इन पांच ‘राष्ट्रीय भ्रमों’ के शिकार कहीं आप तो नहीं

राजस्थान हाई कोर्ट के जज ने हाल ही में गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की सिफारिश की थी. जस्टिस शर्मा की सिफारिश को लेकर काफ़ी विवाद हुआ. ऐसे विवादों में अक्सर सच कहीं और छिप जाता और लोगों की धारणा हावी हो जाती है.

जिस तरह से राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय चिह्न, राष्ट्र गान और राष्ट्र गीत हैं क्या उसी तरह से वाकई राष्ट्रीय पशु या राष्ट्रीय पक्षी हैं? देश के जाने माने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है कि राष्ट्रीय ध्वज और चिह्न को संविधान सभा ने स्वीकार किया था लेकिन पशु और पक्षी के साथ ऐसा नहीं है.

कश्यप का कहना है कि ऐसे मामलों में नोटिफिकेशन जारी किया जाता है.

गाय राष्ट्रीय पशु घोषित होः राजस्थान हाईकोर्ट

कार्टून

नोटिफ़िकेशन

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इस मामले में 2011 में नोटिफिकेशन जारी किया था. इस नोटिफिकेशन में बाघ को राष्ट्रीय पशु और मोर को राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा देने की बात कही गई लेकिन ये दर्जा संवैधानिक हैसियत नहीं रखता.

इस नोटिफिकेशन को पर्यावरण और वन मंत्रालय के वाइल्ड लाइफ विभाग ने जारी किया था. वाइल्ड लाइफ विभाग ने कहा कि किसी पशु को राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिलने का मतलब उसके संरक्षण से है न कि राष्ट्रीय अस्मिता और गर्व से.

कौन बने राष्ट्रीय पशु? गधा!

क्या राष्ट्रीय है और क्या क्षेत्रीय इसे लेकर लोगों की बीच काफ़ी भ्रम की स्थिति रहती है. हम यहां ऐसे ही कुछ ‘राष्ट्रीय झूठ’ के बारे में आपको बता रहे हैं.

हिन्दी राष्ट्र भाषा नहीं है

हिंदी

सुभाष कश्यप का कहना है कि देश की कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं है बल्कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी 22 भाषाएं राष्ट्रभाषा हैं.

कमल राष्ट्रीय फूल नहीं

कमल का फूल

कमल के राष्ट्रीय फूल होने के संबंध में भी सरकार के पास कोई रिकॉर्ड नहीं है. कमल बीजेपी का चुनाव चिह्न है, न कि राष्ट्रीय फूल.

महात्मा गांधी राष्ट्रपिता हैं?

आधिकारिक रूप से महात्मा गांधी राष्ट्रपिता नहीं हैं. महात्मा गांधी के लिए पहली बार राष्ट्रपिता शब्द का इस्तेमाल सुभाषचंद्र बोस ने किया था. इसके बाद से ही उन्हें सम्मान देने के लिए राष्ट्रपिता कहा जाने लगा.

महात्मा गांधी

कोई राष्ट्रीय मिठाई या फल नहीं

लोगों के बीच आम धारणा है कि आम राष्ट्रीय फल है लेकिन यह ग़लत है. देश में पैदा होने वाले किसी भी फल को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय श्रेणी में नहीं रखा गया है.

उसी तरह किसी मिठाई को भी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय श्रेणी में नहीं रखा गया है.

हॉकी राष्ट्रीय खेल नहीं है

हॉकी

भारत में हॉकी को लेकर भी एक राष्ट्रीय भ्रम है कि यह राष्ट्रीय खेल है. जब भी हॉकी की स्थिति पर यहां बात होती है तो तो सबसे पहले यह कहा जाता है कि हमारे देश के राष्ट्रीय खेल की ऐसी दुर्दशा हो गई है. 2012 में केंद्र सरकार से युवा मामलों के मंत्रालय ने साफ़ कर दिया था कि हॉकी राष्ट्रीय खेल नहीं है.

