हरीश साल्वे- वो वकील जिसने कुलभूषण का मृत्युदंड रुकवाया

वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे की ख़ूब चर्चा हो रही है. इन्होंने एक रुपये की फ़ीस लेकर कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में भारत का पक्ष रखा.

अंतरराष्ट्रीय कोर्ट ने पाकिस्तान की जेल में क़ैद भारतीय कुलभूषण जाधव के मामले में अंतिम सुनवाई तक उन्हें दिए गए मृत्युदंड पर रोक लगा दी है.

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने ट्वीट कर हरीश साल्वे के प्रति आभार व्यक्त किया है.

ग़ौरतलब है हरीश साल्वे लंबे समय तक केंद्र में कांग्रेस की सरकारों में मंत्री रहे एनकेपी साल्वे के बेटे हैं.

42 साल के अपने करियर में वह कई कॉरपोरेट घरानों का पक्ष कोर्ट में रख चुके हैं. उनकी गिनती भारत के सबसे महंगे वकीलों में होती है.

‘लीगली इंडिया डॉट कॉम’ के मुताबिक, 2015 में साल्वे कोर्ट में एक सुनवाई के लिए 6 से 15 लाख रुपये लेते थे.

पढ़िए, साल्वे की ज़िंदग़ी और करियर की ख़ास बातें, जो किताब ‘लीगल ईगल्स’ से ली गई हैं:

1. सीए की परीक्षा में दो बार फ़ेल हुए

हरीश बचपन से इंजीनियर बनना चाहते थे. लेकिन कॉलेज तक आते-आते उनका रुझान चार्टर्ड अकाउंटेसी (सीए) की ओर हो गया. सीए की परीक्षा में वह दो बार फ़ेल हो गए. जाने माने वकील नानी अर्देशर पालखीवाला के कहने पर उन्होंने क़ानून की पढ़ाई शुरु की.

नागपुर में पले बढ़े साल्वे के मुताबिक- ‘मेरे दादा एक कामयाब क्रिमिनल लॉयर थे. पिता चार्टर्ड अकाउंटेंट थे. मां अम्ब्रिती साल्वे डॉक्टर थीं. इसलिए कम उम्र में ही मुझ में प्रोफेशनल गुण आ गए थे.’

हरीश साल्वे
Image captionहरीश साल्वे

2. पिता पहली बार क्रिकेट वर्ल्ड कप को इंग्लैंड से बाहर लाए

हरीश साल्वे के पिता एनकेपी साल्वे पेशे से सीए थे, लेकिन क्रिकेट प्रशासक और कांग्रेस के साथ अपनी राजनीतिक पारी के लिए ज़्यादा जाने गए.

पहली बार इंग्लैंड से बाहर क्रिकेट वर्ल्ड कप कराने का श्रेय उन्हें ही दिया जाता है. उन्हीं के नाम पर बीसीसीआई ने 1995 में एनकेपी साल्वे ट्रॉफी शुरू की थी.

सौरव गांगुली
Image caption2006 में एनकेपी साल्वे टूर्नामेंट में सौरव गांगुली

वह इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और पीवी नरसिम्हा राव की सरकारों में मंत्री भी रहे. विदर्भ को अलग राज्य बनाने की मांग को लेकर भी वह काफ़ी मुखर रहे.

3. पहला केस दिलीप कुमार का

पिता के संपर्कों का हरीश साल्वे को फ़ायदा मिला और उन्हीं की बदौलत उनकी नानी पालखीवाला से मुलाक़ात हुई.

हरीश के मुताबिक, उनका करियर 1975 में फिल्म अभिनेता दिलीप कुमार के केस के साथ शुरू हुआ. हरीश इस केस में अपने पिता की मदद कर रहे थे.

दिलीप कुमार पर काला धन रखने के आरोप लगे थे. आयकर विभाग ने उन्हें नोटिस भेजा था और बकाया टैक्स के साथ भारी हर्जाना भी मांगा था.

मामला ट्रिब्यूनल और हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था.

