दिल्ली में ढहाई गई मस्जिद, डर और ख़ौफ़ में इलाके के मुसलमान

पूर्वोतर दिल्ली के अम्बे विहार में 400 से 500 लोगों की भीड़ ने एक ‘मस्जिद’ को ढहा दिया है.

घटना पिछले बुधवार यानी सात जून की है जब दिल्ली पुलिस के पीसीआर पर सूचना दी गई कि एक भीड़ सोनिया विहार के अम्बे कॉलोनी में मस्जिद को ढहा रही है.

मुश्ताक़ अहमद का घर ढहाई गई मस्जिद के दो घरों के बाद है.

 

मुश्ताक़ अहमद कहते हैं, “हमने पहली रमज़ान से वहां नमाज़ शुरू की थी. तरावीह (रमज़ान में अदा की जाने वाली ख़ास नमाज़) भी वहां अदा हो रही थी कि हमारे कुछ भाइयों ने एक दिन उसे ढहा दिया. यही सच है.”

दिलों में डर

दिल्ली में मस्जिद पर विवाद

रेडीमेड कपड़ों की फ़ैक्ट्री में छोटा-मोटा धंधा करने वाले मुश्ताक़ हालांकि अपनी बात कहना चाहते हैं, लेकिन मिल रही धमकियों से पूरा ख़ानदान बेहद डरा हुआ है.

अहमद की पत्नी आमीना बिना प्लास्टर के दीवारों वाले कमरे में लगी चौकी के पास खड़ी हैं.

आमीना को इस बात का ग़म नहीं कि मस्जिद ढहा दी गई, लेकिन उन्हें ‘पाक क़ुरान की बेहुरमती (बेईज्ज़ती) किए जाने का बेहद ग़म है.’

वो कहती हैं कि उन्हें धमकियां मिल रही हैं कि मामला ठंडा हो जाने के बाद उन्हें अंजाम भुगतना होगा.

परिवार

बताया जा रहा है कि कुछ मुसलमान अम्बे कॉलोनी छोड़ रहे हैं.

शाहरुख़ (बदला हुआ नाम) को अपनी हेयर कटिंग सैलून बंद करनी पड़ी है. उनके मकान मालिक ने उन्हें दुकान ख़ाली करने का नोटिस दे दिया जिसके बाद अब वो उसे घर पर ही शुरू करने की कोशिश कर रहे हैं.

आमीना के पड़ोस में दो हिंदू परिवार हैं, लेकिन इस वक़्त वो वहां मौजूद नहीं हैं, बताया गया,”सब काम पर गए हैं.’

कब बनी मस्जिद?

यमुना पुश्ता के इलाक़े में बसे सभी लोग कमज़ोर आर्थिक तबक़े से तालुक्क़ रखते हैं और सुबह होते ही काम पर निकल जाते हैं.

उस बुधवार भी कुछ ऐसा ही हुआ था. विमलेश मौर्य ने भी मस्जिद तोड़ने वाली भीड़ को देखा था, वो कहती हैं, “400 से 500 लोगों की भीड़ थी. लोग काम पर गए हुए थे. मैं नहीं बता सकती कहां से आई थी, लेकिन उन लोगों ने मस्जिद गिरा दी.”

विमलेश मौर्य

हालांकि विमलेश साथ-साथ ये भी कहती हैं कि मुसलमान भाई क़ुरान पाक की क़सम ले कर घिरी दीवार पर चटाई डाल दी और नमाज़ पढ़ने लगे.

मुश्ताक़ और कॉलोनी के दूसरे मुसलमान के मुताबिक़ कि मस्जिद बनाने का काम चंद माह पहले ही शुरू हुआ था और नमाज़ भी वहां अदा करने का काम रमज़ान में ही शुरू हुआ था.

मुसलमान वहां एक छोटा मदरसा भी चला रहे थे जहां बच्चों को धार्मिक शिक्षा दी जा रही थी.

मंदिरों की कमाई घटी, मस्जिद में हाल पहले जैसा

मुश्ताक़ कहते हैं कि मस्जिद की ज़मीन के लिए वहीं रहने वाले अकबर अली नाम के व्यक्ति से बातचीत हुई थी कि उन्हें धीरे-धीरे पैसे दे दिए जाएंगे.

मगर इलाक़े में दूसरी तरह की अफ़वाहों का बाज़ार भी चल रहा है.

कृष्णपाल शर्मा कुछ महीने पहले ही बागपत से बेटे के पास आए हैं और उन्हें बताया गया है कि ज़मीन किसी साधू की थी और ज़मीन में शिव लिंग भी मौजूद था, लेकिन साधू हरिद्वार गया और ज़मीन पर नमाज़ पढ़ी जाने लगी.

कृष्णपाल शर्मा

शब्बीर कहते हैं कि अगर हमारे भाइयों को एतराज़ था तो उन्होंने पहले क्यों नहीं कहा और अब मस्जिद को क्यों ढहाया गया है.

व्हाट्सएप पर मस्जिद का विरोध

विमलेश सीधे तौर पर कहती हैं कि गांव के लोगों को एतराज़ है कि वहां मस्जिद बने.

सुरक्षा

इस बीच अम्बे कॉलोनी की गली नंबर दो के प्लॉट नंबर 149 को लेकर अफ़वाहें जारी हैं – व्हाट्सऐप पर शेयर किये जा रहे मैसेजेज़ में हिंदुओं से कहा जा रहा है कि वहां 8-10 घर ही मुसलमानों के हैं तो फिर वो मस्जिद क्यों बना रहे हैं.

हिंदुओं से कहा जा रहा है कि इस इस्लामिक प्रकिया को रोका जाना चाहिए.

लोग

पुलिस ने मामले में ज़मीन के मालिक – अकबर अली की शिकायत पर आठ लोगों के ख़िलाफ़ एफ़आरआई दर्ज की है और दो लोगों को गिरफ़्तार भी किया गया है.

दर्जन भर पुलिस की टुकड़ी मस्जिद के पास मौजूद एक ख़ाली प्लॉट में खाट और कुर्सियां डालकर चौकीदारी पर लगी है.

पूर्वोतर दिल्ली के अतिरिक्त पुलिस कमिश्नर देवेंद्र आर्य ने कहा कि पुलिस शाम के वक्त – ख़ासतौर पर इफ़्तार के वक्त वहां रास्तों और गलियों का दौरा कर रही है.

संघ की ही उपज हैं मंदसौर के विद्रोही किसान नेता कक्का जी

खेती के लिए खाद ख़रीदने लाइन में लगे बालक से ज़िले के कलेक्टर साहब ने कहा कि बेटा धूप में क्यों खड़े हो छांव में आ जाओ तो बालक ने जवाब दिया कि साहब किसान का बेटा जब छांव से प्रेम करेगा तो इस देश की जनता का पेट कौन पालेगा…”

यह 11 साल के बालक थे शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्का जी, जो इन दिनों मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं.

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किसानों के प्रमुख नेता के रूप में पहचान रखने वाले कक्का जी इन दिनों मध्य प्रदेश में भारतीय किसान मजदूर संघ के अध्यक्ष और संस्थापक सदस्य के रूप में किसानों की अगुवाई कर रहे है.

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कौन है कक्का जी?

कक्का जी

20 दिसंबर 2010 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को 15 हज़ार किसानों ने अपने ट्रैक्टर-ट्रालियों से घेर लिया था. मुख्यमंत्री निवास से लेकर शहर के सभी प्रमुख रास्तों को किसानों ने जाम कर दिया था.

उस समय आरएसएस से जुड़े किसान संगठन भारतीय किसान संघ की मध्य प्रांत इकाई के अध्यक्ष के रूप में कक्का जी ने मोर्चा संभाला था.

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इसी अंदोलन ने शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्का जी को एक नई पहचान भी दी थी. मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के वनखेडी के पास ग्राम मछेरा खुर्द में 28 मई 1952 को एक किसान परिवार में जन्में कक्का जी ने अपनी शिक्षा जबलपुर में पूरी की.

जबलपुर विश्वविद्यालय से लॉ ग्रेजुएट और एमए राजनीति शास्त्र की शिक्षा प्राप्त शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्का जी छात्र राजनीति में शरद यादव के साथ जुडे रहे. कई बार जेल जा चुके शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्का जी बताते है कि जेपी आंदोलन और इमरजेंसी के दौरान भी वह कई बार जेल गए.

उन्होंने 1981 में मध्य प्रदेश सरकार की विधि बोर्ड में सलाहकार के रूप में काम किया. लेकिन इस दौरान तत्कालीन मध्यप्रदेश के बस्तर में केंद्र सरकार के कानून 70 (ख) के तहत आदिवासियों की ज़मीन मुक्त करवाने के दौरान वह कई रसूखदारों के निशाने पर आ गए जिसके बाद उनका ट्रांसफर भोपाल कर दिया गया.

कुछ समय नौकरी करने के बाद वह किसान आंदोलन में कूद पड़े. वे भारतीय किसान संघ में पहले महामंत्री और बाद में अध्यक्ष रहे.

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शिवराज का विरोध

मध्य प्रदेश के रायसेन ज़िले की बरेली तहसील में किसान आंदोलन के दौरान पुलिस की गोली लगने से एक किसान की मौत और आगजनी के बाद कक्का जी को गिरफ्तार कर लिया गया था वह दो महीने जेल में भी रहे.

उन पर 12 मुक़दमें भी चल रहे है. कक्का जी के परिवार में उनकी पत्नी डॉ. मंजुला शर्मा हैं, जो शासकीय डिग्री कालेज में प्रिंसिपल है और दो बेटियां निहारिका और आवंतिका हैं. निहारिका स्पोर्ट्स टीचर तो आवंतिका दिल्ली में इंजीनियर है.

कक्का जी बताते है कि दिसंबर 2010 में तीन दिनों के लिए राजधानी भोपाल का घेराव किया था उस समय मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों की 85 मांगों के माँग पत्र को गीता बताया था. शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कक्का जी कहते है कि शिवराज सिंह चौहान विवेकहीन और दिशाहीन है.

मध्य प्रदेश में कभी बीजेपी सरकार बनवाने में प्रमुख भूमिका रखने वाले और शिवराज सिंह चौहान के शुभचिंतकों में गिने जाने वाले कक्का जी अब उनके सबसे प्रबल विरोधियों में गिने जाते है.