India is getting hotter than previously thought, study shows

However, the temperature rise in India is sober considering that the world is on track for far more warming.

India is now two and a half times more likely to experience a deadly heat wave than a half century ago, and all it took was an increase in the average temperature of just 0.5 degrees Celsius, a new study shows.

The findings are sobering considering that the world is on track for far more warming. For the last two weeks much of Asia has been gripped by a heat wave, with a record high of 53.5 degrees C set in the southwest Pakistani city of Turbat on May 28 the world’s hottest-ever temperature recorded for the month of May. Temperatures in New Delhi have soared beyond 44 degrees C.

Even if countries are able to meet the Paris Agreement goals in curbing climate-warming carbon emissions, that would still only limit the global temperature rise to an estimated 2 degrees C. U.S. President Donald Trump’s recent pledge to exit the Paris treaty won’t help.

“It’s getting hotter, and of course more heat waves are going to kill more people,” said climatologist Omid Mazdiyasni of the University of California, Irvine, who led an international team of scientists in analysing a half century of data from the Indian Meteorological Department on temperature, heat waves and heat-related mortality.

“We knew there was going to be an impact, but we didn’t expect it to be this big,” he said.

Their study, published on Wednesday in the journal Science Advances, shows that, while India’s average temperatures rose by more than 0.5 degrees C between 1960 and 2009, the probability of India experiencing a massive heat-related mortality event defined by more than 100 deaths shot up by 146 per cent.

The study also found that the number of heat wave days increased by 25 per cent across most of India. Areas in the south and west experienced 50 per cent more heat wave events, or periods of extreme heat lasting more than three or four days, in 1985-2009 compared with the previous 25-year period.

It’s harder to estimate how deadly future warming might be. There is no historical data for heat wave mortality at those peak temperatures, and death tolls could increase sharply as it gets even hotter.

“The general public may think that a 1 or 2 degree temperature rise is not that significant, but our results show that even small changes can result in more heat waves and more death,” said Amir AghaKouchak, another climatologist at UC Irvine and a co-author of the report.

Scientists have warned for years that climate change will make heat waves more intense, more frequent and longer lasting.

“It stands to reason there would be more dire health impacts with more severe heat waves, and this paper provides a key quantification of those impacts for one region of the world,” said climate scientist Gerald Meehl of the National Centre for Atmospheric Research in Boulder, Colorado, who was not involved in the study.

The same methodology can be applied in any region to get a sense of how vulnerable a country or population might be, the authors said.

They accounted for India’s fast-rising population and income levels in the analysis, to make sure neither affected the results. In the case of income, they found an even stronger correlation between heat waves and deaths among those who are poor.

That’s bad news as India is already seeing new deadly highs. Last year in May, Jaisalmer recorded a record 52.4 degrees C.

The vast majority of India’s 1.25 billion people are poor and have few options as temperatures hit sweltering levels, drying forests and riverbeds and wiping out farm animals. Most in India rely on agriculture for their livelihoods, and climate change is likely to hurt their crops.

Many who work as farmers or in construction will have to shorten their work days by 2-3 hours within four decades, simply because it will be too hot outdoors, according to a report last year by the U.N. Environment Program.

Most cities and states are not prepared to handle more heat, even if they understand the devastation it can wreak. In 2010, some 1,200 people died in a heat wave in Ahmedabad, prompting city officials to introduce seven-day weather forecasts, extra water supplies and cool-air summer shelters.

After more than 2,500 were killed in heat-ravaged areas across India in 2015, nine other cities rolled out a plan to educate children about heat risk, stock hospitals with ice packs and extra water, and train medical workers to identify heat stress, dehydration and heat stroke.

But the nine cities cover only about 11 million people, not even 1 per cent of the country’s population.

“Heat wave stress is a relatively new aspect that hasn’t been recognized” as a climate change threat in the region, said scientist Saleemul Huq, director of the International Centre for Climate Change and Development in Dhaka. In Bangladesh, “we are seeing more heat waves, there’s no doubt about it. And there is strong anecdotal evidence that we are seeing a similar trend in mortality. I would recommend a similar study here.”

