जाती.

यही नहीं, पार्टी के कई सांसद भी इस बारे में अक़्सर शिकायत करते रहते हैं.

राज्य सरकार के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा इस बात को तो स्वीकार करते हैं कि कुछ जगह असंतोष हो सकता है, लेकिन उनका कहना है कि ऐसी शिकायतों पर कार्रवाई होती ज़रूर है.

सरकार की छवि

श्रीकांत शर्मा कहते हैं, “पार्टी में लोकतंत्र है और विधायकों से लेकर आम आदमी तक अपनी बात कह सकता है. जब तक लोग समस्याएं बताएंगे नहीं तो सरकार को पता कैसे चलेगा. रही बात उसके बाद की तो सरकार इन्हें दूर करने की पूरी कोशिश करती है. हमें ये भी पता चला है कि प्रशासन में बैठे कुछ लोगों की आदत ख़राब हो चुकी है. उन लोगों को भी चेतावनी दी गई है कि सुधर जाएं नहीं तो कार्रवाई होगी.”

ऐसे ढेरों उदाहरण हैं जब राज्य के बीजेपी नेताओं ने सीधे तौर पर सरकार की कार्यप्रणाली पर नाराज़गी ज़ाहिर की है.

जानकारों का कहना है कि ऐसा न सिर्फ़ अनुभवहीनता के कारण हो रहा है बल्कि इसलिए भी कि सरकार में शक्ति के कई केंद्र हैं.

जनता का पैसा बर्बाद करने की मूर्ख नीति

जनता का पैसा बर्बाद करने वाली 'मूर्ख' नीति की घंटी बजाओ

जनता का पैसा बर्बाद करने वाली 'मूर्ख' नीति की घंटी बजाओ

Posted by ABP News on Wednesday, August 2, 2017

IRCTC से तत्काल टिकट बुक करने पर भी अब मिलेगी ‘पे ऑन डिलिवरी’ की सुविधा

यह सर्विस उन लोगों के लिए ज्यादा उपयोगी है जो टिकट तो ऑनलाइन बुक करना चाहते हैं लेकिन टिकट की पेमेंट ऑनलाइन नहीं करना चाहते, या फिर ऑनलाइन टिकट बुक करने के बाद पेमेंट कैश में करना चाहते हैं।

तत्काल ट्रेन टिकट बुक कराने वालों को अब आईआरसीटीसी ने एक और सर्विस दे दी है। IRCTC से बुक किए गए टिकट पर ‘पे ऑन डिलीवरी’ की सुविधा देने वाली एंड्युरिल टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड ने बुधवार (3 अगस्त) को ऐलान किया कि अब यूजर तत्काल टिकट बुक करने के दौरान भी ‘बुक नाउ पे लेटर’ का ऑप्शन चुन सकते हैं। अब आईआरसीटीसी से तत्काल रेल टिकट बुक करने के बाद कैश और डेबिट या क्रेडिट कार्ड से बाद में भुगतान कर सकेंगे। पे ऑन डिलीवरी की सर्विस अभी तक जनरल रिजर्वेशन के लिए उपलब्ध थी। अब तत्काल बुकिंग के लिए इस सेवा को उपलब्ध करा दिया गया है। यह सर्विस उन लोगों के लिए ज्यादा उपयोगी है जो टिकट तो ऑनलाइन बुक करना चाहते हैं लेकिन टिकट की पेमेंट ऑनलाइन नहीं करना चाहते या फिर ऑनलाइन टिकट बुक करने के बाद पेमेंट कैश में करना चाहते हैं।

ऐसे करता है तत्काल टिकट के लिए ‘पे ऑन डिलीवरी’ सिस्टम काम
इस सर्विस का फायदा उठाने के लिए यूजर को सबसे पहले irctc.payondelivery.co.in पर जाकर अपना रजिस्ट्रेशन करना होगा। रजिस्ट्रेशन करने के दौरान यूजर को अपने आधार कार्ड या पैन कार्ड की जानकारी देनी होगी।
इसके बाद जब आईआरसीटीसी पोर्टल पर तत्काल टिकट की बुकिंग करेंगे तो बुकिंग के दौरान यूजर को एंड्युरिल टेक्नोलॉजी के ‘pay-on-delivery’ ऑप्शन को चुनना होगा।