दिलीप कुमार
Image captionदिलीप कुमार (बीच में)

अपने शर्मीले दिनों को याद करते हुए साल्वे कहते हैं, ‘मैं सुप्रीम कोर्ट में दिलीप कुमार का वकील था. आयकर विभाग की अपील ख़ारिज़ करने में जजों को कुल 45 सेकेंड लगे. दिलीप कुमार एक पारिवारिक मित्र थे. वह बहुत खुश हुए. मुझे कोर्ट में बहस करनी पड़ती तो मेरी आवाज़ नहीं फूटती. ख़ुशक़िस्मती से कोर्ट ने मुझसे जिरह के लिए नहीं कहा.’

4. पहली बड़ी प्रशंसा

सरकार जब बेयरर बॉन्ड्स लेकर आई थी तो साल्वे ने अपने सीनियर सोराबजी से इज़ाजत लेकर सरकारी फ़ैसले के ख़िलाफ़ अर्ज़ी दाख़िल कर दी.

इसी मामले पर वरिष्ठ वकील आरके गर्ग ने भी अर्ज़ी दाख़िल की थी. सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच इस पर सुनवाई कर रही थी. गर्ग ने तीन घंटे तक अपनी दलीलें रखीं, फिर साल्वे का नंबर आया.

साल्वे ने लड़खड़ाते हुए शुरुआत की. दोपहर ठीक 1 बजे जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूछा कि क्या वह अपनी बात रख चुके हैं. लेकिन साल्वे को हैरानी और राहत हुई जब जस्टिस भगवती ने कहा, ‘आपने गर्ग को तीन दिन तक सुना. ये नौजवान अच्छी दलीलें दे रहा है. ये जब तक चाहे, इसे अपनी बात रखने की इज़ाजत मिलनी चाहिए.’

शाम 4 बजे तक साल्वे ने अपनी बात रखी. साल्वे बताते हैं, ‘जब मैंने ख़त्म किया तो मुझे सबसे बड़ा इनाम अटॉर्नी जनरल एलएन सिन्हा से मिला, जिनके लिए इतना सम्मान था कि मैं उनकी पूजा करता था. वो खड़े हुए और बोले कि मैं गर्ग की बातों को 15 मिनट में काउंटर कर सकता हूं, लेकिन मैंने इस नौजवान को बड़े चाव से सुना है. मैं अपने दोस्त मिस्टर पाराशरन (उस वक़्त के सॉलिसिटर जनरल) से कहूंगा कि पहले वह इस नौजवान की दलीलों का जवाब देने की कोशिश करें.’

5. अंबानी, महिंद्रा और टाटा के वकील रहे

1992 में दिल्ली हाईकोर्ट की तरफ से साल्वे सीनियर एडवोकेट बना दिए गए. इसके बाद उन्होंने अंबानी, महिंद्रा और टाटा जैसे बड़े कॉरपोरेट घरानों की कोर्ट में नुमाइंदगी की.

मशहूर केजी बेसिन गैस केस में जब अंबानी बंधुओं के बीच विवाद हुआ तो बड़े भाई मुकेश अंबानी का पक्ष हरीश साल्वे ने ही रखा.

अनिल अंबानी, मुकेश अंबानी
Image captionअनिल अंबानी (बाएं), मुकेश अंबानी

भोपाल गैस त्रासदी के बाद यूनियन कार्बाइड केस की सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में उन्होंने केशब महिंद्रा का पक्ष रखा था. कोर्ट ने महिंद्रा समेत यूनियन कार्बाइड के सात अधिकारियों के ख़िलाफ़ ग़ैर-इरादतन हत्या के आरोपों को ख़ारिज़ कर दिया था.

इसके ख़िलाफ सरकार ने ‘क्यूरेटिव पेटिशन’ दाख़िल की थी, जिसमें महिंद्रा की पैरवी साल्वे ने की थी.

नीरा राडिया के टेप सामने आने के बाद रतन टाटा निजता के उल्लंघन का सवाल लेकर सुप्रीम कोर्ट गए थे. तब उनके वकील भी साल्वे ही थे.

5. वोडाफ़ोन केस के बाद बढ़ी ख्याति

लेकिन साल्वे को ‘लगभग अजेय’ तब माना गया, जब उन्होंने वोडाफ़ोन को 14,200 करोड़ की कथित टैक्स चोरी के केस में जीत दिलाई.

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला पलट दिया और कहा कि भारतीय टैक्स प्रशासन को कंपनी के विदेश में किए लेन-देन पर टैक्स लेने का अधिकार नहीं है.

