हसन रूहानी की जीत के ऐतिहासिक मायने

ईरान के राष्ट्रपति चुनाव में हसन रूहानी की जीत बड़ी ऐतिहासिक है जो वहां के कट्टरपंथियों के लिए एक बड़ा झटका है.

हसन रूहानी की जीत का मतलब है कि ईरान की जनता ने तय कर लिया है कि वो कट्टरपंथ नहीं बल्कि तुलनात्मक रूप से उदारवाद पर ही कायम रहेंगे.

ईरान ने पिछले साल अमरीका और दुनिया की बाक़ी ताकतों के साथ परमाणु समझौता किया था जिसका विरोध भी हुआ था.

विरोधियों की हार

हसन रूहानी के विरोधी

रूहानी की जीत उन लोगों की बड़ी हार है जो अमरीका और दुनिया की बाक़ी ताकतों के साथ परमाणु समझौते की आलोचना कर रहे थे.

ऐसा लगता है कि ईरान ने एक कूटनीतिक निर्णय लिया है कि वो अमरीका, फ्रांस, ब्रिटेन, यूरोप समेत तमाम देशों से अच्छे संबंध रखेगा. साथ ही राजनीतिक और क्षेत्रीय मतभेदों को भी ध्यान में रखेंगे.

हसन रूहानी अब अगले चार साल में ना केवल पश्चिम के देशों बल्कि सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों के साथ भी अच्छे संबंध बनाने की कोशिश करेंगे.

चबहार से होगी बहार

हसन रूहानी

ईरान अब मध्य एशिया में एक बड़ा औद्योगिक केंद्र बनना चाहता है, और इसी सिलसिले में संपर्क बढ़ाने के इरादे से चाबहार बंदरगाह बनाया जा रहा है.

विकास के मुद्दे पर ईरान में आम सहमति बनी है जो नज़र आ रही है. ईरान अब तेल क़ारोबार पर अपनी निर्भरता ख़त्म करना चाहता है.

अब इस बात की आशंका कम है कि अमरीका ईरान पर और प्रतिबंध लगाएगा. रूहानी के दोबारा राष्ट्रपति बनने से भारत-ईरान के रिश्ते भी आगे बढ़ेंगे.

भारत का फ़ायदा

भारत को डर लगा रहता था कि अमरीका ईरान पर और प्रतिबंध ना लगा दे, लेकिन अब ईरान के संबंध पश्चिमी देशों से अच्छे होंगे.

मोदी के साथ रूहानी

भारत और भारतीय कंपनियों के लिए ये अच्छी बात होगी. चाबहार बंदरगाह के काम में अब तेज़ी आएगी. चबहार से अफ़ग़ानिस्तान की कनेक्टिविटी भी हो जाएगी.

जापान और दक्षिण कोरिया का निवेश भारत चाबहार में लाने की कोशिश कर रहा है. भारत को मध्य एशिया के लिए दरवाज़ा मिल जाएगा. अगले चार साल में ईरान के साथ भारत के संबंध प्रगाढ़ होंगे.

ऐतिहासिक रूप से, भारत के संबंध ईरान के उदार नेतृत्व से अधिक अच्छे रहे हैं. रूहानी की जीत से ईरान में लोकतंत्र और मज़बूत होगा.

सवाल सुप्रीम लीडर का

सुप्रीम लीडर

रूहानी के दूसरे कार्यकाल में जो एक ख़ास बात होने वाली है, वो ये है कि अगले 4 साल के भीतर ईरान के नए सुप्रीम लीडर का चुनाव होना है.

चुनाव में जीत के साथ ही तय हो गया है कि ईरान के अगले सुप्रीम लीडर के चुनाव में रूहानी की बड़ी भूमिका होगी.

Of cows, compassion and communal comity

A cattle shelter run by a Jodhpur-based Muslim educational and welfare society earns goodwill

Even as cow vigilante groups in the northern States are targeting people on the mere suspicion of eating beef or smuggling cattle, an adarsh gaushala (model cow shelter) established by a Muslim institution in Jodhpur is taking care of old and sick cows. It is also assisting dairy farmers in a dozen surrounding villages in looking after their animals, and earning goodwill for promoting communal amity.