टिकट बुक होने के साथ ही टिकट को एसएमएस/ईमेल द्वारा डिजीटली डिलीवर कर दिया जाता है। इसमें सबसे खास बात यह है कि टिकट बुकिंग के 24 घंटे के अंदर-अंदर भुगतान करना होता है।
ग्राहक ऑनलाइन भुगतान भी कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें बुकिंग के समय एक पेमेंट लिंक भेजा जाता है।

पीएम मोदी को तोहफे में मिली विदेशी घड़ी, ढाई हजार का पैन, जानिए 2017 में मिले कौन-से गिफ्ट

अधिकारियों का कहना है कि ऐसा बहुत की कम होता है कि मंत्री और अधिकारी उपहार को अपने घर ले जाए। तोशखाने के रिकॉर्ड के मुताबिक पीएम मोदी को पहले दस हजार कीमत के दो डिनर सेट मिले थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैन्स और प्रशंसकों का कहना है कि वह कभी न थकने वाले इंसान हैं और बिना समय देंखे लगातार अपने काम में जुटे रहते हैं। बावजूद इसके इस साल पीएम मोदी को विदेश दौरों के दौरान कई गिफ्ट मिले हैं। आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक प्रधानमंत्री को ब्रिटिश कंपनी सेकोंडा की घड़ी मिली है। मंत्रियों और अधिकारियों को विदेश मंत्रालय के आधिकारिक भंडार तोशखाने में सारे उपहार जमा करने होते हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक तोशखाने में तैनात के अधिकारी ने बताया कि प्राप्तकर्ता 5 हजार से कम का गिफ्ट रख सकता है। 5000 से ऊपर का गिफ्ट रखने पर उसे अतिरिक्त पैसे चुकाने होते हैं।

पीएम मोदी को Sekonda ‘House of Commons’ हाथ घड़ी गिफ्ट में मिली है, जिसकी कीमत साढे तीन हजार रुपए है। घड़ी के अलावा पीएम को सजावटी चीनी मिट्टी के बरतन भी मिले हैं, इसकी कीमत एक हजार रुपए है। जनवरी से मार्च के बीच मोदी को मिले गिफ्ट में संयुक्त अरब अमीरात के शाही आवास का एक मॉडल, नक्काशी की हुई एक सजावटी मूर्ति और मोंट ब्लांक बॉलपेन पेन शामिल है। पेन की कीमत 2500 रुपए है और वह तोशखाने में रखा है। इसके अलावा रिपॉजिटरी में जमा अमीरती नेशनल हाउस के मॉडल का मूल्य 4500 रुपये है और आर्गिलिट नक्काशी वाली मूर्ति की कीमत 2000 रुपये है। तोशखाने में 83 नवीनतम प्रविष्टियों में ये छह वस्तुएं भी शामिल हैं। बता दें कि जून महीने में नीदरलैंड यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वहां के पीएम ने साइकिल गिफ्ट की थी।

अधिकारियों का कहना है कि ऐसा बहुत की कम होता है कि मंत्री और अधिकारी उपहार को अपने घर ले जाए। तोशखाने के रिकॉर्ड के मुताबिक पीएम मोदी को पहले दस हजार कीमत के दो डिनर सेट मिले थे और पंद्रह हजार रुपए कीमत की कालीन मिली थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनके कार्यकाल के दस साल में 101 गिफ्ट मिले थे। मनमोहन सिंह को अर्द्ध कीमती पत्थरों से सजा हुआ चांदी का हाथी मिला था। इसके अलावा 10 पेंटिंग, बोस कंपनी का साउंट सिस्टम और एक गोल्ड प्लेटेड लेडिज घड़ी मिली थी। इन सभी गिफ्ट्स में सिर्फ 7 चीजें ऐसी थी जिनकी कीमत 5 हजार से ज्यादा थी।