शिवकुमार शर्मा किसानों के लिए बनाए गए स्वामीनाथन आयोग को लागू करने की वकालत करते हैं. 1 जून से मध्यप्रदेश सहित पूरे देश में शुरू हुए किसान आंदोलन में मध्य प्रदेश में किसान आंदोलन की अगुवाई शिवकुमार शर्मा उर्फ कक्का जी कर रहे है जो अब किसी पहचान के मोहताज नहीं.

कज़ाकस्तान में मिले मोदी और शरीफ़, पूछा हालचाल

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ कजाकस्तान में शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ सम्मेलन के स्वागत समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का आमना-सामना हुआ. दोनों नेताओं ने एक-दूसरे का अभिवादन किया.

अख़बार के मुताबिक़ मोदी ने शरीफ़ और उनकी मां की सेहत का हालचाल लिया.

स्वागत समारोह के लिए रवाना होने से पहले शरीफ़ से सवाल किया गया था कि क्या उनकी मोदी से मुलाक़ात होगी? इस पर वह सिर्फ़ मुस्कुराए और मीडियाकर्मियों की ओर हाथ हिलाया. शरीफ़ के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज़ ने इस सवाल का जवाब नहीं दिया.

भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गोपाल बागले का भी कहना है कि मुलाक़ात के लिए न तो पाकिस्तान की ओर से अनुरोध किया गया है और न ही ऐसा कोई प्रस्ताव भारत ने किया है.

फ़ाइल फोटो

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ तेल कंपनियों ने 16 जून से पूरे देश में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में हर रोज़ बदलाव करने का फैसला किया है.

देश की तीन बड़ी तेल कंपनियों- इंडियन ऑयल, हिन्दुस्तान पेट्रोलियम और भारत पेट्रोलियम ने कहा है कि देशभर में 58,000 पेट्रोल पंपों पर 16 जून से पेट्रोल व डीजल के दाम दैनिक आधार पर तय होंगे.

इसके अनुसार अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी विनियम दर के आधार पर पेट्रोल और डीज़ल के दामों में 16 जून से दैनिक आधार पर कुछ पैसे का बदलाव होगा.

जनरल बिपिन रावत

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ भारत के थलसेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत का कहना है कि भारतीय सेना बाहरी के साथ-साथ आंतरिक खतरों से भी निपटने के लिए बिल्‍कुल तैयार है. उन्‍होंने कहा कि भारत ढाई मोर्चे (पाकिस्‍तान, चीन और आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी जरूरतें) पर युद्ध लड़ने के लिए पूरी तरह से सक्षम है.

अखबार ने समाचार एजेंसी एएनआई के हवाले से लिखा है कि सेना प्रमुख रावत ने कहा कि भारत मल्टी-फ्रंट युद्ध के लिए तैयार है. रावत ने कहा कि सेना के पास प्रतिकूल स्थिति से निपटने के लिए प्रभावी तंत्र उपलब्ध है.

ममता बनर्जी

दैनिक भास्कर के मुताबिक़ पश्चिम बंगाल के दार्जीलिंग में ममता बनर्जी सरकार के ख़िलाफ़ गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का आंदोलन हिंसक हो गया है. गुरुवार को आगजनी और पथराव में नॉर्थ बंगाल के डीआईजी समेत 50 पुलिसकर्मी घायल हुए. हिंसा के बाद हालात काबू करने के लिए सेना बुलानी पड़ी है. जनमुक्ति मोर्चा ममता सरकार के उस फैसले का विरोध कर रहा है, जिसमें सरकारी स्कूलों में पहली से 10वीं तक बंगाली भाषा को पढ़ाना अनिवार्य कर दिया गया है.

सद्दाम को फांसी दिए जाने पर रोए थे अमरीकी सैनिक

सद्दाम हुसैन की सुरक्षा में लगाए गए बारह अमरीकी सैनिक उनकी पूरी ज़िदगी के बेहतरीन मित्र न सही, लेकिन उनके आख़िरी मित्र ज़रूर थे.

सद्दाम के आख़िरी क्षणों तक साथ रहे 551 मिलिट्री पुलिस कंपनी से चुने गये इन सैनिकों को ‘सुपर ट्वेल्व’ कह कर पुकारा जाता था.

इनमें से एक विल बार्डेनवर्पर ने एक किताब लिखी है, ‘द प्रिज़नर इन हिज़ पैलेस, हिज़ अमैरिकनगार्ड्स, एंड व्हाट हिस्ट्री लेफ़्ट अनसेड’ जिसमें उन्होंने सद्दाम की सुरक्षा करते हुए उनके अंतिम दिनों के विवरण को साझा किया है.

विल
विल बार्डेनवर्पर, जो सद्दाम हुसैन की सुरक्षा में रखे गए ‘सुपर ट्वेल्व’ अमरीकी सैनिकों की टीम का हिस्सा थे.

बार्डेनवर्पर मानते हैं कि जब उन्होंने सद्दाम को उन लोगों के हवाले किया जो उन्हें फांसी देने वाले थे, तो सद्दाम की सुरक्षा में लगे सभी सैनिकों की आँखों में आँसू थे.

‘दादा की तरह दिखते थे सद्दाम’

बार्डेनवर्पर अपने एक साथी एडम रोजरसन के हवाले से लिखते हैं कि, ‘हमने सद्दाम को एक मनोविकृत हत्यारे के रूप में कभी नहीं देखा. हमें तो वो अपने दादा की तरह दिखाई देते थे.’

सद्दाम पर अपने 148 विरोधियों की हत्या का आदेश देने के लिए मुक़दमा चलाया गया था.

सद्दाम

उन्होंने इराकी जेल में अपने अंतिम दिन अमरीकी गायिका मेरी जे ब्लाइज़ा के गानों को सुनते हुए बिताए. वो अपनी खचाड़ा एक्सरसाइज़ बाइक पर बैठना पसंद करते थे, जिसे वो ‘पोनी’ कह कर पुकारा करते थे.

उनको मीठा खाने का बहुत शौक था और वो हमेशा मफ़िन खाने के लिए आतुर रहते थे.

बार्डेनवर्पर लिखते हैं कि अपने अंतिम दिनों में सद्दाम का उन लोगों के प्रति व्यवहार बहुत विनम्र था और वो ये आभास कतई नहीं होने देते थे कि वो अपने ज़माने में बहुत क्रूर शासक हुआ करते थे.

कास्त्रो ने सिगार पीना सिखाया

सद्दाम को ‘कोहिबा’ सिगार पीने का शौक था, जिन्हें वो गीले वाइप्स के डिब्बे में रखा करते थे. वो बताया करते थे कि सालों पहले फ़िदेल कास्त्रो ने उन्हें सिगार पीना सिखाया था.

फ़िदेल कास्त्रो और सद्दाम हुसैन
फ़िदेल कास्त्रो और सद्दाम हुसैन

बार्डेनवर्पर ने वर्णन किया है कि सद्दाम को बागबानी का बहुत शौक था और वो जेल परिसर में उगी बेतरतीब झाड़ियों तक को एक सुंदर फूल की तरह मानते थे.

सद्दाम अपने खाने के बारे में बहुत संवेदनशील हुआ करते थे.

वो अपना नाश्ता टुकड़ो में किया करते थे. पहले ऑमलेट, फिर मफ़िन और इसके बाद ताज़े फल. अगर गलती से उनका ऑमलेट टूट जाए, तो वो उसे खाने से इंकार कर देते थे.

बार्डेनवर्पर याद करते हैं कि एक बार सद्दाम ने अपने बेटे उदय की क्रूरता का एक वीभत्स किस्सा सुनाया था जिसकी वजह से सद्दाम आगबबूला हो गए थे.

सद्दाम

हुआ ये था कि उदय ने एक पार्टी में गोली चला दी थी, जिसकी वजह से कई लोग मारे गए थे और कई घायल हो गए थे.

इस पर सद्दाम इतने नाराज़ हुए थे कि उन्होंने हुक्म दिया कि उदय की सारी कारों में आग लगा दी जाए.

सद्दाम ने ठहाका लगाते हुए ख़ुद बताया कि किस तरह उन्होंने उदय की मंहगी रॉल्स रॉयस, फ़रारी और पोर्श कारों के संग्रह में आग लगवा दी थी और उससे उठी लपटों को निहारते रहे थे.

दिलफेंक सद्दाम

सद्दाम की सुरक्षा में लगे एक अमरीकी सैनिक ने उनको बताया था कि उसके भाई की मौत हो गई है. यह सुनकर सद्दाम ने उसे गले लगाते हुए कहा था, ‘आज से तुम मुझे अपना भाई समझो.’

सद्दाम ने एक और सैनिक से कहा था कि अगर मुझे मेरे धन का इस्तेमाल करने की अनुमति मिल जाए, तो मैं तुम्हारे बेटे की कालेज की शिक्षा का ख़र्चा उठाने के लिए तैयार हूँ.

सद्दाम

एक रात सब ने बीस साल के सैनिक डॉसन को एक ख़राब नाप के सूट में घूमते हुए देखा. पता चला कि डॉसन को सद्दाम ने अपना वो सूट तोहफ़े में दिया है.

बार्डेनवर्पर लिखते हैं कि, ‘कई दिनों तक हम डॉसन पर हंसते रहे, क्योंकि वो उस सूट को पहन कर इस तरह चला करता था, जैसे वो किसी फ़ैशन शो की ‘कैटवॉक’ में चल रहा हो.’

सद्दाम और उनकी सरक्षा में लगे गार्डों के बीच दोस्ती पनपती चली गई, हालांकि उन्हें साफ़ आदेश थे कि सद्दाम के नज़दीक आने की बिल्कुल भी कोशिश न की जाए.

हुसैन को उनके मुक़दमे के दौरान दो जेलों में रखा गया था.

जेल

एक तो बग़दाद में अंतर्राष्ट्रीय ट्राइब्यूनल का तहख़ाना था और दूसरा उत्तरी बग़दाद में उनका एक महल था जो कि एक द्वीप पर था, जिस पर एक पुल के ज़रिए ही पहुंचा जा सकता था.

