मोदी सरकार से जनता पूछ रही है ये 30 सवाल

नरेंद्र मोदी की भारी जीत के तीन साल पूरे होने के मौक़े पर बीबीसी हिंदी ने अपने पाठकों से पूछा कि उनके मन में क्या सवाल हैं, जिनके जवाब वो जानना चाहते हैं.

बीबीसी हिंदी को बड़ी तादाद में लोगों के सवाल मिले हैं जिनमें से सबसे ज़्यादा सवाल रोज़गार के अवसरों को लेकर हैं.

तीन साल के कामकाज से जुड़े ये रहे वे 30 सवाल जिनके जवाब लोग चाहते हैं.

1. सरकार ने हर साल दो करोड़ नौकरियाँ देने का वादा किया था, इस वादे का क्या हुआ?

2. मोदी सरकार की ऐसी कौन सी योजना है जो पिछले तीन साल में सफल रही है?

3. जम्मू कश्मीर में कब शांति स्थापित होगी? इसके लिए सरकार की क्या योजना है?

मोदी समर्थक, बीजेपी समर्थक

4. उच्च शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए सरकार की क्या नीति है, ख़ास तौर पर विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के मामले में.

5. विपक्ष में रहते हुए मोदी जी ने तब की सरकार पर भ्रष्टाचार के कई आरोप लगाए थे, उनमें किसी को सज़ा क्यों नहीं हुई?

6. प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए सरकार ने अब तक क्या किया है?

7. पाकिस्तान से निबटने की सरकार की क्या नीति है?

8. मोदी सरकार ने देश के युवाओं के लिए अब तक क्या किया है?

9. सरकार जिस तरह स्मार्ट सिटी की बात करती है, उस तरह स्मार्ट गाँवों की बात क्यों नहीं करती?

मोदी समर्थक, बीजेपी समर्थक

11. सरकार विदेशों से काला धन लाने में क्यों नाकाम रही? इस दिशा में उसने अब तक क्या काम किया?

12. गौरक्षकों के हाथों बेकसूर लोगों के मारे जाने के बाद सरकार इस तरह की घटनाओं की खुलकर निंदा क्यों नहीं करती?

13. मेक इन इंडिया और डिजिटल इंडिया के बारे में हमने इतनी बातें सुनीं, लेकिन उनका कोई असर क्यों दिखाई नहीं देता?

14. नोटबंदी करके सरकार ने आख़िर क्या हासिल किया?

15. मोदी सरकार ने विदेश से पूंजी लाने की बात कही थी, मोदी जी ने कई देशों का दौरा किया था, उसका आख़िर क्या परिणाम निकला, कितना विदेशी निवेश आया?

बीबीसी पाठकों के सवाल

16. सरकार राम मंदिर का निर्माण कब तक कराएगी?

17. बीफ़ के एक्सपोर्ट पर सरकार रोक क्यों नहीं लगाती?

18. सरकार ने बड़ी कंपनियों को बहुत सारी रियायतें दी हैं लेकिन देश के ग़रीबों के लिए उसने क्या किया है?

19. सैनिकों और सुरक्षा बलों की सीमा पर लगातार हो रही हत्याओं को रोकने के लिए सरकार क्या कर रही है?

20. नक्सलवाद की समस्या से निबटने के लिए सरकार ने अब तक क्या ठोस कदम उठाए हैं?

21. चीन के बढ़ते दबदबे से निबटने के लिए सरकार की क्या रणनीति है?

बीबीसी पाठकों के सवाल

22. सरकार बढ़ती आबादी को नियंत्रित करने के लिए कुछ क्यों नहीं कर रही है?

23. चारों ओर पहले जितनी ही गंदगी दिखाई देती है, स्वच्छ भारत में सिर्फ़ प्रचार हुआ या कुछ ठोस उपलब्धि भी है?

24. रेलवे का किराया और तरह-तरह के शुल्क बढ़ रहे हैं लेकिन रेलों की हालत क्यों नहीं सुधर रही है?