चीन ने अजीत डोभाल से कहा- बिना किसी शर्त के डोकलाम से अपनी सेना हटाये भारत

चीन ने बुधवार को कहा कि उसने भारत को अपने इस दृढ़ रूख की सूचना दे दी है कि मौजूदा गतिरोध खत्म करने के लिए उसे बिना किसी शर्त के सिक्किम क्षेत्र के डोकलाम से अपनी सेना तत्काल हटा कर ठोस कार्रवाई करनी चाहिए। चीनी विदेश मंत्रालय ने पीटीआई को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और चीन के स्टेट काउंसिलर यांग जेइची के बीच 28 जुलाई को हुई मुलाकात का पहली बार ब्योरा देते हुए बताया कि दोनों अधिकारियों ने ब्रिक्स सहयोग, द्विपक्षीय रिश्तों और प्रासंगिक प्रमुख समस्याओं पर चर्चा की थी। डोभाल ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साझे मंच ब्रिक्स में हिस्सा लेने के लिए पिछले माह बीजिंग में थे।

डोभाल और यांग दोनों भारत और चीन के बीच सीमा वार्ता के लिए विशेष प्रतिनिधि भी हैं। चीन के विदेश मंत्रालय ने डोकलाम से संबंधित गतिरोध पर दोनों देशों के बीच चर्चा के बारे में एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि यांग ने डोभाल से उनके आग्रह पर और तौर-तरीके के अनुरूप द्विपक्षीय मुलाकात की। डोकलाम पर गतिरोध तब शुरू हुआ जब चीन ने उस इलाके में सड़क बनाना शुरू किया।

चीनी विदेश मंत्रालय ने इंगित किया कि डोभाल और यांग के बीच वार्ता के दौरान कोई प्रमुख प्रगति नहीं हुई। मंत्रालय ने कहा, ‘‘यांग चेइची ने चीन-भारत सीमा के सिक्किम खंड पर चीन की सरजमीन में भारतीय सीमा बल के अतिक्रमण पर चीन के कठोर रूख और सुस्पष्ट अनिवार्यता जताई।’’ इस मुद्दे पर भारत का रूख पिछले माह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने स्पष्ट किया था। उन्होंने सीमा पर गतिरोध के शांतिपूर्ण समाधान की हिमायत करते हुए कहा था कि इसपर किसी वार्ता के शुरू करने के लिए पहले दोनों पक्षों को अपनी-अपनी सेनाए हटानी चाहिए।

भारत ने चीन सरकार को यह भी सूचित किया है कि उस क्षेत्र में सड़क निर्माण से यथास्थिति में उल्लेखनीय बदलाव आएगा जिसके गंभीर सुरक्षा निहितार्थ होंगे। चीनी विदेश मंत्रालय ने बताया कि डोभाल के साथ वार्ता में यांग ने भारत से आग्रह किया कि वह चीन की क्षेत्रीय संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और अंतरराष्ट्रीय रिश्तों को संचालित करने वाले बुनियादी नियम-कायदों का सम्मान करे और बिना कोई शर्त जोड़े अतिक्रमणकारी भारतीय सीमा बलों को भारतीय सरजमीन में वापस बुला ले और ठोस कार्रवाइयों से मौजूदा प्रकरण हल करे।

नीतीश कुमार से अलग होकर नई पार्टी बनाएंगे शरद यादव, नये कलेवर में सामने आएगा महागठबंधन