क्या हैदराबाद के बाजारों में बिक रहे हैं ‘प्लास्टिक के चावल’? सरकार ने नमूनों को जांच के लिए भेजा

हैदराबाद: सोशल मीडिया पर कई वीडियो इन दिनों वायरल हो रहे हैं जिसमें बताया जा रहा है कि किस तरह लोग घर में पके चावलों की बॉल बनाकर खेल सकते हैं. सुनने और देखने में थोड़ा अजीब लगे, लेकिन यह दिखाया जा रहा है. पिछले सात दिनों में हैदराबाद के अलग-अलग इलाकों से ‘प्लास्टिक के चावल’ की शिकायतें आ रही हैं. जिनमें चार मीनार, यूसुफगुडा, सरूरनगर, मीरपेट के आउटलेट शामिल हैं.

इन शिकायतों के सामने आने के बाद तेलंगाना नागरिक आपूर्ति विभाग को ऐसे नमूनों को जांच के लिए खाद्य प्रयोगशाला भेजना पड़ा. विभाग के अधिकारियों ने बताया कि खबरें गलत हैं और वे ‘प्लास्टिक वाले चावल’ नहीं हैं, लेकिन उन्होंने विस्तृत जांच के लिए नमूनों को प्रयोगशाला भेजा है और जल्द इसकी रिपोर्ट आ जाएगी. शहर के विभिन्न इलाकों में स्थानीय लोगों और एक हॉस्टल में रहने वाले लोगों ने दावा किया था कि उन्होंने जो चावल खरीदे और खाए वे काफी चिपचिपे थे और सामान्य चावल से उनका स्वाद अलग था. उन्होंने आरोप लगाया कि ये ‘प्लास्टिक वाले चावल’ थे.

एक अधिकारी ने बताया कि बाद में राज्य के नागरिक आपूर्ति आयुक्त सी वी आनंद ने अधिकारियों को यौसुफ्गुदा, सरूरनगर, मीरपेट और अन्य स्थानों से चावल के नमूने एकत्रित करने के निर्देश दिए, जहां से शिकायतें मिल रही थीं. नमूनों को जांच के लिए राज्य की खाद्य प्रयोगशाला में भेजा गया.

उन्होंने कहा, ‘गुरुवार तक एक विस्तृत रिपोर्ट मिलने की संभावना है.’ शहर के नंदनवनम इलाके के निवासी अशोक ने मीरपेट पुलिस थाने में एक शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि उसने एक स्थानीय विक्रता से चावल खरीदे और जब उसने उन्हें पकाया तो वे ‘प्लास्टिक के चावल’ निकले. उसने कहा कि वह चिपचिपे हो गए थे और उसमें से अजीब गंध आ रही थी.

बहरहाल, पुलिस ने प्राथमिक जांच के आधार पर कहा कि शिकायतकर्ता ने जो नमूने दिए वे ‘प्लास्टिक वाले चावल’ नहीं थे. पुलिस ने कहा कि उसने इस मामले के बारे में नागरिक आपूर्ति विभाग को सूचना दी और उसे इसके नमूने भेज दिए. एक निजी हॉस्टल में रहने वाले लोगों ने भी ऐसा ही आरोप लगाया कि उन्हें ‘प्लास्टिक वाले चावल’ परोसे गए, जिसका स्वाद सामान्य चावल से अलग था.

Is ‘plastic rice’ for real?

Telangana Civil Supplies Department flooded with complaints about hotels using ‘plastic rice’ in their food items

The Telangana Civil Supplies Department is being flooded with complaintsabout hotels in the twin cities of Hyderabad and Secunderabad using ‘plastic rice’ in their food items. Samples have been collected from various hotels to verify the claims. And this is not limited to Telangana alone. Over the past few years, rumours of ‘plastic rice’ being sold have been doing the rounds and a public interest litigation was even filed before the Delhi High Court .