25. मोदी सरकार के कार्यकाल में नेपाल के साथ संबंध बिगड़ गए, नेपाल अब चीन की ओर झुक रहा है, सरकार इस दिशा में क्या कर रही है?

26. क्या मोदी सरकार के कार्यकाल में भ्रष्टाचार में कुछ कमी आई है?

मोदी समर्थक, बीजेपी समर्थक

27. दलितों के साथ लगातार हो रही हिंसा की घटनाओं को रोकने के लिए सरकार ने अब तक क्या किया है?

28. मुसलमानों के लिए देश के वातावरण को सुरक्षित बनाने के लिए सरकार ने अब तक कोई क़दम क्यों नहीं उठाया है?

29. सरकार स्किल्ड इंडिया की बात कर रही है, जो स्किल्ड हैं उन्हें ही नौकरी नहीं मिल रही तो स्किल्ड इंडिया के तहत नया हुनर सीखने वालों के लिए रोज़गार कहाँ से आएगा?

30. मुस्लिम महिलाओं को ट्रिपल तलाक से निजात दिलाने की कोशिश कर रही सरकार ये बताए कि मुस्लिम महिलाओं के शिक्षा और स्वास्थ्य को लेकर सरकार कितनी चिंतित है?

सोशल: मोदी सरकार से लोगों ने पूछा, अच्छे दिन, नौकरी बिन?

मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर उनके वादों की जांच-पड़ताल जारी है. इस बीच सबसे ज़्यादा बात जिस वादे की हो रही है वह है नौकरी और रोज़गार.

आम चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने देश में हर साल 2 करोड़ नौकरियां देने का वादा किया था, लेकिन आज ज़मीनी सच्चाई इससे दूर नज़र आती है. ट्विटर पर ‘#अच्छे दिन नौकरी बिन’ ट्रेंड कर रहा है. लोग इस पर काफ़ी बातें कर रहे हैं. रिपोर्ट्स की मानें तो आईटी सेक्टर में 2 लाख लोगों की नौकरियां जाने वाली हैं और महिलाओं के नौकरी छोड़ने की दर में भी इज़ाफ़ा हुआ है.

‘तीन साल में टूटी आस…और चलो मोदी के साथ’

तीन साल के जश्न में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस तो करें मोदी

ऐसे में सोशल मीडिया पर लोग खुलकर अपने ग़ुस्से का इज़हार कर रहे हैं.

काकावाणी नाम के ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया गया,”मोदी के तीन सालों में शिक्षा के नाम पर निकर हाफ़ से फ़ुल की गई, निंदा नाम की मिसाइल बनाई गई और गौरक्षा नामक रोजगार दिया गया.”

सेकुलर बाबा नाम के ट्विटर यूजऱ ने लिखा,”अगर एक लाइन में मोदी सरकार के बारे में बताना हो तो कहेंगे,”भोली सूरत दिल के खोटे, नाम बड़े और दर्शन छोटे.”

आशीष ने लिखा,”मैंने चाय बेची, अब सभी युवाओं से चाय बिचवाऊंगा और सबको प्रधानमंत्री बनवाऊंगा.”

नरेंद्र मोदी, बीजेपी, प्रधानमंत्री

हालांकि कुछ लोगों का यह भी मानना है कि जनता को सब्र करने की ज़रूरत है. देव राजपुरोहित ने ट्वीट किया,”आपने नेता चुना है, जादूगर नहीं. कृपया थोड़ी और प्रतीक्षा करें.”

द फोकट गाय नाम के ट्विटर यूज़र ने चुटकी ली,”अच्छे दिन नौकरी बिन, हम इसकी कड़ी निंदा करते हैं.”

नरेंद्र मोदी, बीजेपी, प्रधानमंत्री

अनिल कुमार यादव ने लिखा,”अच्छे दिन भी मिस्टर इंडिया के अनिल कपूर की तरह होते हैं. जब होते हैं तब दिखाई नहीं देते और जब नहीं होते हैं तब शोर ही शोर.”