वर्मा ने दावा किया कि शरद जी ने जोर देकर कहा है कि वे धर्मनिरपेक्ष शक्ति वाले महागठबंधन में बने रहेंगे।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और जदयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव के बीच ”मतभेद” की अटकलों के बीच समाजवादी नेता और पूर्व विधान पार्षद विजय वर्मा ने शरद के महागठबंधन में बने रहने के लिए एक नई पार्टी बनाने के संकेत दिए हैं। शरद यादव के विश्वस्त माने जाने वाले और दो बार बिहार विधान परिषद सदस्य रहे विजय वर्मा ने शरद के महागठबंधन में बने रहने के लिए एक नई पार्टी बनाने के संकेत दिए हैं, पर जदयू के प्रधान महासचिव के सी त्यागी ने इसे अफवाह बताया है। जदयू के प्रदेश प्रवक्ता अजय आलोक ने शरद की ”नाराजगी” को आज खारिज कर दिया। वर्मा ने भाषा को मधेपुरा से फोन पर कहा कि शरद जी पुराने साथियों के संपर्क में हैं और राजनीतिक हालात पर विचार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि नए दल का गठन एक विकल्प है और उस पर संजीदगी से विचार किया जा रहा है। वर्मा ने दावा किया कि शरद जी ने जोर देकर कहा है कि वे धर्मनिरपेक्ष शक्ति वाले महागठबंधन में बने रहेंगे और इसी को जेहन रखते हुए वे कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और माकपा नेता सीताराम येचुरी से मिले थे।उन्होंने कहा कि शरद जी ने राजग सरकार में मंत्री के तौर पर शामिल होने से इंकार किया है। यह पूछे जाने पर कि अन्य किन किन लोगों से शरद यादव की बातचीत हुई है वर्मा ने नाम का खुलासा करने से इंकार करते हुए कहा कि उनका सोशल नेटवर्क बहुत बडा है।

Shah Rukh Khan can charm a microphone

Actor Anushka Sharma says Shah Rukh Khan’s genuineness made it easy for her to do on-screen romance with the superstar in their upcoming film, Jab Harry Met Sejal.

Anushka, who made her debut with Shah Rukh in Rab Ne Bana Di Jodi, has teamed up with the 51-year-old actor for the third time in the new film by Imtiaz Ali.

Asked how was it to romance Shah Rukh, Anushka told reporters, “Extremely easy. He has a lot of genuineness. If you see this song, his eyes have a lot of genuineness when he looks at you with love.”

“In my opinion, Shah Rukh can romance this mike also. He can look at the mike with the same kind of love he would look at the most beautiful woman in the world,” she said.

To this, SRK added in a lighter vein, “As long as you’re holding it I can romance it, otherwise no.”

They were speaking at the launch of Hawayein song from the movie, on Wednesday. The duo was accompanied by filmmaker Imtiaz Ali and music composer Pritam.

The 29-year-old actor has worked with directors like Yash Chopra and Aditya Chopra but said the best part about Imtiaz, with whom she has teamed up for the first time, was the “moments” he brought out between the two characters.

“His films are love stories but I don’t think the characters are aware that they are in love. There is some internal travel, soul searching which happens and then they realise it,” she said.

“That’s when they discover love… he has a very deep understanding of a man-woman relationship,” she added.

The film is scheduled to release on August 4. Hindustan Times

The blockbuster Hindi movie Jab Harry Met Sejal will be screening with English subtitles from August 4 at CEL circuit cinemas. It is imported by BMN Enterprises (who brought Baahubali 2) and distributed by Cinema Entertainments Pvt Ltd (CEL) The movie will be screening at Majestic Colombo, Regal Gampaha, Lido Borella (4.15 pm), City Cinema Mt Laviniya (4.15 pm), Savoy Premiere, Excel World, Liberty Lite Colpetty, Capitol Maradana, Plaza Kalutara, New Imperial Kurunegala and Ratnapura, Areena Katugastota, Chaya Kegalle, Vista Lite Ja-Ela, Sky Lite Matara, Queens Galle, Jothy Ratnapura, Willmax Anuradapura, Sinexpo Kurunagela, Nikado Kadawata, and TP Kaduwela

How To Know When You Are Ready To Get Married

 

It used to be when you’d hit certain financial and social milestones: when you had a home to your name, a set of qualifications on the mantelpiece and a few cows and a parcel of land in your possession.