साल्वे बताते हैं, ‘इस केस की तैयारी के दौरान मैं हमेशा अपने पास पालखीवाला की तस्वीर रखा करता था. वह मुझे प्रेरित करते थे.’

6. इतालवी नौसैनिकों का पक्ष रखा

बहुत सारे लोगों को शायद हैरत हो कि केरल में दो भारतीय मछुआरों की हत्या के मामले में वह इटली के दूतावास की तरफ से अभियुक्त इतालवी नौसैनिकों का पक्ष रख रहे थे.

लेकिन जब इटली की सरकार ने दोनों को सौंपने से मना कर दिया तो साल्वे ने ख़ुद को इस केस से अलग कर लिया.

आरोपी इतालवी नौसैनिक
Image captionआरोपी इतालवी नौसैनिक

बिलकीस बानो मामला भी उनकी बड़ी जीतों में माना जाता है. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस केस की जांच के आदेश दिए थे.

7. गुजरात दंगा मामले में लगे थे भेदभाव के आरोप

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगा मामले में साल्वे को ‘एमीकस क्यूरी’ चुना था. इसका शाब्दिक अर्थ ‘अदालत का मित्र’ होता है.

जनहित के मामलों में वे न्याय सुनिश्चित करने में कोर्ट की मदद करते हैं.

लेकिन कुछ दंगा पीड़ितों ने साल्वे पर जनहित के ख़िलाफ़ काम करने का आरोप लगाया.

कामिनी जायसवाल और प्रशांत भूषण जैसे वकीलों ने भी आरोप लगाया कि दंगों के केस में- जिसमें गुजरात सरकार शक के दायरे में है- एमीकस क्यूरी होने के बावजूद साल्वे कुछ ‘दाग़ी’ पुलिस वालों को बचा रहे हैं.

प्रशांत भूषण

हालांकि कोर्ट ने इस आरोप को ख़ारिज़ करते हुए कहा, ‘आपका विश्वास मायने नहीं रखता. हमें साल्वे की निष्पक्षता पर पूरा भरोसा है.’

साल्वे ने मशहूर ‘हिट एंड रन’ मामले में सलमान ख़ान की पैरवी की. कोर्ट ने जब सलमान को आरोप से बरी कर दिया तो इसका पूरा श्रेय साल्वे को ही दिया गया.

8. पियानो बजाना पसंद है

1999 में एनडीए सरकार के समय उन्हें भारत का सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया गया. उस वक़्त उनकी उम्र 43 साल थी. वह 2002 तक इस पद पर रहे.

अपने कार्यकाल पर उन्होंने कहा था, ‘मैं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, मेरे दोस्त अरुण जेटली, मुरली मनोहर जोशी, अनंत कुमार, सुरेश प्रभु और तमाम लोगों से मिले स्नेह और समर्थन को हमेशा याद रखूंगा.’

साल्वे जब वकालत नहीं करते हैं तो क़ानून से जुड़ी दिलचस्प चीज़ें पढ़ते हैं. उन्हें दूसरे विश्व युद्ध पर चर्चिल के लेख बेहद पसंद हैं. वह दिल्ली के वसंत विहार के घर में अपनी बेटियों- साक्षी और सानिया के साथ वक़्त बिताना भी पसंद करते हैं. ख़ुद पियानो बजाते हैं और क्यूबा के जैज़ पियानिस्ट गोंज़ालो रूबालकाबा के ज़बरदस्त फ़ैन हैं.

निजी संपत्ति पर उनके विचार दिलचस्प हैं. वह कहते हैं, ‘मैंने एक चीज़ सीखी है कि कभी अपनी कामयाबी पर शर्मिंदा महसूस नहीं करना चाहिए. मैंने ये मेहनत से कमाया है. मैं यहां तक पहुंचने के लिए किसी की क़ब्र पर खड़ा नहीं हुआ.’

– इस लेख में हरीश साल्वे के कथन और बाक़ी तथ्य किताब ‘लीगल ईगल्स’ से लिए गए हैं. ‘रैंडम हाउस इंडिया’ से छपी यह किताब इंदु भान ने लिखी है.

कश्मीर में किसकी सुरक्षा कर रहे हैं भारतीय सुरक्षा बल?