नरेंद्र मोदी, बीजेपी, प्रधानमंत्री

संजय माने ने बीबीसी के फ़ेसबुक पेज पर कहा,”बीजेपी बोलने में विश्वास करती है, करने में नहीं. जो लोगों को कालाधन न दे सकी, वो नौकरियां क्या देगी. नौकरियां तो देंगे अभी तो तारीख़ तय नहीं कर सके.”

नरेंद्र मोदी, बीजेपी, प्रधानमंत्री

अंकिता सिंह ने कहा,”क्या बेवकूफ़ी है. दो करोड़ नौकरियां? जॉब पैदा करने से नहीं बल्कि जो जॉब हैं उन्हीं में सेलेक्शन पाने से होगा.” मोहम्मद उजैर ने लिखा,”हम सब बेवकूफ़ हैं. अमित शाह जी पहले ही कह चुके हैं कि अच्छे दिन एक जुमला था.”

लखनऊ : सड़क किनारे मिली IAS ऑफिसर की बॉडी, लोगों की सूचना पर पहुंची पुलिस

खास बातें

  1. मृतक आईएएस 2007 बैच के कर्नाटक कैडर के अधिकारी थे
  2. मूल रूप से यूपी के बहराइच के रहने वाले थे
  3. दो दिनों से लखनऊ के एक गेस्‍ट हाउस में ठहरे थे

लखनऊ: भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के एक अधिकारी की बुधवार सुबह राजधानी लखनऊ में एक सड़क किनारे बॉडी मिलने से प्रशासनिक अमला सकते में आ गया है. पुलिस ने इसको ‘रहस्‍यमय परिस्थितियों’ में मौत कहा है. मृतक आईएएस अधिकारी अनुराग तिवारी 2007 बैच के कर्नाटक कैडर के आईएएस थे. वह यूपी के ही बहराइच के रहने वाले थे.

पुलिस के मुताबिक उनकी बॉडी हजरतगंज इलाके में मीरा बाई गेस्‍ट हाउस के पास मिली है. कहा जा रहा है कि वह पिछले दो दिनों से यहां ठ‍हरे थे. सबसे पहले सड़क से गुजरते कुछ राहगीरों ने बॉडी को सड़क किनारे देखा और पुलिस को सूचित किया. ऑफिसर की पहचान उसके आई-कार्ड से हुई है. बॉडी को पोस्‍टमार्टम के लिए अस्‍पताल ले जाया गया है. विस्‍तृत विवरण की प्रतीक्षा है.

हजरतगंज के पुलिस निरीक्षक एके शाही ने बताया कि शुरुआती जांच में तिवारी के जबड़े के पास चोट के निशान पाये गये हैं. इसके अलावा उनके शरीर पर कोई चोट नहीं दिखी है. शव को पोस्टमार्टम के लिये भेज दिया गया है. मामले की जांच जारी है.

उत्तर प्रदेश: योगीराज में क़ानून की व्यवस्था या अव्यवस्था?

भारतीय जनता पार्टी ने दो महीने पहले विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत पाने के बाद आदित्यनाथ योगी को एक मज़बूत और सख़्त प्रशासक के तौर पर पेश करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री बनाया.

दावा किया गया कि क़ानून को हाथ में लेने की किसी को इजाज़त नहीं दी जाएगी और ऐसा करने वालों से सख़्ती से निपटा जाएगा.

हालांकि यही दावा तो विधानसभा में मुख्यमंत्री ने भी किया, लेकिन क़ानून व्यवस्था की स्थिति पिछले दो महीने से लगातार बिगड़ती ही दिख रही है.

पिछले दो दिनों से उत्तर प्रदेश में क़ानून व्यवस्था को लेकर विधानसभा से लेकर सड़क तक हंगामा मचा हुआ है, लेकिन अपराध के मामले किसी दिन कम नहीं हो रहे हैं.