The origin

The term ‘plastic rice’ first surfaced in China in 2010. Dubbed the Wuchang rice scandal, Chinese officials unearthed a scam by companies who passed off ordinary rice as premium Wuchang rice by adding flavours to it. The Wuchang rice, known for its unique aroma, is exported to various nations. Chinese traders are believed to have made a huge profit through this scam.

In 2011, a report by The Korea Times said: “Some distributors are selling fake rice in Taiyuan, Shaanxi Province, and this rice is a mixture of potatoes, sweet potatoes and plastic.” Needless to say, the report mentioned in detail the hazards of eating synthetic resin. Thus the term ‘plastic rice’ came into existence.

The BBC, last December, reported that a huge shipment of ‘plastic rice’ was seized in Nigeria, making it the first major confiscation. Days later, Nigeria ruled out plastic in the confiscated shipment. “The rice was contaminated with bacteria,” Nigeria’s National Agency For Food and Drugs said.

Apart from these two reports, the mainstream media doesn’t have much information on ‘plastic rice’. But the web is flooded with information ranging from YouTube videos on how it is manufactured to “Ways to spot a fake rice.” And the social media too is cluttered with forwards on the “Chinese conspiracy” behind dumping ‘plastic rice’.

Fact check

So is ‘plastic rice’ real? Unfortunately, there is no credible answer to this question. As far as India is concerned, ‘plastic rice’ has never been seized so far, though time and again there have been reports of demonstrations against such rice. Fact verification website snopes.com said the claim stands “unproven”.

In a report, it said, “The plastic rice story [and its fellow counterfeit Chinese food export legends] resemble an internationally viral 2007 CCTV segment about pork buns purportedly made with scrap cardboard, for which an independent journalist was eventually detained and accused of faking the oft-referenced story.”

मोदी के कृषि मंत्री ने भी ओढ़ी किसानों की मौत पर चुप्पी

बीजेपी शासित मध्य प्रदेश के मंदसौर में गोली लगने से पांच किसानों समेत छह लोगों की मौत हो गई. लेकिन इस पर अब तक देश के कृषि मंत्री और प्रधानमंत्री का कोई बयान नहीं आया है.

किसानों का कहना है कि उन पर पुलिस ने गोलियां चलाईं, लेकिन अधिकारी ‘असामाजिक तत्वों’ को ज़िम्मेदार बता रहे हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस पर किसानों को भड़काने का आरोप लगाया है.

इस बीच कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह बुधवार को दिल्ली में अपने कार्यक्रमों और गतिविधियों की तस्वीरें ट्विटर पर लगाते रहे, लेकिन मंदसौर घटना पर उन्होंने एक भी ट्वीट नहीं किया.

‘सरकारी कर्मी को कंडोम भत्ता, किसान को लागत भी नहीं’

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान क्यों हैं नाराज़

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी इस बीच ऐसे मौक़ों पर चुप्पी ओढ़ने के आरोप बढ़े हैं. लेकिन एकाधिक मौक़ों पर उनके मंत्रियों का बयान आ ही जाता है. इस बार कृषि मंत्री भी चुप हैं.

मंदसौर घटना के अगले दिन 7 जून को अख़बारों में सरकार ने कृषि क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों वाले विज्ञापन छपवाए. न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार ऐलेन बैरी ने इसकी तस्वीर ट्विटर पर साझा की.

ने इसकी तस्वीर ट्विटर पर साझा की.

एलेन बैरी

बुधवार को कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने ‘स्वच्छता पखवाड़ा’ कार्यक्रम के ‘सफल समापन’ पर कैबिनेट ब्रीफ़िंग और प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले थे, लेकिन इसे ‘अपरिहार्य कारणों’ से स्थगित कर दिया गया.

लेकिन इसी दिन उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से उनके दफ़्तर में मुलाक़ात की. बातचीत का विषय था- हिमाचल प्रदेश में कृषि संस्थान और शिक्षा.

राधामोहन सिंह

इसके बाद उन्होंने केरल के कृषि मंत्री से वहां की एक समस्या पर चर्चा की. उनसे इस मसले पर प्रस्ताव मांगा और मदद का आश्वासन दिया. इस बैठक की तस्वीरें भी उनके ट्विटर हैंडल से लगाई गईं.