बार्डेनवर्पर लिखते हैं, ‘हमने सद्दाम को उससे ज़्यादा कुछ नहीं दिया जिसके कि वो हक़दार थे. लेकिन हमने उनकी गरिमा को कभी आहत नहीं किया.’

स्टीव हचिंसन, क्रिस टास्कर और दूसरे गार्डों ने एक स्टोर रूम को सद्दाम के दफ़्तर का रूप देने की कोशिश की थी.

‘सद्दाम का दरबार’ बनाने की कोशिश

सद्दाम को ‘सरप्राइज़’ देने की योजना बनाई गई. पुराने कबाड़ ख़ाने से एक छोटी मेज़ और चमड़े के कवर की कुर्सी निकाली गई और मेज़ के ऊपर इराक का एक छोटा सा झंडा लगाया गया.

सद्दाम
Image captionसद्दाम हुसैन को अमरीकी सैनिकों ने एक बंकर से गिरफ़्तार किया था.

बार्डेनवर्पर लिखते हैं, ‘इस सबके पीछे विचार ये था कि हम जेल में भी सद्दाम के लिए एक शासनाध्यक्ष के दफ़्तर जैसा माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहे थे. जैसे ही सद्दाम उस कमरे में पहली बार घुसे, एक सैनिक ने लपक कर मेज़ पर जम आई धूल को झाड़न से साफ़ करने की कोशिश की.’

सद्दाम ने इस ‘जेस्चर’ को नोट किया और वो कुर्सी पर बैठते हुए ज़ोर से मुस्कराए.

सद्दाम

सद्दाम रोज़ उस कुर्सी पर आकर बैठते और उनकी सुरक्षा में लगाए गए सैनिक उनके सामने रखी कुर्सियों पर बैठ जाते. माहौल ये बनाया जाता जैसे सद्दाम अपना दरबार लगा रहे हों.

बार्डेनवर्पर बताते हैं कि सैनिकों की पूरी कोशिश होती थी कि सद्दाम को खुश रखा जाए. बदले में सद्दाम भी उनके साथ हंसी मज़ाक करते और वातावरण को ख़ुशनुमा बनाए रखते.

कई सैनिकों ने बाद में बार्डेनवर्पर को बताया कि उन्हें पूरा विश्वास था कि ‘अगर उनके साथ कुछ बुरा हुआ होता, तो सद्दाम उन्हें बचाने के लिए अपनी जान की बाज़ी लगा देते.’

सद्दाम को जब भी मौका मिलता, वो अपनी रक्षा कर रहे सैनिकों से उनके परिवार वालों का हालचाल पूछते.

सद्दाम

इस किताब में सबसे चकित कर देने वाला किस्सा वो है जहाँ ये बताया गया है कि सद्दाम के मरने पर इन सैनिकों ने बाक़ायदा शोक मनाया था, जबकि वो अमरीका के कट्टर दुश्मन माने जाते थे.

उन सैनिकों में से एक एडम रौजरसन ने विल बार्डेनवर्पर को बताया कि ‘सद्दाम को फांसी दिए जाने के बाद हमें लगा कि हमने उनके साथ ग़द्दारी की है. हम अपने आप को उनका हत्यारा समझ रहे थे. हमें ऐसा लगा कि हमने एक ऐसे शख़्स को मार दिया जो हमारे बहुत नज़दीक था.’

सद्दाम को फांसी दिए जाने के बाद जब उनके शव को बाहर ले जाया गया था तो वहाँ खड़ी भीड़ ने उनके ऊपर थूका था और उसके साथ बदसलूकी की थी.

अमरीकी सैनिक हैरान थे

बार्डेनवर्पर लिखते हैं कि ये देख कर सद्दाम की अंतिम समय तक सुरक्षा करने वाले ये 12 सैनिक भौंचक्के रह गए थे.

सद्दाम

उनमें से एक शख़्स ने भीड़ से दो-दो हाथ करने की कोशिश भी की थी, लेकिन उनके साथियों ने उन्हें वापस खींच लिया था.

उन सैनिकों में से एक स्टीव हचिन्सन ने सद्दाम को फांसी दिए जाने के बाद अमरीकी सेना से इस्तीफ़ा दे दिया था.

हचिन्सन इस समय जॉर्जिया में बंदूकों और टैक्टिकल ट्रेनिंग का कारोबार करते हैं. उन्हें अभी भी इस बात का रंज है कि उन्हें उन इराकियों से न उलझने का आदेश दिया गया जो सद्दाम हुसैन के शव का अपमान कर रहे थे.

सद्दाम अपने अंतिम दिनों तक ये उम्मीद लगाए बैठे थे कि उन्हें फांसी नहीं होगी.

लेखक और पूर्व अमरीकी सैनिक विल बार्डेनवर्पर
Image captionलेखक और पूर्व अमरीकी सैनिक विल बार्डेनवर्पर

एक सैनिक एडम रोजरसन ने बार्डेनवर्पर को बताया था कि एक बार सद्दाम ने उनसे कहा था कि उनका किसी महिला से प्यार करने का दिल चाह रहा है. जब वो जेल से छूटेंगे तो एक बार फिर से शादी करेंगे.

30 दिसंबर, 2006 को सद्दाम हुसैन को तड़के तीन बजे जगाया गया.

उन्हें बताया गया कि उन्हें थोड़ी देर में फांसी दे दी जाएगी. ये सुनते ही सद्दाम के भीतर कुछ टूट गया. वो चुपचाप नहाए और अपने आप को फांसी के लिए तैयार किया.

सद्दाम

उस समय भी उनकी एक ही चिंता थी, ‘क्या सुपर ट्वेल्व को नींद आई?’

अपनी फांसी से कुछ मिनटों पहले सद्दाम ने स्टीव हचिन्सन को अपनी जेल कोठरी के बाहर बुलाया और सीखचों से अपना हाथ बाहर निकाल कर अपनी ‘रेमंड वील’ कलाई घड़ी उन्हें सौंप दी.

जब हचिन्सन ने विरोध करना चाहा तो सद्दाम ने ज़बरदस्ती वो घड़ी उनके हाथ में पहना दी. हचिन्सन के जॉर्जिया के घर में एक सेफ़ के अंदर वो घड़ी अब भी टिक-टिक कर रही है.

इन पांच ‘राष्ट्रीय भ्रमों’ के शिकार कहीं आप तो नहीं

राजस्थान हाई कोर्ट के जज ने हाल ही में गाय को राष्ट्रीय पशु का दर्जा देने की सिफारिश की थी. जस्टिस शर्मा की सिफारिश को लेकर काफ़ी विवाद हुआ. ऐसे विवादों में अक्सर सच कहीं और छिप जाता और लोगों की धारणा हावी हो जाती है.

जिस तरह से राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रीय चिह्न, राष्ट्र गान और राष्ट्र गीत हैं क्या उसी तरह से वाकई राष्ट्रीय पशु या राष्ट्रीय पक्षी हैं? देश के जाने माने संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का कहना है कि राष्ट्रीय ध्वज और चिह्न को संविधान सभा ने स्वीकार किया था लेकिन पशु और पक्षी के साथ ऐसा नहीं है.

कश्यप का कहना है कि ऐसे मामलों में नोटिफिकेशन जारी किया जाता है.

गाय राष्ट्रीय पशु घोषित होः राजस्थान हाईकोर्ट

कार्टून

नोटिफ़िकेशन

पर्यावरण और वन मंत्रालय ने इस मामले में 2011 में नोटिफिकेशन जारी किया था. इस नोटिफिकेशन में बाघ को राष्ट्रीय पशु और मोर को राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा देने की बात कही गई लेकिन ये दर्जा संवैधानिक हैसियत नहीं रखता.

इस नोटिफिकेशन को पर्यावरण और वन मंत्रालय के वाइल्ड लाइफ विभाग ने जारी किया था. वाइल्ड लाइफ विभाग ने कहा कि किसी पशु को राष्ट्रीय पशु का दर्जा मिलने का मतलब उसके संरक्षण से है न कि राष्ट्रीय अस्मिता और गर्व से.

कौन बने राष्ट्रीय पशु? गधा!

क्या राष्ट्रीय है और क्या क्षेत्रीय इसे लेकर लोगों की बीच काफ़ी भ्रम की स्थिति रहती है. हम यहां ऐसे ही कुछ ‘राष्ट्रीय झूठ’ के बारे में आपको बता रहे हैं.

हिन्दी राष्ट्र भाषा नहीं है

हिंदी

सुभाष कश्यप का कहना है कि देश की कोई एक राष्ट्रभाषा नहीं है बल्कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी 22 भाषाएं राष्ट्रभाषा हैं.

कमल राष्ट्रीय फूल नहीं

कमल का फूल

कमल के राष्ट्रीय फूल होने के संबंध में भी सरकार के पास कोई रिकॉर्ड नहीं है. कमल बीजेपी का चुनाव चिह्न है, न कि राष्ट्रीय फूल.

महात्मा गांधी राष्ट्रपिता हैं?

आधिकारिक रूप से महात्मा गांधी राष्ट्रपिता नहीं हैं. महात्मा गांधी के लिए पहली बार राष्ट्रपिता शब्द का इस्तेमाल सुभाषचंद्र बोस ने किया था. इसके बाद से ही उन्हें सम्मान देने के लिए राष्ट्रपिता कहा जाने लगा.

महात्मा गांधी

कोई राष्ट्रीय मिठाई या फल नहीं

लोगों के बीच आम धारणा है कि आम राष्ट्रीय फल है लेकिन यह ग़लत है. देश में पैदा होने वाले किसी भी फल को राष्ट्रीय और क्षेत्रीय श्रेणी में नहीं रखा गया है.

उसी तरह किसी मिठाई को भी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय श्रेणी में नहीं रखा गया है.

हॉकी राष्ट्रीय खेल नहीं है

हॉकी

भारत में हॉकी को लेकर भी एक राष्ट्रीय भ्रम है कि यह राष्ट्रीय खेल है. जब भी हॉकी की स्थिति पर यहां बात होती है तो तो सबसे पहले यह कहा जाता है कि हमारे देश के राष्ट्रीय खेल की ऐसी दुर्दशा हो गई है. 2012 में केंद्र सरकार से युवा मामलों के मंत्रालय ने साफ़ कर दिया था कि हॉकी राष्ट्रीय खेल नहीं है.