Launched in 2004 by Jodhpur-based Marwar Muslim Educational and Welfare Society (MMEWS), the initiative has won mass appreciation, with hundreds of people handing over cows and bulls to the shelter.

Old, weak, sick, abandoned, and neglected cows are given priority at the sprawling gaushala located in Bujhawad village off the Jodhpur-Barmer highway, 12km from Jodhpur. The shelter claims to be the first gaushala to be wholly owned and managed by the Muslim community.

Situated on a large piece of land without any boundary wall, the shelter is currently home to 217 bovines tagged by the State government’s Animal Husbandry Department.

The shelter’s full-time caretaker Hakim Khan and his wife Allahrakhi are in charge of the bovines’ welfare. Dogs and wild animals intruding into the shelter is a major concern, but Mr. Khan says the job is worth it. “We are glad to receive appreciation from the majority community, which sees the gaushala as an enterprise promoting communal harmony,” he said.

A trained team brings the cows, mostly from nearby villages, to the gaushala in a specially-designed vehicle. The MMEWS currently spends a little over ₹1 lakh a month on the animals. It is planning to double the shelter’s capacity by taking over a part of the 56 acres of land allotted for the construction of the Maulana Azad University, the society’s general secretary, Mohammed Atique, told The Hindu.

“When we started the gaushala, some fringe elements objected to Muslims operating the shelter,” Mr. Atique said. “But over the years, the shelter has won people’s admiration and generated immense goodwill as villagers appreciate the selfless work.”

Most of the bovines in the shelter have come from villages such as Doli, Gangana, Bhandu, Narnadi, Khudala, Jhanwar and Rohila Kalan. The shelter also employs a team of veterinarians who not only attend to the animals but also visit the nearby villages to assist dairy farmers in taking care of their cattle. Filling gaps in the government’s veterinary infrastructure, the team runs vaccination and treatment camps for stray cows in the villages. “A mobile van visits these villages to treat cows, goats and buffaloes free of cost,” Mr. Atique said.

After India, a son for Jonty in Mumbai

Mumbai Indians fielding coach’s wife gives birth to boy, the couple’s second child in the city

South African cricketing legend and Mumbai Indians fielding coach Jonty Rhodes was blessed with a baby boy on Sunday evening in Mumbai. His wife Melanie opted for a water birth at the Surya Child Care Hospital in Santacruz, where she had delivered their first baby, a girl they named India.

“The baby is healthy and weighs 3.7 kg. The mother is doing very well too,” Dr. Bhupendra Avasthi, paediatrician and founder of the hospital, said. The delivery was carried out by gynaecologist Dr. Ameet Dhurandhar. According to Dr. Avasthi, Melanie walked into the hospital around 5.30 p.m. and immediately went into labour. “The water birth was extremely comfortable for her. She was up and walking around within an hour after delivery,” he said adding the hospital has carried out nearly 40 water births so far.

The couples first baby was born during the Indian Premier League’s (IPL) eighth season. “This time, Mr. Rhodes is away for the final [against Rising Pune Supergiant in Hyderabad]. He is expected to arrived early on Monday,” added Dr. Avasthi. Mr. Rhodes took to Twitter to announce the arrival of his son. “The prize before the prize @mipaltan? Nathan John “plunged” into the world at 6:20 pm on IPL final #poolbirth #earthmother #incredibleindia” the former Proteas fielding genius tweeted.

100 रुपए में यहां खाएं अनलिमिटेड गोलगप्पे, सोशल मीडिया पर छाया JIO पानी पूरी वाला

रवि ने गोलगप्पे खाने वालों के लिए दैनिक और मासिक दोनों तरह के ऑफर शुरू किए हैं. दैनिक ऑफर के तहत 100 रुपए देकर मनचाहे गोलगप्पे खाए जा सकते हैं. यानी 100 रुपए दो और जितना मन करे उतने गोलगप्पे खाओ. मासिक ऑफर 1000 रुपए का है. इस ऑफर के तहत रवि को 1000 रुपए दीजिए और पूरे महीने जितना मन करे उतने गोलगप्पे का आनंद लीजिए.