श्रीनगर में कर्फ़्यू के बीचोंबीच कई महीने बिताने के बाद जब मैंने अपना पहला लेख लिखा और उसे अपने एक ख़ास दोस्त को पढ़ाया, तो वो मुझसे नाराज़ हो गया.

उसकी आपत्ति इस बात को लेकर कतई नहीं थी कि हम दोनों के बीच वैचारिक मतभेद हैं. उसकी आपत्ति इस बात से थी कि मैंने अपने लेख में ‘सुरक्षा बल’ शब्द इस्तेमाल किया.

एक बार को तो मुझे लगा कि मेरे 12 साल के पत्रकारिता के करियर के सामने यह एक बड़ा और उचित सवाल है, जो मेरे दोस्त ने उठाया है. मुझे लगा, शायद मेरे प्रशिक्षण से इस किस्म से सवाल गायब हो चुके हैं.

 

सवाल था कि किसकी सुरक्षा? उनका आरोप था कि ये शब्द उनके लिए इस्तेमाल हो रहा है जो स्थानीय कश्मीरियों को पीट रहे हैं, उनका उत्पीड़न कर रहे हैं और उन्हें मार भी रहे हैं- उनकी सुरक्षा?

आप देखेंगे कि किसी भी संघर्ष क्षेत्र में जब सशस्त्र बलों को उतारा जाता है, तो इस बात पर भी विवाद रहता है कि उसका मकसद क्या स्थानीय लोगों की सुरक्षा है. हां, यह ज़रूर है कि बार बार हिंसा और लंबे समय तक वहां रहने के बाद ये बल स्थानीय लोगों को ही दुश्मन के तौर पर देखने लगते हैं.

इस तथ्य को ध्यान में रखकर जब आप पूरी स्थिति पर नज़र घुमाते हैं, तो देखते हैं कि ऐसे तमाम शब्द मीडिया इस्तेमाल करता है जो आम नागरिकों के लिए संवेदनशून्य हैं. उन्हें लिखते वक़्त समुदायों का ज़रा भी ख़्याल नहीं रखा गया है.

यही नहीं, कई बार ये शब्द कई समुदायों का तिरस्कार भी करते हैं.

शब्दों का इस्तेमाल और कंडीशनिंग

लेकिन जिन शब्दों का स्वभाविक इस्तेमाल हम लोग करते हैं, वो काफ़ी हद तक हमारी कंडीशनिंग का परिणाम होते हैं.

सेना

मसलन, जब हिज़बुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की हत्या हुई, तो करीब 100 दिनों तक कश्मीर में हिंसा का एक दौर चला. इसके बाद पीपुल्स यूनियन ऑफ़ सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) की एक टीम तथ्यों को तलाशने के लिए दक्षिण कश्मीर के दौरे पर गई थी. मैं उस दौरे पर टीम के साथ सफ़र कर रही थी. यह वो इलाका था, जहां हिंसा के दौरान उच्चतम मृत्यु दर दर्ज की गई थी.

पंपोर के पास जब एक छोटे से गांव में हम लोग पहुंचे, तो हमारी मुलाक़ात एक लड़के से हुई. स्नातक की पढ़ाई कर रहे उस लड़के ने हमसे सवाल किया, “राष्ट्रीय राइफ़ल्स (आरआर) के अधिकारियों और जवानों ने उनके 30 वर्षीय लेक्चरर को हिरासत में लिया, जिनकी बाद में मौत की ख़बर आई. तो आप अब भी मानेंगे कि ये सुरक्षा बल हैं? किसकी सुरक्षा? ये हमारी सुरक्षा के लिए तो नहीं हैं.”

सेना

मेरे लेख पर मेरे पत्रकार साथी ने जो सवाल उठाए थे, उनके पीछे से मुझे पंपोर में मिले उस नौजवान की आवाज़ सुनाई दे रही थी.

एक ओर मेरा वो दोस्त था, जिसने कश्मीरी संघर्ष पर तमाम लेख पढ़े थे और वो इस विवाद पर तमाम विचारकों से चर्चा करता रहा था.

और दूसरी ओर वो स्थानीय लड़का था. दिलचस्प बात यह है कि कश्मीर के मुद्दे, विवाद और सुरक्षा बलों की तैनाती पर दोनों की समझ और निष्कर्ष लगभग एक समान थे.