India is getting hotter than previously thought, study shows

However, the temperature rise in India is sober considering that the world is on track for far more warming.

India is now two and a half times more likely to experience a deadly heat wave than a half century ago, and all it took was an increase in the average temperature of just 0.5 degrees Celsius, a new study shows.

The findings are sobering considering that the world is on track for far more warming. For the last two weeks much of Asia has been gripped by a heat wave, with a record high of 53.5 degrees C set in the southwest Pakistani city of Turbat on May 28 the world’s hottest-ever temperature recorded for the month of May. Temperatures in New Delhi have soared beyond 44 degrees C.

Even if countries are able to meet the Paris Agreement goals in curbing climate-warming carbon emissions, that would still only limit the global temperature rise to an estimated 2 degrees C. U.S. President Donald Trump’s recent pledge to exit the Paris treaty won’t help.

“It’s getting hotter, and of course more heat waves are going to kill more people,” said climatologist Omid Mazdiyasni of the University of California, Irvine, who led an international team of scientists in analysing a half century of data from the Indian Meteorological Department on temperature, heat waves and heat-related mortality.

“We knew there was going to be an impact, but we didn’t expect it to be this big,” he said.

Their study, published on Wednesday in the journal Science Advances, shows that, while India’s average temperatures rose by more than 0.5 degrees C between 1960 and 2009, the probability of India experiencing a massive heat-related mortality event defined by more than 100 deaths shot up by 146 per cent.

The study also found that the number of heat wave days increased by 25 per cent across most of India. Areas in the south and west experienced 50 per cent more heat wave events, or periods of extreme heat lasting more than three or four days, in 1985-2009 compared with the previous 25-year period.

It’s harder to estimate how deadly future warming might be. There is no historical data for heat wave mortality at those peak temperatures, and death tolls could increase sharply as it gets even hotter.

“The general public may think that a 1 or 2 degree temperature rise is not that significant, but our results show that even small changes can result in more heat waves and more death,” said Amir AghaKouchak, another climatologist at UC Irvine and a co-author of the report.

Scientists have warned for years that climate change will make heat waves more intense, more frequent and longer lasting.

“It stands to reason there would be more dire health impacts with more severe heat waves, and this paper provides a key quantification of those impacts for one region of the world,” said climate scientist Gerald Meehl of the National Centre for Atmospheric Research in Boulder, Colorado, who was not involved in the study.

The same methodology can be applied in any region to get a sense of how vulnerable a country or population might be, the authors said.

They accounted for India’s fast-rising population and income levels in the analysis, to make sure neither affected the results. In the case of income, they found an even stronger correlation between heat waves and deaths among those who are poor.

That’s bad news as India is already seeing new deadly highs. Last year in May, Jaisalmer recorded a record 52.4 degrees C.

The vast majority of India’s 1.25 billion people are poor and have few options as temperatures hit sweltering levels, drying forests and riverbeds and wiping out farm animals. Most in India rely on agriculture for their livelihoods, and climate change is likely to hurt their crops.

Many who work as farmers or in construction will have to shorten their work days by 2-3 hours within four decades, simply because it will be too hot outdoors, according to a report last year by the U.N. Environment Program.

Most cities and states are not prepared to handle more heat, even if they understand the devastation it can wreak. In 2010, some 1,200 people died in a heat wave in Ahmedabad, prompting city officials to introduce seven-day weather forecasts, extra water supplies and cool-air summer shelters.

After more than 2,500 were killed in heat-ravaged areas across India in 2015, nine other cities rolled out a plan to educate children about heat risk, stock hospitals with ice packs and extra water, and train medical workers to identify heat stress, dehydration and heat stroke.

But the nine cities cover only about 11 million people, not even 1 per cent of the country’s population.

“Heat wave stress is a relatively new aspect that hasn’t been recognized” as a climate change threat in the region, said scientist Saleemul Huq, director of the International Centre for Climate Change and Development in Dhaka. In Bangladesh, “we are seeing more heat waves, there’s no doubt about it. And there is strong anecdotal evidence that we are seeing a similar trend in mortality. I would recommend a similar study here.”

क्या हैदराबाद के बाजारों में बिक रहे हैं ‘प्लास्टिक के चावल’? सरकार ने नमूनों को जांच के लिए भेजा

हैदराबाद: सोशल मीडिया पर कई वीडियो इन दिनों वायरल हो रहे हैं जिसमें बताया जा रहा है कि किस तरह लोग घर में पके चावलों की बॉल बनाकर खेल सकते हैं. सुनने और देखने में थोड़ा अजीब लगे, लेकिन यह दिखाया जा रहा है. पिछले सात दिनों में हैदराबाद के अलग-अलग इलाकों से ‘प्लास्टिक के चावल’ की शिकायतें आ रही हैं. जिनमें चार मीनार, यूसुफगुडा, सरूरनगर, मीरपेट के आउटलेट शामिल हैं.

इन शिकायतों के सामने आने के बाद तेलंगाना नागरिक आपूर्ति विभाग को ऐसे नमूनों को जांच के लिए खाद्य प्रयोगशाला भेजना पड़ा. विभाग के अधिकारियों ने बताया कि खबरें गलत हैं और वे ‘प्लास्टिक वाले चावल’ नहीं हैं, लेकिन उन्होंने विस्तृत जांच के लिए नमूनों को प्रयोगशाला भेजा है और जल्द इसकी रिपोर्ट आ जाएगी. शहर के विभिन्न इलाकों में स्थानीय लोगों और एक हॉस्टल में रहने वाले लोगों ने दावा किया था कि उन्होंने जो चावल खरीदे और खाए वे काफी चिपचिपे थे और सामान्य चावल से उनका स्वाद अलग था. उन्होंने आरोप लगाया कि ये ‘प्लास्टिक वाले चावल’ थे.

एक अधिकारी ने बताया कि बाद में राज्य के नागरिक आपूर्ति आयुक्त सी वी आनंद ने अधिकारियों को यौसुफ्गुदा, सरूरनगर, मीरपेट और अन्य स्थानों से चावल के नमूने एकत्रित करने के निर्देश दिए, जहां से शिकायतें मिल रही थीं. नमूनों को जांच के लिए राज्य की खाद्य प्रयोगशाला में भेजा गया.

उन्होंने कहा, ‘गुरुवार तक एक विस्तृत रिपोर्ट मिलने की संभावना है.’ शहर के नंदनवनम इलाके के निवासी अशोक ने मीरपेट पुलिस थाने में एक शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि उसने एक स्थानीय विक्रता से चावल खरीदे और जब उसने उन्हें पकाया तो वे ‘प्लास्टिक के चावल’ निकले. उसने कहा कि वह चिपचिपे हो गए थे और उसमें से अजीब गंध आ रही थी.

बहरहाल, पुलिस ने प्राथमिक जांच के आधार पर कहा कि शिकायतकर्ता ने जो नमूने दिए वे ‘प्लास्टिक वाले चावल’ नहीं थे. पुलिस ने कहा कि उसने इस मामले के बारे में नागरिक आपूर्ति विभाग को सूचना दी और उसे इसके नमूने भेज दिए. एक निजी हॉस्टल में रहने वाले लोगों ने भी ऐसा ही आरोप लगाया कि उन्हें ‘प्लास्टिक वाले चावल’ परोसे गए, जिसका स्वाद सामान्य चावल से अलग था.

Is ‘plastic rice’ for real?

Telangana Civil Supplies Department flooded with complaints about hotels using ‘plastic rice’ in their food items

The Telangana Civil Supplies Department is being flooded with complaintsabout hotels in the twin cities of Hyderabad and Secunderabad using ‘plastic rice’ in their food items. Samples have been collected from various hotels to verify the claims. And this is not limited to Telangana alone. Over the past few years, rumours of ‘plastic rice’ being sold have been doing the rounds and a public interest litigation was even filed before the Delhi High Court .

The origin

The term ‘plastic rice’ first surfaced in China in 2010. Dubbed the Wuchang rice scandal, Chinese officials unearthed a scam by companies who passed off ordinary rice as premium Wuchang rice by adding flavours to it. The Wuchang rice, known for its unique aroma, is exported to various nations. Chinese traders are believed to have made a huge profit through this scam.

In 2011, a report by The Korea Times said: “Some distributors are selling fake rice in Taiyuan, Shaanxi Province, and this rice is a mixture of potatoes, sweet potatoes and plastic.” Needless to say, the report mentioned in detail the hazards of eating synthetic resin. Thus the term ‘plastic rice’ came into existence.

The BBC, last December, reported that a huge shipment of ‘plastic rice’ was seized in Nigeria, making it the first major confiscation. Days later, Nigeria ruled out plastic in the confiscated shipment. “The rice was contaminated with bacteria,” Nigeria’s National Agency For Food and Drugs said.

Apart from these two reports, the mainstream media doesn’t have much information on ‘plastic rice’. But the web is flooded with information ranging from YouTube videos on how it is manufactured to “Ways to spot a fake rice.” And the social media too is cluttered with forwards on the “Chinese conspiracy” behind dumping ‘plastic rice’.

Fact check

So is ‘plastic rice’ real? Unfortunately, there is no credible answer to this question. As far as India is concerned, ‘plastic rice’ has never been seized so far, though time and again there have been reports of demonstrations against such rice. Fact verification website snopes.com said the claim stands “unproven”.

In a report, it said, “The plastic rice story [and its fellow counterfeit Chinese food export legends] resemble an internationally viral 2007 CCTV segment about pork buns purportedly made with scrap cardboard, for which an independent journalist was eventually detained and accused of faking the oft-referenced story.”

मोदी के कृषि मंत्री ने भी ओढ़ी किसानों की मौत पर चुप्पी

बीजेपी शासित मध्य प्रदेश के मंदसौर में गोली लगने से पांच किसानों समेत छह लोगों की मौत हो गई. लेकिन इस पर अब तक देश के कृषि मंत्री और प्रधानमंत्री का कोई बयान नहीं आया है.