राधामोहन सिंह

इसके बाद उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा (ICAR) में जनजातीय क्षेत्रों में किसानों के सशक्तिकरण के मुद्दे पर एक राष्ट्रीय वर्कशॉप को संबोधित किया.

राधामोहन सिंह

कृषि मंत्री दिन भर ट्विटर पर सक्रिय और व्यस्त रहे, लेकिन मंदसौर की घटना, जिसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने भी इतनी प्रमुखता से कवर किया, उस पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा.

बिहार के पूर्वी चंपारण से सांसद राधामोहन सिंह पहले विवादों में भी रह चुके हैं. इससे पहले 2015 में राज्यसभा में दिए एक लिखित जवाब में कह चुके हैं कि किसान की ख़ुदकुशी में क़र्ज़ के साथ-साथ, दहेज़, प्रेम संबंध और नामर्दी भी एक वजह है.

राधामोहन सिंह
Image captionशपथ ग्रहण करते राधामोहन सिंह

उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भी बयान का इंतज़ार है. मंदसौर घटना के बाद से वह ट्विटर पर नेपाल के नए प्रधानमंत्री को बधाई, उत्तान मंडूक आसन के फायदे बताने वाला वीडियो और एससीओ सम्मेलन में शामिल होने की सूचना ट्विटर पर पोस्ट कर चुके हैं. लेकिन किसानों की मौत पर अभी तक ‘दुख जताने’ वाली प्रतिक्रिया भी नहीं आई है.

इस बीच विपक्षी सोशल मीडिया कार्यकर्ता प्रधानमंत्री का एक पुराना ट्वीट खूब शेयर कर रहे हैं. जब आम आदमी पार्टी की रैली में गजेंद्र नाम के किसान ने ‘कथित’ ख़ुदकुशी कर ली थी और चंद घंटों में प्रधानमंत्री ने इस पर ट्वीट कर दिया था.

ट्वीट

जानकारों के मुताबिक, इस बार बंपर फ़सल होने से आपूर्ति ज़्यादा है, इसलिए किसानों को उचित दाम नहीं मिल रहे हैं.

इससे पहले महाराष्ट्र में कई ज़िलों के किसान क़र्ज़ माफ़ी और फ़सलों के उचित दाम की मांग करते हुए हड़ताल पर चले गए थे और उन्होंने सब्ज़ियों और दूध की आपूर्ति रोकना शुरू कर दिया था. हालांकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के आश्वासन के बाद हड़ताल वापस ले ली गई.

जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसानों के बहुचर्चित प्रदर्शन को भी अभी ज़्यादा दिन नहीं बीते हैं.

तमिलनाडु किसान
Image captionतमिलनाडु के किसानों ने इस तरह दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था

क़र्ज़ माफ़ी है इलाज?

फ़सलों के ख़राब होने पर किसान क़र्ज़ लेते हैं, लेकिन उसे चुकाने के लिए फ़सलों से उन्हें वैसी आमदनी नहीं होती. इस तरह ये क़र्ज़ बढ़ता जाता है.

ज़्यादातर मामलों में किसानों की तरफ से क़र्ज़ माफ़ी की मांग को पुरजोर तरीके से रखा जा रहा है, लेकिन किसानों की समस्याओं के स्थायी इलाज के लिहाज से यह तरीका सवालों के घेरे में है.

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने दो करोड़ से ज़्यादा लघु और सीमांत किसानों के एक लाख रुपये तक का क़र्ज़ माफ़ करने का ऐलान किया. लेकिन आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने इस फ़ैसले की आलोचना की और कहा कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक नुकसान होगा.

उन्होंने कहा था, ‘मुझे लगता है कि ऐसी क़र्ज़ माफियों से परहेज़ करने पर हमें सहमति बनाने की ज़रूरत है. वरना ऐसी चुनौतियों का असर देश की बैलेंस शीट पर दिखाई देगा.’