नई दिल्ली: मुफ्त और सस्ते कॉलिंग के लिए JIO का नाम तो सभी जानते हैं, लेकिन इन दिनों एक जियो गोलगप्पे वाला सोशल मीडिया पर छाया हुआ है. गुजरात के पोरबंदर में गोलगप्पे (पानी पूरी) बेचने वाले रवि जगदंबा ने दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनी रिलायंस जियो के सस्ते प्लान से प्रभावित होकर ग्राहकों को लुभाने के लिए खास ऑफर शुरू किया है. कोई भी रवि की दुकान पर इस ऑफर के तहत गोलगप्पे खा सकता है. खास ऑफर के चलते रवि शहर भर में भी फेमस हो गया है. उसने बताया कि गोलगप्पे की बिक्री बढ़ाने के लिए उसने जियो से मिलता-जुलता हुआ गोलगप्पा खाओ ऑफर शुरू किया है.

ये है जियो पानी पूरी वाले का ऑफर

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रवि ने गोलगप्पे खाने वालों के लिए दैनिक और मासिक दोनों तरह के ऑफर शुरू किए हैं. दैनिक ऑफर के तहत 100 रुपए देकर मनचाहे गोलगप्पे खाए जा सकते हैं. यानी 100 रुपए दो और जितना मन करे उतने गोलगप्पे खाओ. मासिक ऑफर 1000 रुपए का है. इस ऑफर के तहत रवि को 1000 रुपए दीजिए और पूरे महीने जितना मन करे उतने गोलगप्पे का आनंद लीजिए.

मालूम हो कि गोलगप्पे लगभग पूरे भारत में खाए जाते हैं, हालांकि जगहों के हिसाब से इसके नाम अलग हैं. उड़ीसा, साउथ झारखंड, छत्तीसगढ़, हैदराबाद और तेलंगाना के कुछ हिस्सों में गोलगप्पे को गुपचुप नाम से जाना जाता है. पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के कुछ हिस्सों में गोल गप्पों को भी फुल्की कहा जाता है.

यूं तो पूरी दुनिया में आलू टिक्की को लोग टिक्की कहते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश को होशंगाबाद में गोल गप्पों को टिक्की कहा जाता है. गोल गप्पों को यूपी के अलीगढ़ में इस नाम से भी जाना जाता है. अंग्रेजी में शायद इसके लिए कोई सटीक शब्द नहीं मिला होगा, इसलिए लोगों ने पानी-पूरी को इस नाम से ट्रांसलेट कर लिया. बिहार और पश्चिम बंगाल में लोग इसे फोचका भी कहते हैं.

धर्म के नाम पर आतंकवाद का खेल अब बंद हो – ट्रंप

पहली विदेश यात्रा में सऊदी अरब पहुंचे अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने रियाद में 40 से ज़्यादा मुस्लिम देशों के नेताओं को संबोधित किया.

डोनल्ड ट्रंप ने अपने संबोधन में मुस्लिम देशों के नेताओं से आतंकवाद ख़त्म करने की अपील की. उन्होंने कहा कि अपनी पवित्र धरती पर आतंकवाद को प्रश्रय न दें.

अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा, ”आतंकवाद से दुनिया भर के देश पीड़ित हैं. कुछ देश आतंकवाद को बढ़ाने में मदद कर रहे हैं. इससे मध्य-पूर्व से लेकर भारत और रूस जैसे देश भी प्रभावित हो रहे हैं. धर्म के नाम पर आतंकवाद का खेल अब बंद होना चाहिए.”

सऊदी अरब: तो अब मुसलमानों के लिए बदल जाएंगे ट्रंप के बोल

मुसलमानों को कोसने वाले ट्रंप सबसे पहले सऊदी अरब क्यों गए?

अमरीका-सऊदी अरब के बीच सबसे बड़ा हथियार सौदा

सऊदी अरब में इस्लाम पर बोलेंगे डोनल्ड ट्रंप

डोनल्ड ट्रंप

इस सम्मेलन में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ भी मौजूद थे. ट्रंप ने कहा, ”अमरीका का लक्ष्य शांति, सुरक्षा और संपन्नता है. मैं दोस्ती, उम्मीद और प्यार का संदेश लेकर आया हूं. मैं किसी पर कुछ थोपने नहीं आया हूं बल्कि साझेदारी बढ़ाने आया हूं. बड़े मुस्लिम देशों को इस्लामिक अतिवाद से लड़ने के लिए आगे आना होगा.”

अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा कि वह न तो लेक्चर देने आए हैं और न ही कुछ थोपने आए हैं. उन्होंने कहा कि अमरीका शांति और सुरक्षा चाहता है. उन्होंने कहा, ”मैं चाहता हूं कि मुस्लिम युवा भी बिना डर के रहें और आगे बढ़ें.”

डोनल्ड ट्रंप

सम्मेलन को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा कि वह सऊदी अरब की मेहमानवाज़ी से ख़ुश हैं.

ट्रंप ने कहा कि किंग सलमान के नेतृत्व में दोनों देशों के बीच संबंध अच्छे हुए हैं. अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा, ”दोनों देशों के बीच जो समझौता हुआ है उससे रोज़गार पैदा होगा और अतिवाद से भी लड़ने में मदद मिलेगी.”

ट्रंप ने कहा, ”मध्य पूर्व सांस्क़तिक रूप से काफ़ी संपन्न है और प्राकृतिक संसाधनों से भी भरा है पर आतंकवाद के कारण सारी चीज़ें पीछे छूट जाती हैं. जो आतंकवाद को वित्तीय मदद पहुंचा रहे हैं उन्हें बंद करना होगा. हम मध्य-पूर्व में आतंकवाद से लड़ने के लिए सहयोग चाहते हैं. मुस्लिम देश अतिवादियों को प्रश्रय देना बंद करें.”

डोनल्ड ट्रंप

किंग सलमान की तरह ट्रंप ने भी ईरान पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि ईरान सामुदायिक हिंसा को बढ़ावा दे रहा है. अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा कि ईरान इस इलाक़े में अस्थिरता फैला रहा है. ट्रंप ने कहा कि इसराइल और फ़लस्तीनियों के बीच शांति समझौता संभव है.

ट्रंप ने कहा कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ जंग अच्छाई और बुराई के बीच की लड़ाई है. उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व के देशों को बेहतर भविष्य की तरफ़ बढ़ना चाहिए.

डोनल्ड ट्रंप

इससे पहले सम्मेलन को संबोधित करते हुए सऊदी अरब के किंग सलमान ने कहा, ”इस्लाम शांति और सहिष्णुता का धर्म है. इस्लाम के नाम पर आतंकवाद बंद होना चाहिए. आतंकवाद के ख़िलाफ़ सभी देशों के एकजुट होने का वक़्त आ गया है.”

किंग सलमान ने इस दौरान ईरान की कड़ी आलोचना की. उन्होंने कहा कि ईरान भरोसे के माहौल को ख़त्म कर रहा है. उन्होंने कहा कि ईरान आतंकवाद को प्रश्रय दे रहा है. किंग सलमान ने इस्लामिक स्टेट से लड़ने की भी प्रतिबद्धता जताई.

भीम आर्मी बेज़ुबान दलितों की आवाज़ है या लोकतंत्र के लिए चुनौती?

दलितों का प्रदर्शन

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में राजपूतों और दलितों के बीच हिंसक घटनाओं के बाद भीम आर्मी चर्चा में है.

भीम सेना के नाम से लोगों को कन्फ़्यूजन हो सकता है. सेना से आर्मी का मतलब निकाला जाता है.

लेकिन इससे जुड़े लोग संविधान के दायरे में रहकर काम करने की बात करते हैं. दलितों को संगठित करने की बात करते हैं.

मेरा मानना है कि ऐसी समानांतर सेनाएं खड़ी होने लगेंगी और ये ज्यादा उग्र तरीके से काम करेंगी तो लोकतंत्र के लिए अलग ढंग से चुनौती खड़ी हो सकती है.

दलितों की शिकायत की समस्या के जड़ में जाने की जरूरत है.

दलितों का प्रदर्शन, ‘संघवाद

‘द ग्रेट चमार’ का बोर्ड लगाने वाले ‘रावण’

दलित कार्यकर्ताओं पर एफ़आईआर और गिरफ़्तारी के विरोध में प्रदर्शन

दलितों की पार्टियों को फ़ुर्सत नहीं

ये सोचे जाने की जरूरत है कि किन वजहों से दलित ऐसे उग्र संगठनों का गठन कर रहे हैं. इसकी दो-तीन वजहें दिखाई देती हैं.