किसानों का कहना है कि उन पर पुलिस ने गोलियां चलाईं, लेकिन अधिकारी ‘असामाजिक तत्वों’ को ज़िम्मेदार बता रहे हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस पर किसानों को भड़काने का आरोप लगाया है.

इस बीच कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह बुधवार को दिल्ली में अपने कार्यक्रमों और गतिविधियों की तस्वीरें ट्विटर पर लगाते रहे, लेकिन मंदसौर घटना पर उन्होंने एक भी ट्वीट नहीं किया.

‘सरकारी कर्मी को कंडोम भत्ता, किसान को लागत भी नहीं’

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के किसान क्यों हैं नाराज़

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी इस बीच ऐसे मौक़ों पर चुप्पी ओढ़ने के आरोप बढ़े हैं. लेकिन एकाधिक मौक़ों पर उनके मंत्रियों का बयान आ ही जाता है. इस बार कृषि मंत्री भी चुप हैं.

मंदसौर घटना के अगले दिन 7 जून को अख़बारों में सरकार ने कृषि क्षेत्र में अपनी उपलब्धियों वाले विज्ञापन छपवाए. न्यूयॉर्क टाइम्स के पत्रकार ऐलेन बैरी ने इसकी तस्वीर ट्विटर पर साझा की.

ने इसकी तस्वीर ट्विटर पर साझा की.

एलेन बैरी

बुधवार को कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने ‘स्वच्छता पखवाड़ा’ कार्यक्रम के ‘सफल समापन’ पर कैबिनेट ब्रीफ़िंग और प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले थे, लेकिन इसे ‘अपरिहार्य कारणों’ से स्थगित कर दिया गया.

लेकिन इसी दिन उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा से उनके दफ़्तर में मुलाक़ात की. बातचीत का विषय था- हिमाचल प्रदेश में कृषि संस्थान और शिक्षा.

राधामोहन सिंह

इसके बाद उन्होंने केरल के कृषि मंत्री से वहां की एक समस्या पर चर्चा की. उनसे इस मसले पर प्रस्ताव मांगा और मदद का आश्वासन दिया. इस बैठक की तस्वीरें भी उनके ट्विटर हैंडल से लगाई गईं.

राधामोहन सिंह

इसके बाद उन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, पूसा (ICAR) में जनजातीय क्षेत्रों में किसानों के सशक्तिकरण के मुद्दे पर एक राष्ट्रीय वर्कशॉप को संबोधित किया.

राधामोहन सिंह

कृषि मंत्री दिन भर ट्विटर पर सक्रिय और व्यस्त रहे, लेकिन मंदसौर की घटना, जिसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने भी इतनी प्रमुखता से कवर किया, उस पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा.

बिहार के पूर्वी चंपारण से सांसद राधामोहन सिंह पहले विवादों में भी रह चुके हैं. इससे पहले 2015 में राज्यसभा में दिए एक लिखित जवाब में कह चुके हैं कि किसान की ख़ुदकुशी में क़र्ज़ के साथ-साथ, दहेज़, प्रेम संबंध और नामर्दी भी एक वजह है.

राधामोहन सिंह
Image captionशपथ ग्रहण करते राधामोहन सिंह

उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भी बयान का इंतज़ार है. मंदसौर घटना के बाद से वह ट्विटर पर नेपाल के नए प्रधानमंत्री को बधाई, उत्तान मंडूक आसन के फायदे बताने वाला वीडियो और एससीओ सम्मेलन में शामिल होने की सूचना ट्विटर पर पोस्ट कर चुके हैं. लेकिन किसानों की मौत पर अभी तक ‘दुख जताने’ वाली प्रतिक्रिया भी नहीं आई है.

इस बीच विपक्षी सोशल मीडिया कार्यकर्ता प्रधानमंत्री का एक पुराना ट्वीट खूब शेयर कर रहे हैं. जब आम आदमी पार्टी की रैली में गजेंद्र नाम के किसान ने ‘कथित’ ख़ुदकुशी कर ली थी और चंद घंटों में प्रधानमंत्री ने इस पर ट्वीट कर दिया था.

ट्वीट

जानकारों के मुताबिक, इस बार बंपर फ़सल होने से आपूर्ति ज़्यादा है, इसलिए किसानों को उचित दाम नहीं मिल रहे हैं.

इससे पहले महाराष्ट्र में कई ज़िलों के किसान क़र्ज़ माफ़ी और फ़सलों के उचित दाम की मांग करते हुए हड़ताल पर चले गए थे और उन्होंने सब्ज़ियों और दूध की आपूर्ति रोकना शुरू कर दिया था. हालांकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के आश्वासन के बाद हड़ताल वापस ले ली गई.

जंतर-मंतर पर तमिलनाडु के किसानों के बहुचर्चित प्रदर्शन को भी अभी ज़्यादा दिन नहीं बीते हैं.

तमिलनाडु किसान
Image captionतमिलनाडु के किसानों ने इस तरह दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था

क़र्ज़ माफ़ी है इलाज?

फ़सलों के ख़राब होने पर किसान क़र्ज़ लेते हैं, लेकिन उसे चुकाने के लिए फ़सलों से उन्हें वैसी आमदनी नहीं होती. इस तरह ये क़र्ज़ बढ़ता जाता है.

ज़्यादातर मामलों में किसानों की तरफ से क़र्ज़ माफ़ी की मांग को पुरजोर तरीके से रखा जा रहा है, लेकिन किसानों की समस्याओं के स्थायी इलाज के लिहाज से यह तरीका सवालों के घेरे में है.

उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार ने दो करोड़ से ज़्यादा लघु और सीमांत किसानों के एक लाख रुपये तक का क़र्ज़ माफ़ करने का ऐलान किया. लेकिन आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने इस फ़ैसले की आलोचना की और कहा कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक नुकसान होगा.

उन्होंने कहा था, ‘मुझे लगता है कि ऐसी क़र्ज़ माफियों से परहेज़ करने पर हमें सहमति बनाने की ज़रूरत है. वरना ऐसी चुनौतियों का असर देश की बैलेंस शीट पर दिखाई देगा.’

‘मैं हिंदू हूँ और 30 साल से बीफ़ का कारोबार कर रहा हूँ’

भारत में ‘बीफ़’ के व्यापार और उसके निर्यात से जुड़े लोगों का कहना है कि जिस ‘बीफ़’ का व्यापार भारत में होता है वो गोमांस नहीं है, बल्कि भैंस का मांस है.

गाय राष्ट्रीय पशु घोषित होः राजस्थान हाईकोर्ट

क्या भारत ‘फूड फासीवाद’ की तरफ बढ़ रहा है

बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक लाइव के दौरान चर्चा करते हुए ऑल इण्डिया मीट एंड लाइवस्टॉक एक्सपोर्ट्स एसोसिएशन के महासचिव एसपी सभरवाल ने दावा किया कि भारत में ‘बीफ़’ यानी भैंस के कारोबार से जुड़े 70 प्रतिशत लोग मुसलमान नहीं हैं.

गाय

सभरवाल ने कहा, ”मैं हिंदू हूं और पिछले 30 साल ले बीफ के कारोबार में हूं.”

उनका कहना है कि ना तो भारत में मौजूद बूचड़खानों में गोहत्या होती है और ना ही गोमांस का निर्यात ही किया जाता है. वो कहते हैं, “बीफ का निर्यात भारत में चार अरब अमरीकी डॉलर का उद्योग है.”

वो कहते हैं इस उद्योग पर सरकार द्वारा पशुओं से क्रूरता को रोकने के लिए बने क़ानून में हाल ही में किये गए संशोधन से बुरा असर पड़ा है.

इसके अलावा इससे ही जुड़े चमड़े के उद्योग ने भी 13 अरब अमरीकी डॉलर का व्यवसाय किया है.

मसला बीफ़ का नहीं

गाय

वहीं, बीबीसी हिंदी के फेसबुक लाइव के दौरान हो रही चर्चा में मौजूद इतिहासकार प्रोफेसर पुष्पेश पंत का कहना था कि मसला ‘बीफ़’ का है ही नहीं.

उनका कहना था कि ‘बीफ़’ के नाम पर जो कुछ हो रहा है वो पिछले 10-15 साल के आपसी सद्भाव को ख़त्म करने के प्रयास हो रहे हैं – यह उसका परिणाम है.

रहा सवाल क़ानून का तो प्रोफेसर पंत कहते हैं कि अगर ऐसा कोई क़ानून है जो कहता है कि जानवर इस तरह कटेगा और बिकेगा, तो उसका पालन भी सख़्ती के साथ होना चाहिए.

उत्तर प्रदेश का उदहारण देते हुए प्रोफेसर पंत कहते हैं कि राज्य में नयी सरकार के आने से पहले अवैध बूचड़खाने चल रहे थे जिनपर रोक लगनी चाहिए थी. मगर पिछली सरकार ने उन्हें नियंत्रित करने के लिए कोई पहल नहीं की, जिससे घूसखोरी को बढ़ावा मिला.

नहीं बेच पाएंगे अब भैंसें

beef

फेसबुक लाइव में मौजूद ‘बीफ़’ की निर्यातक कंपनी के निदेशक फ़ौज़ान अल्वी कहते हैं कि देश में दूध का उत्पादन भी इसीलिए बढ़ रहा था क्योंकि मांस का निर्यात बढ़ रहा था.

वो कहते हैं कि किसान के लिए एक दूध देने वाली भैंस की उपयोगिता सिर्फ छह से सात साल तक की होती है.

वो कहते हैं कि जब भैंस दूध देना बंद कर देती है तो किसान उसे पशु बाज़ार में बेच देते हैं और दूसरी दूध देने वाली भैंस ले आते हैं. मगर अब क़ानून में संशोधन के बाद वो ऐसा नहीं कर सकेंगे.

भारतीय मूल के वराडकर होंगे आयरलैंड के पहले समलैंगिक प्रधानमंत्री

आयरलैंड में लियो वराडकर को सत्ताधारी गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी फ़ाइन गेल का नेता चुना गया है.

वराडकर ने 60 प्रतिशत वोट लेकर अपने प्रतिद्वंद्वी और हाउसिंग मिनिस्टर साइमन कोवेनी को हराया.

वो आयरलैंड के पहले समलैंगिक प्रधानमंत्री होंगे.