But when, under the influence of Romantic ideology, this grew to seem altogether too mercenary and calculating, the focus shifted to emotions. It came to be thought important to feel the right way. That was the true sign of a good union. And the right feelings included the sense that the other was ‘the one’, that you understood one another perfectly and that you’d both never want to sleep with anyone else again.

These ideas, though touching, have proved to be an almost sure recipe for the eventual dissolution of marriages – and have caused havoc in the emotional lives of millions of otherwise sane and well-meaning couples.

We are ready for marriage…

1. When we give up on perfection 

We should not only admit in a general way that the person we are marrying is very far from perfect. We should also grasp the specifics of their imperfections: how they will be irritating, difficult, sometimes irrational, and often unable to sympathise or understand us. Vows should be rewritten to include the terse line: ‘I agree to marry this person even though they will, on a regular basis, drive me to distraction.’

However, these flaws should never be interpreted as merely capturing a local problem. No one else would be better. We are as bad. We are a flawed species. Whomever one got together with would be radically imperfect in a host of deeply serious ways. One must conclusively kill the idea that things would be ideal with any other creature in this galaxy. There can only ever be a ‘good enough’ marriage.

9 Things To Consider Before Leaving Your Relationship

The decision whether one should stay or leave is one of the most consequential and painful any of us ever has to make. On any given day, many millions of people worldwide will be secretly turning the issue over in their minds as they go about their daily lives, their partners beside them possibly having little clue as to the momentous decision weighing upon them.

The choice is perhaps more common now than it ever was. We expect to be deeply happy in love and therefore spend a good deal of time wondering whether our relationships are essentially normal in their sexual and psychological frustrations – or are beset by unusually pathological patterns which should impel us to get out as soon as we can. What films or novels we’ve been exposed to, the state of our friends’ relationships, the degree of noise surrounding new sexually-driven dating apps, not to mention how much sleep we’ve had, can all play humblingly large roles in influencing us one way or another.

Awkwardly, it seems that no one else actually really minds what we end up doing, which gives the decision a degree of existential loneliness it might not always have possessed. Historically, the choice was in a sense a good deal easier because there were simply so many stern external sanctions around not leaving. Religions would insist that God blessed unions and would be furious at their being torn asunder. Society strongly disapproved of break-ups and cast separating parties into decades of ignominy and shame. And psychologists would explain that children would be deeply and permanently scarred by any termination in their parents’ relationship.

But one by one, these objections to quitting have fallen away. Religions no longer terrify us into staying, society doesn’t care and psychologists routinely tell us that children would prefer a broken family to an unhappy one. The burden of choice therefore falls squarely upon us. The only thing determining whether to stay or leave is how we feel – which can be a hard matter indeed to work out for ourselves, our feelings having a dispiriting habit of shifting and evading any efforts at rational clarification.

My Friendships With Women Taught Me How Not To Be A “Good Girl”

My foundation of close friendships blossomed much later in life. More specifically, when I was 15.

During class introductions, one of my now-best friends said “My name is ___ and I am an aggressive person.” I had never heard “aggressive” in a positive light, let alone a girl describe herself as such with this much admiration. The class laughed. She had the reputation for being a comic and for being fierce. It’s an odd combination, really, to have the ability to frighten someone and also make them laugh. I was particularly intrigued by her because she owned her traits with the utmost pride. She wore rugged cargo shorts, a digital watch, and sandals to class; she was always loud and in no way did she fit the stereotype of how girls were supposed to be. But she inspired me to own my perceived imperfections and taught me to laugh at myself. She added excitement to her difference and was seen as much more than a sore thumb that stood out.