सेना

लेकिन इन दोनों की राय को आप दिल्ली के किसी सीनियर पत्रकार से मिला कर देखेंगे, जो संघर्ष को कवर करता रहा है, तो पाएंगे कि वो अपनी कॉपी में या अपने बयान में सैन्य तैनाती को और फ़ौज को ‘सुरक्षा बल’ का पर्याय मानने लगे हैं.

मतभेद एक शब्द तक नहीं

‘सुरक्षा बल’ एकमात्र शब्द नहीं है, जिसके दो पक्ष हैं. ऐसा भी नहीं है कि यह चर्चा सिर्फ़ कश्मीर तक सीमित है.

भारतीय पत्रकार स्वदेशी लोगों के लिए आदिवासी शब्द का इस्तेमाल करते रहे हैं. जबकि, इस शब्द के इस्तेमाल को आपत्तिजनक माना जाता है.

और तो और, जो लोग भारत के मूल निवासियों के अधिकारों पर और उनके बचाव में लिखते हैं, वो भी आदिवासी शब्द से पीछा नहीं छुड़ा पाए हैं.

सेना

अब अगर आप लोकल में जाएं, तो आप पाएंगे कि समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाला स्थानीय मीडिया इस मामले में ज़्यादा ज़िम्मेदार और बेहतर है.

मसलन, जो नौजवान कश्मीर में सशस्त्र प्रतिरोध का हिस्सा हैं, उन्हें चरमपंथी या फिर विद्रोही कहने की बजाय दिल्ली का मीडिया ‘आतंकवादी’ कहता है. अब इसकी तुलना पंजाब से करें, तो पंजाब के विद्रोहियों को आतंकवादी नहीं, उग्रवादी कहा जाता था और अनेक लोग उनके विद्रोह को ‘पंजाब की मिलिटेंसी का दौर’ बताते हैं.

ऐसे में यह समझने की ज़रूरत है कि मीडिया जिस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल कश्मीर के लिए करता है, उससे कश्मीर के स्थानीय लोग लगातार भारत के ख़िलाफ़ हो रहे हैं या ख़िलाफ़ होने के लिए उकसाए जा रहे हैं.

आंदोलन या विद्रोह?

सेना

पिछले साल जब कश्मीर जल रहा था और हर दिन मौतों की संख्या बढ़ती जा रही थी, तो भारतीय मीडिया उसे ‘प्रदर्शन’ या ‘आंदोलन’ के रूप में संबोधित कर रहा था. जबकि स्थानीय लोगों की नज़र में यह एक ‘विद्रोह’ था.

स्थानीय लोगों की यह सोच स्थानीय मीडिया की कवरेज में दिखाई देती है.

लेकिन इस पर बात क्यों होनी चाहिए? यह बात महत्वपूर्ण क्यों है?

वो इसलिए कि जब कभी भी ‘डायलॉग’ होगा, कश्मीर मुद्दे को सुलझाने का संकल्प लिया जाएगा, तो उन मुद्दों को समझना होगा, जो कश्मीरी लोगों को प्रभावित करते हैं.

क्योंकि मसला यहां गरिमा का भी है. तो क्या हम दूसरों का सम्मान करने में सक्षम हैं? यह सोचने लायक है.

BREAKING: अंतरराष्ट्रीय अदालत ने जाधव की मौत की सज़ा पर रोक लगाई

हेग की अंतरराष्ट्रीय अदालत ने पाकिस्तान की जेल में बंद भारत के कुलभूषण जाधव की मौत की सज़ा पर रोक लगा दी है.

अदालत ने कहा कि जब तक उनके मामले में अंतिम फैसला नहीं आ जाता उन्हें फांसी नहीं दी जा सकती.

कुलभूषण जाधव को पाकिस्तान की सैन्य अदालत ने जासूसी के आरोप में फांसी की सज़ा सुनाई है.

जाधव की फ़ांसी टालने को लेकर भारत ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस यानी आईसीजे का दरवाज़ा खटखटाया था.

अदालत ने पाकिस्तान की उस आपत्ति को खारिज कर दिया कि ये मामला उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता. हांलाकि अदालत ने ये भी कहा कि इस पर मतभेद हैं.

अदालत ने भारत और पाकिस्तान के बीच संधियों का हवाला दिया और कहा कि कहा कि 1977 से ही भारत और पाकिस्तान वियना संधि का हिस्सा हैं.