वो अगले कुछ सप्ताह में फ़ाइन गेल के पूर्व नेता एंडा केनी से ये ज़िम्मेदारी ले लेंगे.

38 वर्षीय वराडकर आयरलैंड के अब तक के सबसे युवा प्रधानमंत्री भी होंगे.

लियो वराडकरलियो वराडकर ने 2015 में अपने समलैंगिक होने की बात सार्वजनिक की थी.

वराडकर ने 2015 में अपने समलैंगिक होने की बात सार्वजनिक की थी.

वो आयरलैंड के स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख हैं.

आयरलैंड में 1993 तक समलैंगिकता को अपराध माना जाता था.

वराडकर यूरोप के सबसे रूढ़िवादी देश माने जाने वाले आयरलैंड में उदारवाद का चेहरा बनकर उभरे हैं.

हालांकि उन्हें श्रमिक अधिकारों और प्रगतिशील मुद्दों पर अपने विचारों को लेकर आलोचना का सामना भी करना पड़ा है.

‘पाकीजा’ की एक्‍ट्रेस करती रही अस्‍पताल में बेटे का इंतजार, अब वृद्धाश्रम में मिला सहारा

एक महीने से अस्पताल में भर्ती गीता के लंबे बिल का भुगतान निर्माता अशोक पंड़ित और रमेश तौरानी ने किया और उन्होंने ही गीता को अंधेरी स्थित जीवन आशा वृद्धाश्रम भेजने का इंतजाम भी किया.

नई दिल्‍ली: बीते जमाने की मशहूर एक्‍ट्रेस गीता कपूर को एक महीने बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई और उन्हें अब वृद्धाश्रम भेज दिया गया. गीता कपूर का बेटा उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने के बाद दोबारा उनकी सुध लेने वापस नहीं आया. एक महीने से अस्पताल में भर्ती गीता के लंबे बिल का भुगतान निर्माता अशोक पंड़ित और रमेश तौरानी ने किया और उन्होंने ही गीता को अंधेरी स्थित जीवन आशा वृद्धाश्रम भेजने का इंतजाम भी किया. अशोक पंडित ने ट्वीट किया, ‘गीता कपूर जी को अंधेरी के जीवनआशा वृद्धाश्रम में शिफ्ट कराने के बाद राहत महसूस कर रहा हूं. वह मुस्कुरा रहीं हैं और जल्दी ही ठीक हो जाएंगी.’ ‘पाकीजा’ और ‘रजिया सुल्तान’ में अभिनय करने वाली गीता को अनियमित रक्तचाप की शिकायत के चलते उनके बेटे ने गोरेगांव के एसआरवी अस्पलात में 21 अप्रैल को भर्ती कराया था. मां को भर्ती कराने के बाद एटीएम से पैसा निकालने की बात कह कर गया बेटा इसके बाद कभी नहीं लौटा.

पंड़ित ने अपने ट्वीट में कहा, ‘डा त्रिपाठी, जीवनआशा वृद्धाश्रम और रमेश तौरानी जी गीता कपूर जी को आपने जो सहयोग दिया उसके लिए शुक्रिया. हम मिल कर उनका गौरव वापस लाएंगे.’

नई दिल्‍ली: बीते जमाने की मशहूर एक्‍ट्रेस गीता कपूर को एक महीने बाद अस्पताल से छुट्टी दे दी गई और उन्हें अब वृद्धाश्रम भेज दिया गया. गीता कपूर का बेटा उन्हें अस्पताल में भर्ती कराने के बाद दोबारा उनकी सुध लेने वापस नहीं आया. एक महीने से अस्पताल में भर्ती गीता के लंबे बिल का भुगतान निर्माता अशोक पंड़ित और रमेश तौरानी ने किया और उन्होंने ही गीता को अंधेरी स्थित जीवन आशा वृद्धाश्रम भेजने का इंतजाम भी किया. अशोक पंडित ने ट्वीट किया, ‘गीता कपूर जी को अंधेरी के जीवनआशा वृद्धाश्रम में शिफ्ट कराने के बाद राहत महसूस कर रहा हूं. वह मुस्कुरा रहीं हैं और जल्दी ही ठीक हो जाएंगी.’ ‘पाकीजा’ और ‘रजिया सुल्तान’ में अभिनय करने वाली गीता को अनियमित रक्तचाप की शिकायत के चलते उनके बेटे ने गोरेगांव के एसआरवी अस्पलात में 21 अप्रैल को भर्ती कराया था. मां को भर्ती कराने के बाद एटीएम से पैसा निकालने की बात कह कर गया बेटा इसके बाद कभी नहीं लौटा.

पंड़ित ने अपने ट्वीट में कहा, ‘डा त्रिपाठी, जीवनआशा वृद्धाश्रम और रमेश तौरानी जी गीता कपूर जी को आपने जो सहयोग दिया उसके लिए शुक्रिया. हम मिल कर उनका गौरव वापस लाएंगे.’

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न्‍यूज एजेंसी पीटीआई को कुछ समय पहले दिए अपने इंटरव्‍यू में फिल्‍ममेकर अशोक पंडित ने कहा, ‘अस्‍पताल का बिल देना कोई बड़ी बात नहीं है, मेरा असली उद्देश्‍य है कि उनका सम्‍मान उन्‍हें वापिस मिलना चाहिए. उनका बेटा अभी भी भागा हुआ है और पुलिस उसकी तलाश कर रही है.’ उन्‍होंने कहा, ‘ उनका परिवार अचानक गायब हो गया है, बेटे ने अपना फोन स्‍विच ऑफ कर लिया है. सबसे ज्‍यादा दुख की बात है कि वह अब भी उसका ही नाम ले रही हैं और उन्‍हें लगता है कि वह नीचे ही है.’ उन्‍हें इस हालत में देखना मेरी लिए काफी दुखद है.’

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पिछले हफ्ते गीता कपूर ने मिड-डे को दिए अपने एक इंटरव्‍यू में बताया कि उनका बेटा उन्‍हें प्रताड़ित करता है और भूखा रखता है. उन्‍होंने कहा, ‘ वह मुझे मारता है. वह मुझे चार दिन में एक बार खाना देता था और कई बार कई दिनों के लिए कमरे में बंद कर देता था. मैं वृद्धाश्रम में जाने को तैयार नहीं थी इसलिए उसने यह सब योजना बनाई. उसने मुझे जानबूझकर भूखा रखा ताकी मैं बीमार पड़ जाउं और वह मुझे अस्‍पताल में भर्ती कर सके.’

गीता का इलाज करने वाले डॉक्‍टरों का कहना है कि गीता को विश्वास था कि उनका बेटा उनके लिए वापस लौट कर आएगा. एसआरवी अस्पताल के डा दिपेन्द्र त्रिपाठी ने कहा, ‘जब वह गया वह वहीं थीं, तो उनको वही सब याद है और कहती हैं, कि वह पैसे ले कर वापस आएगा. यह बहुत दुखद घटना है. सबसे आश्चर्य वाली बात तो यह है कि मीड़िया में रिपोर्ट आने के बाद भी उनका कोई रिश्तेदार नहीं आया.’

सिंदूर लेकर दूल्हा मांग भरने ही जा रहा था, तभी वाट्सअप पर आया एक मैसेज…

नई दिल्ली: दुल्हन मंडप के नीचे बैठी थी. दूल्हा हाथों में सिंदूर लेकर मांग भरने ही जा रहा था….तभी वाट्सअप एक मैसेज आया कि तुम जिससे शादी करने जा रहे हो उससे तो मेरी शादी हो चुकी है. इसके बाद तो हंगामा शुरू हो गया और बात यहां तक पहुंच गई कि बारात बिन दुल्हन वापस हो गई.  मामला उत्तर प्रदेश के जिले मऊ के सोहिया गांव की है. मीडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक दूल्हा और दुल्हन लेखपाल तो है हीं, लेकिन जिसने मैसेज किया था वह भी लेखपाल है.

इस मैसेज के आने के बाद पूरी बारात में हंगामा मच गया और मारपीट की नौबत आ गई. काफी समझाने-बुझाने के बाद भी दूल्हा शादी करने के लिए राजी नहीं हो रहा था. इसके बाद फैसला लिया गया कि दुल्हन से ही पूरे मामले की सच्चाई पता की जाए. इसके बाद दुल्हन के पिता ने घर के अंदर अपनी बेटी से पूछा कि आखिर सच्चाई क्या है तो उसने सकुचाते हुए जवाब दिया कि हां, 26 मई यानी जिस दिन तिलक था उसी दिन उसने उस दूसरे लेखपाल के साथ कोर्ट में शादी कर ली थी. इसके बाद तो वधु पक्ष के लोग सन्न रह गए. सबका यही कहना था कि अगर ऐसी बात थी तो बताया क्यों नहीं. बारातियों और दूल्हे को भी नहीं समझ आ रहा था कि क्या करें. आखिकार सबने फैसला किया और बारात वापस लौट गई.

इस घटना के बाद सब लोगों का यही कहना था कि सोशल मीडिया भले ही काम की चीज हो लेकिन कई बार यह जी का जंजाल बन जाता है. वहीं शादियों में कई बार ऐसे अजीब हालात सामने आ जाते हैं जिससे रिश्ते टूटने की नौबत हो जाती है. कुछ दिन पहले ही एक शादी में रसगुल्लों की वजह से बारात वापस हो गई थी.

अमित शाह के मिशन 2019 का दांव और पशु कारोबार पर रोक का पेंच

अमित शाह मिशन 2019 के मद्देनजर तकरीबन 100 दिनों के राष्‍ट्रव्‍यापी दौरे पर निकल गए हैं. इस कड़ी में त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल के बाद शुक्रवार से वह तीन दिनों के केरल दौरे पर जा रहे हैं. दरअसल 2019 के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी उन राज्‍यों पर अधिक फोकस करना चाहती है जहां पिछली बार उसका प्रदर्शन कमजोर रहा था. इस कड़ी में केरल, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना जैसे राज्‍य हैं. अमित शाह इन राज्‍यों में बीजेपी को मजबूत करने की कोशिशें कर रहे हैं.