Growing up, I heard the phrase “lady-like” and “be a good girl,” a lot. Being a good girl meant complying with obedience, not sitting with my legs wide, hiding my period like it was the family’s will, not using cuss words, having neat braids, and smiling. To always, always smile. Being a girl came with an instruction manual; and the best ones, the “good girls,” checked everything off that list. One of my most precious friends embodied this completely. Her hair was always neat, her eyeliner was always on point, she even held an umbrella with grace. She is still very soft spoken, very patient, and one of the most organized people I know. But being the textbook definition of a woman is not only where her strengths lie and it’s most definitely not how she wants to be viewed in the society. Her strengths lie in the her powerful fidelity in friendships, in her ability to embrace change and challenge herself to grow.

…there’s an unbelievable level of support that’s derived from familiar misery.”

I think insecurities are like an unwanted sibling we’ve grown up with as women ― about our bodies (mostly), the rejection to our personalities, the casual and serious sexism in everyday language, the shunning of our beliefs, our puberty and the wrath of periods, the silly customs that come along with the periods, and blah, blah, blah.

You know what’s the worst thing about developing a culture of insecurities? It also stimulates an air of hate. If daadi claims that you’re too dark or tan to be viewed as beautiful, you not only begin to dislike a part of you but also dislike the same part in someone else. I know I have, on several occasions, over the silliest things. There goes the scope for one good friendship to be built! It’s a vicious cycle, and if we get sucked in and become accustomed to aspiring toward society’s definition of perfection, we may dangerously harbor hate and negativity for someone else. Yet funnily, there is no “one size fits all” definition to this said perfection. Magazines still continue to pit two beautiful women against each other under a ‘who wore better?’ poll. Nothing is ― or will ever be ― enough.

Strangely, insecurities also make for the the best jokes; and if you shared one of yours with someone else, you’d be surprised at what a hit you will be at that party. My old workplace had five of us who would compete on whose moustache hair grew the fastest. Objectively, ours are the most insignificant body hair that has ever existed, but it was the root of so much self shaming until they became the most popular joke at the lunch table. The women in my life are some of the funniest people I will ever know, because there is no joke funnier than the trauma of underboob sweat and the reality of leg stubble. Even if the world won’t stop adding to our list of insecurities and the threats to our safety, there’s an unbelievable level of support that’s derived from familiar misery. It’s like we’re spiders working at making webs of connection, shared sensibilities, laughter, validation and assurance. Lots of assurance.

The Social Psychology Behind Fashion

What are the most interesting ways signaling theory has shaped our contemporary culture? originally appeared on Quora – the knowledge sharing network where compelling questions are answered by people with unique insightsAnswer by Judith Donath, author of The Social Machine and former director of the Sociable Media Group, on Quora.

One quite interesting way that signaling has shaped the contemporary human world is the rise of fashion, in clothing, but also in many other areas, including slang, car styling, management theories, programming languages, painting styles, etc. Like many costly signals, fashion appears frivolous and wasteful: why do we feel a need to continually replace perfectly good things with something new and different?

My hypothesis is that fashion is a signal of one’s skill with information — of one’s access to it and one’s ability to distinguish good information from bad. To be at the forefront of new fashions you have to both be privy to knowing what is new and upcoming and also be able to distinguish which is going to be the next cool new thing from something that is merely odd and different. The cost in fashion is the risk of making a mistake, of adopting the wrong thing.

The rate of change in fashion, the acceleration of information, moves faster and faster. Around the time of the birth of fashion around the 15th century information moved very slowly. It could take a year for the information about what was being worn in the courts of Paris to reach a princess in Poland. Today fashion moves around the globe instantaneously and fashion changes faster and faster. On the negative side, fashion thus creates tremendous waste, understanding the motivation behind it is key to ameliorating this problem.

But fashion is also closely related to innovation adoption. We can think of them as orthogonal phenomena: a pure fashion has no practical utility and is adopted solely for signaling social position while the ideal innovation is all utility, adopted for its usefulness. Understanding their interplay helps us understand why new ideas do and do not spread.