जाधव के मामले में अदालत ने कहा कि जाधव को काउंसलर मदद मिलनी चाहिए.

मदरसा परीक्षा के टॉप 10 में आई हिंदू लड़की

पश्चिम बंगाल के खलतपुर हाई मदरसा की प्रशामा साशमल ने मदरसा के माध्यमिक स्कूल की परीक्षा में आठवां स्थान हासिल कर एक नया रिकॉर्ड बनाया है.

ये पहली बार है जब एक हिंदू लड़की ने राज्य से मान्यता प्राप्त मदरसा परीक्षाओं में टॉप 10 में जगह बनाई है.

परीक्षा के नतीजों की घोषणा मंगलवार को हुई थी.

कई बार मदरसा परीक्षाओं में हिंदू छात्रों की टॉप 10 में आने की ख़बरें आई हैं, लेकिन ये पहली बार है जब एक ग़ैर-मुस्लिम लड़की ने टॉप 10 में जगह बनाई है.

 

प्रशामा ने बीबीसी को बताया, “मैं ख़ुश हूं कि मुझे अच्छा रैंक मिला. मैंने सारी परीक्षाएं अच्छे से दी थीं और उम्मीद कर रही थी कि नतीजे और बेहतर होंगे. मेरे टीचर और माता-पिता भी मुझसे काफी ख़ुश हैं.”

राज्य से मान्यता प्राप्त मदरसों में छात्रों को अंग्रेज़ी, विज्ञान, गणित जैसे विषयों के साथ अरबी और ‘इस्लाम का परिचय’ भी पढ़ाया जाता है.

‘इस्लाम का परिचय’ विषय में प्रशामा को 100 में से 97 अंक मिले हैं. प्रशामा भौतिक शास्त्र में शोध करना चाहती हैं.

हिंदू धर्म से ताल्लुक रखते हुए अरबी और ‘इस्लाम का परिचय’ विषय पढ़ने के बारे में प्रशामा कहती हैं, “ये भी तो अन्य विषयों की ही तरह हैं. मुझे दूसरे सब्जेक्ट की तरह ये भी काफ़ी पसंद हैं. मैं कक्षा छह से इस मदरसे में पढ़ रही हूं और शुरू से ही टीचर्स ये सुनिश्चित करते थे कि हम सभी बच्चे इन दोनों विषयों को समझ पा रहे हैं या नहीं.”

प्रशामा के साथ पढ़ने वाले मलय माझी इस परीक्षा में 17वें स्थान पर रहे. वो भी हिंदू धर्म से ताल्लुक रखते हैं.

प्रशामा कहती हैं, “स्कूल में हिंदू और मुसलमान टीचर हैं और वो हमारा ख़्याल रखते हैं. मेरी कक्षा में हिंदू-मुसलमान सभी मेरे दोस्त हैं. हम आपस में खाना बांटते हैं और दोस्तों की ही तरह बातें करते हैं. हमारे बीच में कभी धर्म नहीं आया.”

पश्चिम बंगाल में इन मान्यता प्राप्त मदरसों में कई ग़ैर मुस्लिम बच्चे पढ़ते हैं. कई मदरसों में मुस्लिम बच्चों की संख्या ज़्यादा है.

वामपंथी दलों के कार्यकाल के दौरान राज्य में मदरसों में बड़े बदलाव किए गए थे.

देश के बाहर से, यहां तक कि पाकिस्तान से भी मदरसा शिक्षा व्यवस्था के बारे में जानने के लिए कई मेहमान आते हैं.

प्रशामा के मदरसे के हेडमास्टर नुरुल इस्लाम कहते हैं, “वो दिन चले गए जब लोग सोचते थे कि मदरसे केवल मुसलमानों के लिए ही हैं. स्कूल हो या मदरसा, जहां भी अच्छी शिक्षा मिलती है, अभिभावक अपने बच्चों को वहीं भेजते हैं.”

वो कहते हैं, “इस साल कुल 33 बच्चों ने मदरसा परीक्षा दी जिसमें ले नौ ग़ैर-मुसलमान हैं. उनमें से दो ने टॉप 20 में जगह बनाई.”

मदरसा शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों का कहना है कि बीते सालों की तुलना में परीक्षा देने वालों में हिंदू छात्रों की संख्या में इस साल इज़ाफा हुआ है.