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि पिछली बार बीजेपी ने 280 से भी अधिक सीटें अधिकतर हिंदी भाषी राज्‍यों से जीती थीं. जानकारों के मुताबिक इस बार बीजेपी की रणनीति यह है कि यदि पार्टी को हिंदी भाषी राज्‍यों में सत्‍ता विरोधी लहर का कुछ खामियाजा भुगतना पड़ा तो वह उसकी भरपाई गैर हिंदी राज्‍यों में अपनी पहुंच बढ़ाकर करना चाहती है. इसीलिए अपने तीन माह के दौरे पर अमित शाह का पूरा ध्‍यान गैर हिंदी ऐसे राज्‍यों में पार्टी और संगठन को मजबूत करने का होगा जहां बीजेपी अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में है. केरल के बाद अमित शाह तेलंगाना और लक्षद्वीप के दौरे पर जाएंगे और उसके बाद अगस्‍त में आंध्र प्रदेश जाएंगे.

दरअसल शाह चाहते हैं कि उत्तर-पूर्व राज्यों, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, आंध प्रदेश जैसे राज्यों में बीजेपी ज्यादा सीटें जीते, लेकिन मवेशियों के कारोबार पर केंद्र सरकार की हालिया अधिसूचना का इन सभी राज्यों में जबर्दस्त विरोध किया जा रहा है. पश्चिम बंगाल, केरल और त्रिपुरा राज्य सरकारों ने इसे लागू न करने की बात कही है. इसी पृष्‍ठभूमि में अमित शाह केरल जा रहे हैं. वहां इस अधिसूचना का सबसे ज्‍यादा विरोध हो रहा है. मेघालय में बीजेपी नेताओं ने ही इसका विरोध किया है और राज्य के एक वरिष्ठ नेता ने इस अधिसूचना के विरोध में इस्तीफा भी दे दिया है. बीजेपी की सहयोगी एनपीपी ने इसका विरोध करते हुए पीएम मोदी से दखल की मांग की. जबकि तमिलनाडु में विपक्षी दल डीएमके ने इसके खिलाफ आवाज उठाई है.

गौरतलब है कि इनमें कई ऐसे राज्य हैं जहां गोहत्या पर पाबंदी नहीं है और गोमांस लोगों के आहार का हिस्सा है. हालांकि बीजेपी नेताओं का मानना है कि जिस तरह से युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने केरल में चौराहे पर बछड़े की हत्या की उससे हिंदी भाषी राज्यों में कांग्रेस को नुकसान हो सकता है. बीजेपी इसे बड़ा मुद्दा बनाने की तैयारी में है. इस साल गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं. यही वजह है कि गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने इस घटना पर तुरंत ही प्रतिक्रिया दे दी. लेकिन यह भी सही है कि गैर हिंदी राज्‍यों ऐसे राज्‍यों में जहां बीजेपी अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहती है वहां मवेशियों के कारोबार से संबंधित अधिसूचना के बाद अमित शाह को अब ज्‍यादा मेहनत करनी पड़ेगी.

Afghanistan cancels T20 matches with Pakistan after Kabul attack

Pakistan were set to play their first Twenty20 match in Kabul later this year

Afghanistan have cancelled proposed home and away cricket fixtures with Pakistan after a deadly bomb attack blamed by the country’s intelligence agency on militants allegedly backed by Islamabad.

Pakistan were set to play their first Twenty20 match in Kabul later this year in what was seen as an opportunity for the neighbours to ease tensions over border skirmishes and alleged proxy warfare.

The Kabul match, set for July or August, would have been followed by a fixture in Pakistan and a full series at an unspecified date.

But the Afghanistan Cricket Board issued a strongly worded statement late on Wednesday, cancelling the matches in light of a truck bombing in the city’s diplomatic quarter that killed at least 90 people.

No group has claimed responsibility for Wednesday’s attack, although the Taliban has denied involvement.

“The ACB hereby cancel all kinds of cricket matches and initial mutual relationship agreement with the Pakistan Cricket Board,” the Afghan board said on its Facebook page.

“No agreement of friendly matches and mutual relationship agreement is possible with a country where terrorists are housed and provided safe havens.”

Afghanistan’s intelligence agency has blamed the Taliban-allied Haqqani Network for the attack, which has been linked to Pakistan’s military in the past.

The development leaves Pakistan’s cricketers even more isolated in the region.

India has refused to play a full series since the 2008 Mumbai attacks, while ties with fellow Test team Bangladesh have also soured after Pakistan pulled out of a planned series in July.

Pakistani officials said they were unhappy that Bangladesh were not willing to send their team to Pakistan.

Only minnows Zimbabwe have been willing to tour the insecurity-wracked country since a 2009 militant attack on the visiting Sri Lanka team.

Cricketing relations between Afghanistan and Pakistan were not always so frosty.

Afghans learned to play cricket in refugee camps in Pakistan after they were forced to leave their homes in the wake of the Soviet invasion in 1979.

The sport struggled to get a foothold in Afghanistan under the hardline Taliban, but has become hugely popular since the Islamist regime was toppled in a U.S.-led invasion in 2001.

While Pakistan has supported the Afghan team by supplying equipment and arranging fixtures with the fledgling side, rival India has also been keen to lend its support.

Last year, Afghanistan’s national team shifted its base from Sharjah in the United Arab Emirates to Noida, Delhi, while India’s former batsman Lalchand Rajput replaced Pakistan’s Inzamam-ul-Haq as their national team coach.

LIGO makes third gravitational wave detection

The gravitational wave detection was “the first time, a chance event; second time, a coincidence, and third, a pattern,” says Bangalore Sathyaprakash, a senior scientist with the LIGO collaboration.

The Laser Interferometer Gravitational-Wave Observatory (LIGO) detectors in the U.S. have detected yet another merger of two black holes on January 4, 2017. Named GW170104, this signal marks the third confirmed detection of gravitational waves coming from a binary black hole merger. It is of great interest to the scientific community that the black holes, having masses nearly 31 times and 19 times the sun’s. Until the first detection of gravitational waves by LIGO in 2015 (GW150914) it was not known that such massive black holes could exist.

The gravitational wave detection was “the first time, a chance event; second time, a coincidence, and third, a pattern,” says Bangalore Sathyaprakash, a senior scientist with the LIGO collaboration in the U.S. and an editor of the paper describing these results which was published in Physical Review Letters

5 lakh for kin of man killed in Jewar ambush

Adityanath promises aid and security for women

Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath on Thursday announced financial assistance of ₹5 lakh to the kin of a man who was killed in the recent Jewar ambush, where four women were also allegedly gangraped.

Mr. Adityanath has said that the State government would provide educational aid, financial support and security to the women of the victim’s family, a government spokesperson stated after two of the women met the Chief Minister here.

“He [Mr. Adityanath] said that strict action should be taken against those who carried out this incident, so that no criminal would dare repeat it in the future,” the spokesperson said.

Last week, a scrap dealer was allegedly shot dead and four women from his family gangraped in Jewar, after half-a-dozen men brought their car to a halt near the Yamuna Expressway. The U.P. police’s special task force is probing the case.

“We want the accused to be punished…hang them. Why is the police delaying in arresting them? We want justice,” Shafiq, one of the family, told The Hindu after the meeting with Mr. Adityanath.

Gau rakshak supporter stabs student

A teenager who participated in a demonstration organised by gau rakshaks in Sonipat on Thursday stabbed a student, mistaking him for a journalist, after the latter refused to click his photograph.

The protest was organised by the Gau Rakshak Seva Dal against the slaughtering of a cow in Kerala last week, said SHO (Gohana) Kuldeep Deshwal, adding that the teenager was not a member of the group.

The accused, Mohit, 19, has been arrested on charges of attempt to murder. The victim, Shivam, a Gohana resident, has been admitted to Medanta Hospital in Gurugram.

According to the police, Shivam had accompanied a journalist friend to the protest site outside the Mini-secretariat here around 2:30 p.m. An argument broke out between him and Mohit over taking pictures. “Shivam was fiddling with a camera when Mohit asked him to take pictures of the memorandum being submitted to the SDM. Shivam refused to oblige and an argument ensued. The onlookers pacified them,” said Mr. Deshwal.

Shivam lodged a complaint with the police an hour later.

“I sent Shivam with a constable to detain Mohit. When Mohit tried to run away, Shivam chased him. At this, Mohit stabbed him thrice. He was, however, caught,” the SHO added.

Afghanistan needs a political settlement’

But relying on Pakistan to broker peace with the Taliban may not work, say experts.

A political settlement with Taliban is the only way to bring about an end to the conflict in Afghanistan, a group of experts who focus on the region said, hours after a blast killed at least 90 people, bringing the war to the doorstep of the tottering U.S.-supported government in Kabul. But relying on Pakistan to broker peace with the Taliban — as the U.S. has been doing for years — may not yield the desired result, and military pressure must compel the insurgents to come to the negotiating table, these experts said.

The U.S. approach to resolving the Afghanistan situation must be narrowly focussed on the conflict and leave out other regional questions, said Ashley J. Tellis, the Tata Chair for Strategic Affairs at Carnegie Endowment for International Peace.

‘U.S. Policy in Afghanistan: Changing Strategies, Preserving Gains”, a report he co-authored with another expert Jeff Eggers, argues that “regional options — resolving the India-Pakistan conflict, creating a neutral Afghanistan, or squeezing Pakistan — are too difficult to rely on alone.”

Policy review

“Since a counterterrorism-only solution is unlikely to be efficacious, the U.S. should prioritise reaching a political settlement with the Taliban while continuing to bolster the Afghan state and its security forces,” the authors argued.

The Trump administration is reviewing the U.S.’s Afghanistan policy and is likely to announce a new approach in the next few days. The U.S. commander in Afghanistan has asked for a moderate increase in troops levels and the administration is likely to approve an additional 3,000 to 5,000 troops to the existing 84,00. A U.S. military spokesperson in Kabul told the National Public Radio on Wednesday that the additional numbers are required to fill in some gaps in the training and support missions that the U.S. undertake in Afghanistan.

No timeline

Husain Haqqani, Senior Fellow at Hudson Institute, said the U.S. must stop announcing timelines for leaving Afghanistan. “The only way to escape from Afghanistan is to say that we have no intention of leaving. Whatever else you do, don’t put a timeline,” Mr. Haqqani said, recalling a statement by a Taliban leader who said, “we have the time and Americans have the watches”.