सोमवार रात मथुरा में आभूषण व्यवसायियों के यहां डकैती और दो लोगों की मौत ने मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी को भी चिंतित कर दिया है.

विधानसभा में मुख्यमंत्री ने क़ानून व्यवस्था को ठीक रखने का आश्वासन दिया, लेकिन विपक्षी दल सरकार को इस मुद्दे पर घेरते रहे.

जानकारों का कहना है कि पिछले दो महीने में हत्या और बलात्कार के अलावा लूट और डकैती की घटनाएं भी बढ़ी हैं जो अब कम ही सुनने में आती थीं.

सोमवार को मथुरा में सर्राफ़ा व्यापारी के यहां डकैती और दो लोगों की मौत की घटना से पहले भी वाराणसी और लखनऊ में भी सर्राफ़ा व्यापारियों के यहां से दिन में ही करोड़ों रुपए लूट लिए गए थे.

मथुरा की घटना को गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री ने जांच के आदेश दिए और राज्य के पुलिस महानिदेशक बुधवार को वहां का दौरा कर रहे हैं.

यही नहीं, बीजेपी कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच लगातार हो रही झड़पें भी सरकार के लिए सिरदर्द बनी हुई हैं और अब तक दो पुलिसकर्मियों की हत्या भी हो चुकी है.

धर्मांतरण के नाम पर

पुलिस के पिटने की घटना तो जैसे आम हो गई है.

चाहे मेरठ में बीजेपी नेताओं के पुलिस को पीटने का मामला हो या फिर फ़तेहपुर सीकरी में हिंदू संगठन के लोगों का थाने पर हमला बोलना और पुलिस अधिकारियों तक पर हाथ उठाना.

गोरखपुर में चर्च में प्रार्थना को धर्मांतरण के नाम पर रुकवा देना या फिर कथित लव जिहाद के नाम पर हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ताओं का क़ानून हाथ में लेना योगी सरकार की क़ानून व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रहा है.

सहारनपुर में एक महीने के भीतर हिंसा की तीन घटनाएं पुलिस अधिकारियों को हटाने के बावजूद कम नहीं हुईं.

स्थिति ये है कि शहर आज भी सुलग रहा है. पुलिस दावा कर रही है कि सब शांत है, लेकिन तनाव क़ायम है.

समाजवादी पार्टी का प्रदर्शन

विधानसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपराध को लेकर सपा सरकार पर जम कर हमला बोला था, लेकिन अब समाजवादी पार्टी को मौक़ा मिल गया है.

पार्टी प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी कहते हैं, “अभी सरकार बने हुए दो महीने भी नहीं हुए हैं और चारों तरफ़ अराजकता का माहौल है. हर व्यक्ति को यही चिंता है कि उसकी जान और संपत्ति अगले पल सुरक्षित है या नहीं. क़ानून व्यवस्था के मामले में ये सरकार बिल्कुल फ़ेल साबित हुई है.”

वहीं जानकारों का कहना है कि सबसे चिंताजनक बात पुलिस पर बढ़ रहे लगातार हमले हैं.

पिछले दो महीने में कई पुलिस वालों की भी मौत हो चुकी है और कई पुलिस अधिकारियों को बीजेपी नेताओं से अपमानित होना पड़ा है.

कार्यकर्ताओं पर लगाम भी समस्या

उत्तर प्रदेश में आईपीएस एसोसिएशन ने भी इस मामले को गंभीरता से लिया है और पिछले दिनों मुख्य सचिव से इसकी शिकायत की गई थी.

एसोसिएशन के महासचिव प्रकाश डी ने बीबीसी को बताया, “हमने यही कहा कि फ़ील्ड में अधिकारियों के साथ जो दुर्व्यवहार हो रहा है उस पर सरकार ग़ौर करे ताकि पुलिस वालों का मनोबल न प्रभावित हो.”