दलितों के हितों के लिए काम करने का दावा करने वाली बड़ी पार्टियां अपनी प्रासंगिकता खो रही हैं. वो सिर्फ सत्ता की राजनीति में उलझ कर रह गई हैं.

जिसकी वजह से दलित आबादी के साथ हो रही बदसलूकी और जिसे वो दोयम दर्जे का बर्ताव मानते हैं, उसे कोई जुबान नहीं मिल पा रही है.

दूसरी वजह ये है कि पूरे देश में एक तरह का वातावरण बन रहा है कि कुछ लोग खुद को डॉक्टर आंबेडकर का वारिस तो बता रहे हैं लेकिन दलितों के लिए कुछ करने से बच रहे हैं.

ये विरोधाभास दिख रहा है.

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‘आरक्षण हटाओ लेकिन पहले ख़त्म हो जाति व्यवस्था’

भीम आर्मी

उग्र विरोध में भीम सेना बस एक हिस्सा

भीम सेना के प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सहारनपुर हिंसा के बाद अगड़ी जाति के लोगों को हथियारों के साथ प्रदर्शन की इजाजत दी गई जबकि दलितों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने से भी रोका गया.

प्रशासन और सरकार के स्तर पर ये दोहरा बर्ताव दिख रहा है.

जनांदोलन और इन संगठनों के रूप में दलितों का जो उभार हो रहा है, उससे राजनीतिक दल अपने तौर तरीकों में बदलाव लाने पर विवश होंगे.

देश भर में दलितों के साथ जो कुछ हो रहा है, भीम सेना केवल उसका एक हिस्सा है.

गुजरात में गाय के नाम पर दलितों के साथ जो कथित ज़्यादतियां हुईं, उससे दलित उग्र विरोध करने पर विवश हो रहे हैं, फिर ये मामले चाहे गुजरात या फिर झारखंड के हों.

ये विरोध अलग-अलग स्तरों पर दिख रहा है और इसी के कारण मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां अपने नीति बदलने पर मजबूर होंगी.

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दक्षिणपंथी राजनीति

दलितों का प्रदर्शन

सेना या संगठन बनाने का शगल अगड़ी जातियों में भी देखा जा रहा है. कोई ये पूछ सकता है कि उन्हें आखिर किस तरह की असुरक्षा है?

मेरा मानना है कि पूरी दुनिया में जिस तरह से दक्षिणपंथ का उभार हो रहा है, उससे एक अनुदारवादी माहौल हर जगह बन रहा है.

आप देख सकते हैं कि लोग चाहे गाय के नाम पर हो या बच्चा चोरी के नाम पर, कानून अपने हाथों में लेकर किसी को भी मार रहे हैं.

और पिछले तीन सालों, भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार देने की घटनाएं बढ़ी हैं.

संविधान में सबका विकास की बात कही गई है लेकिन ये भावना बढ़ रही है कि अलग-अलग विकास हो और सभी को अपनी-अपनी तरक्की चाहिए.

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सरकार ख़ास लोगों के बारे में सोच रही हैं

दलितों का प्रदर्शन

देश में जिस तरह की दक्षिणपंथी राजनीति का चलन बढ़ा है, ये उसी का प्रतिबिंब है कि कथित अगड़ी जातियों या फिर किसी अन्य समुदाय के नाम पर कैसे तथाकथित सेनाएं खड़ी हो रही हैं.

इसके लिए कहीं न कहीं सरकारें भी जिम्मेदार हैं. वो दोनों पक्षों की चिंताएं दूर करने में नाकाम रही है.

भीम आर्मी जैसी सेनाएं खड़ी होने लगेंगी तो लोकतंत्र के लिए अलग चुनौती खड़ी हो सकती है.

दिल्ली में आयोजित विरोध प्रदर्शन में सहारनपुर से लोग आ रहे हैं तो इसका मतलब साफ है कि लोग उपेक्षित महसूस कर रहे हैं.

सरकार की तरफ से जो समावेशी रुख होना चाहिए, वो नहीं दिख रहा है और ये भावना बन रही है कि मौजूदा सरकार ख़ास लोगों के बारे में ज्यादा सोचती है.