“All wars end in a political settlement. But Taliban is not any other group. For them, time is not important and worldly goods are not important,” said Mr. Haqqani.

He said Pakistan’s argument that India was fighting a proxy war against it in Afghanistan was misplaced and exaggerated.

“Stop fantasising that Pakistan would help broker peace with Taliban. Try to talk directly to the Taliban,” he said.

Champions Trophy 2017: All set for an engrossing fortnight of heady action

Champion India has a balanced side with bowlers for all conditions and surfaces

As M.S. Dhoni and his men rejoiced in their white jackets on the damp Edgbaston turf four years ago, the world was meant to have seen the last of the ICC Champions Trophy, a curiously unloved tournament, a quasi-World Cup its promoters had no time for.

Months later, though, the ICC changed stance, reviving the competition and instead putting the proposed World Test Championship into cold storage.

“It proved impossible to come up with a format for a four-team finals event in Test cricket that fits the culture of Test cricket and preserves the integrity of the format,” an ICC press release in February 2014 announced. “The most recent ICC Champions Trophy event proved to be very popular with supporters around the world and the future events will build on this success.”

And so the Champions Trophy is back for an eighth edition, its elite status seemingly entrenched, its arrival at the start of the English summer greeted with cheer.

Much is expected of the home side, transformed after an uninspiring World Cup performance two years ago. Eoin Morgan’s men have won 27 of their 44 ODIs since, the best win-loss ratio among the Full Member sides, thumping their way to scores over 300 on 21 occasions, more than anyone else has managed.

England’s batting might

This has much to do with the surfaces it has played on, but there’s no denying the might of England’s batting group. Ben Stokes, without doubt the finest all-rounder in the world, stands poised to explode, although there exist concerns over an injured knee.

Morgan, who averages 55 over the last 10 months, now has the opportunity to deliver his nation a first major ODI trophy. Monday’s embarrassment at South Africa’s hands will temper expectations, but that game will be seen as an aberration.

For all the boldness of its new approach, England will have to demonstrate that it can overcome self-doubt and handle the white-knuckle tension of a tough knock-out fixture.

There are no such fears about India. Nine of the 11 that triumphed in the final in 2013 are part of this squad, older and wiser. This is a balanced side, with bowlers for all conditions and surfaces.

Virat Kohli leads India for the first time at a global tournament, the campaign set to begin against Pakistan here on Sunday. No pressure then.

Much has been said of Australia’s pace quartet but the batting — which has not covered itself in glory in English conditions in the recent past — would appear over-reliant on Steve Smith, who has spent a demanding but fruitful three months in India.

South Africa, which enters the event as the world’s top-ranked ODI side, continues to chase a first major title since the inaugural ICC Knockout in 1998.

While it remains A.B. de Villiers’ greatest unfulfilled ambition to win a World Cup, the 33-year-old will cherish any sort of trophy with his national team at this stage.

Sri Lanka, which welcomes Lasith Malinga back to the ODI setup; Bangladesh, which enters the event ranked sixth in the world; New Zealand, which possesses bowlers who could flourish in these conditions; and Pakistan, which has managed to send a player home already, do not perhaps strike anyone as favourites.

However, the eight-team format means nobody has much room for manoeuvre in the group stages. It also means we don’t have to wait a full month for the knock-outs.

Bilateral one-day cricket often struggles for context but a tournament such as this, with multiple contenders, evokes genuine interest.

If the scores in the recently-concluded Royal London One-Day Cup, the ECB’s domestic 50-over tournament, are anything to go by there will be some mountainous totals at all three venues. It should make for an absorbing fortnight.

NASA to fly Solar Probe Plus right into sun’s atmosphere in 2018

The purpose is to study the sun’s outer atmosphere and better understand how stars like ours work.

A NASA spacecraft will aim straight for the sun next year.

The space agency announced the red-hot mission on May 31, 2017 at the University of Chicago. Scheduled to launch in summer 2018, the Solar Probe Plus will fly within 6.4 million km of the sun’s surface right into the solar atmosphere. It will be subjected to brutal heat and radiation like no other man-made structure before.

The purpose is to study the sun’s outer atmosphere and better understand how stars like ours work.

No midday meal without Aadhaar in UP schools

The present rate of Aadhaar enrolment of students in primary schools in the State is extremely low

Students of government-run primary schools in Uttar Pradesh, who do not have an Aadhaar card, will not be able to get midday meal after June 30.

List of students

The direction from the State government comes three months after the Union Human Resource Development Ministry made Aadhaar cards mandatory for midday meals and asked UP schools to make a list of students who possess the cards.

“The government has directed the basic education officers in all the districts to ensure that every beneficiary of the midday meal has an Aadhaar card so that the scheme doesn’t get affected. If Aadhaar cards for all beneficiaries of the midday meal scheme are not made and their numbers not submitted to the State government, then the students without such cards will not be able to benefit from the different schemes of the government. And you will be held responsible for that,” warned a letter written by Director, Basic Education, Sarvendra Vikram Bahadur Singh, addressed to primary education officers.

The present rate of Aadhaar enrolment of students of primary schools in the State is extremely low.

In Meerut for instance, of a total of 1.73 lakh students in 1,561 schools, only about 29,000 students have Aadhaar cards, which comes to less than 17 %.

Schools puzzled

The direction has left the school authorities puzzled as schools have closed for vacation and will reopen only on July 1.

The letter by Mr. Singh has asked all the primary education officers to submit a list of students who possess Aadhaar cards to the State government by May 30. Mr. Singh has sent a reminder to the primary education officers of Meerut, Hapur, Moradabad, Sambhal, Kannauj, Farrukhabad and Kanpur (rural) as they have not yet sent the list to the government.

Officials helpless

Most officials who handle the midday meal scheme have expressed their helpless in the face of the ultimatum. A coordinator for the midday meal scheme in Meerut said with primary schools closed for vacations, it would be almost impossible to follow the direction.

‘Students out of town’

“Schools have closed for vacations and most children have gone out of town. Teachers can be asked to help the students get their Aadhaar cards made, but the challenge is how to make cards for students who are out of town,” he said.

India is no longer the fastest-growing economy

Slowdown brings GDP down to 6.1% in fourth quarter

India lost its fastest-growing major economy tag in the fourth quarter of 2016-17, with GDP growth coming in at 6.1% compared with China’s 6.9% in the same period.

Data from the Ministry of Statistics on Wednesday showed GDP grew 7.1% in the financial year 2016-17, slower than the 8% registered in 2015-16. The GDP numbers were based on the new 2011-12 base year recently adopted for data including the Index of Industrial Production (IIP) and Wholesale Price Index (WPI). Gross value added (GVA) growth was 6.6% for 2016-17 and 5.6% in the fourth quarter, compared with 7.9% in 2015-16 and 8.7% in Q4 of that year.

The “numbers show a clear slowdown in GVA,” DK Srivastava, Chief Economic Adviser at EY India, said.

“That is, post-demonetisation there has been a slowdown,” he said. “The GDP growth rate is slightly higher (than GVA growth) because of a more than proportionate increase in indirect tax net of subsidies. But the GDP also shows a reduction in Q3 and Q4 numbers compared with the beginning of the year. So demonetisation has clearly had a tangible and adverse impact.”

The Centre, however, maintained that it was happy with the growth rate, with Chief Statistician T.C.A. Anant saying that the economy was growing “reasonably well.”

“If you look at the current and time series estimates, it is clear the economy is growing reasonably well,” Mr. Anant said, while briefing the press about the GDP numbers.

“However, if you look at it from the perspective of what sort of growth rates do we desire over a period of time, then from that perspective there is more to be achieved.”

“We can take some measure of satisfaction, but the numbers do reveal there are areas that still could improve,” Mr. Anant added. “One of the areas is capital formation. It continues to be relatively soft, with growth still below 30%. We would like to see these rates well above 30%.”

Looking deeper, GVA growth slowed in almost every sector in Q4 of 2016-17 compared to the growth witnessed in the corresponding period of the previous year.

बेटी को रेप से बचाने के लिए ‘राष्ट्रीय बेटी’?

राजस्थान हाई कोर्ट के एक जज ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की सिफारिश कर इससे जुड़े विवादों को और हवा दी है.

जस्टिस महेश चंद्र शर्मा जिस दिन रिटायर होने वाले थे उसी दिन उन्होंने यह सिफारिश की.

जस्टिस शर्मा की सिफारिश को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा गर्म है. आम आदमी पार्टी की विधायक अलका लांबा ने इसे लेकर कटाक्ष करते हुए ट्वीट किया है.

लांबा ने पूछा कि गाय को हत्या से बचाने के लिए राष्ट्रीय पशु घोषित करोगे और बेटी अगर कोख में बच जाए तो उसे बलात्कार से बचाने के लिए क्या करोगे?

जिस जस्टिस शर्मा को गाय पसंद है

ट्विटर

अलका लांबा के इस ट्वीट का कई लोगों ने समर्थन किया है तो कई लोगों ने उन पर ही हमला भी बोला है.

वरिष्ठ पत्रकार मृणाल पांडे ने लिखा है, ”माता को जानवर कहोगी तो माता राणी का शाप लगेगा. सुना नहीं इब तो मोर भी ब्रह्मचारी बटुक सै.”

ट्विटर

लांबा के ट्वीट पर कई लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है. कई लोगों ने उन्हीं की बात को आगे बढ़ाया है.

मनीष खंडेलवाल ने लिखा है, ”फिर तो राष्ट्रमाता ही घोषित कर दिया जाना चाहिए.” ज्ञानचंद गांगुली नाम के एक शख़्स ने अलका के ट्वीट पर टिप्पणी की है, ”तो लड़कियों को राष्ट्रीय बहन घोषित कर दो.”

ट्विटर

वहीं बिक्रम सिंह नाम के एक व्यक्ति ने इस ट्वीट पर अपनी टिप्पणी में लिखा है, ”ये भाजपा वालों के दिखाने के दांत और हैं और खाने के और हैं. दिखाने के लिए बनते हैं देशभक्त, पर हैं देशद्रोही.