फ़िलहाल विधानसभा का सत्र चल रहा है और क़ानून व्यवस्था को लेकर उम्मीद है कि आज भी विपक्ष हमलावर रहेगा.

वहीं मुख्यमंत्री योगी ने सरकार के 100 दिन पूरा होने पर रिपोर्ट कार्ड जारी करने की बात कही है, लेकिन जानकारों का कहना है कि क़ानून व्यव्यवस्था के मौजूदा हालात जैसे हैं, उसमें सरकार का पास होना मुश्किल है.

साइबर फ़िरौती वाला बिटकॉयन क्या है?

फ़िरौती वसूलने वाले रैनसमवेयर वायरस वानाक्राई ने दुनिया भर में दो लाख से ज़्यादा कम्प्यूटरों को अपना शिकार बनाया है.

ये वायरस किसी नेटवर्क में दाखिल होने के बाद कम्प्यूटरों की फ़ाइल को बिना आपकी मंज़ूरी के लॉक कर देता है और फिर इसे अनलॉक करने के लिए टारगेट से फ़िरौती मांगी जाती है.

फ़िरौती की रकम ई-वॉलेट्स में वर्चुअल करेंसी के रूप में मांगी जा रही है.

और मीडिया रिपोर्टों में इस वर्चुअल करेंसी के तौर पर बिटकॉयन का नाम लिया जा रहा है.

क्या है बिटकॉयन

  • बिटकॉयन एक वर्चुअल मुद्रा है जिस पर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं हैं.
  • इस मुद्रा को किसी बैंक ने जारी नहीं किया है.
  • चूंकि ये किसी देश की मुद्रा नहीं है इसलिए इस पर कोई टैक्स नहीं लगता है.
  • बिटकॉयन पूरी तरह से एक गुप्त करेंसी है और इसे सरकार से छुपाकर रखा जा सकता है.
  • साथ ही इसे दुनिया में कहीं भी सीधा ख़रीदा या बेचा जा सकता है.
  • शुरुआत में कंप्यूटर पर बेहद जटिल कार्यों के बदले ये क्रिप्टो करेंसी कमाई जाती थी.
  • चूंकि ये करेंसी सिर्फ़ कोड में होती है इसलिए न इसे ज़ब्त किया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है.
  • एक अनुमान के मुताबिक इस समय क़रीब डेढ़ करोड़ बिटकॉयन प्रचलन में है.
  • बिटकॉयन ख़रीदने के लिए यूज़र को पता रजिस्टर करना होता है.
  • ये पता 27-34 अक्षरों या अंकों के कोड में होता है और वर्चुअल पते की तरह काम करता है. इसी पर बिटकॉयन भेजे जाते हैं.
  • इन वर्चुअल पतों का कोई रजिस्टर नहीं होता है ऐसे में बिटकॉयन रखने वाले लोग अपनी पहचान गुप्त रख सकते हैं.
  • ये पता बिटकॉयन वॉलेट में स्टोर किया जाता है जिनमें बिटकॉयन रखे जाते हैं.

वर्चुअल करेंसी बिटकॉयन की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसी साल मार्च में इसकी कीमत पहली बार एक आउंस सोने की कीमत से ज़्यादा हो गई थी.

दो मार्च को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में एक बिटक्वायन 1268 डॉलर पर बंद हुआ था, जबकि एक आउंस सोने की क़ीमत 1233 डॉलर पर थी.

हालांकि कई विशेषज्ञों ने इस वर्चुअल करेंसी के भविष्य पर भी सवाल उठाए हैं.

‘तीन साल में टूटी आस…और चलो मोदी के साथ’

16 मई, 2017 को केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए. इस मौके पर मीडिया में बीजेपी के तीन सालों का लेखा-जोखा चलता रहा और लोग भी अपनी राय देते रहे.

तीन साल के जश्न में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस तो करें मोदी

मोदी के तीन साल: विपक्ष ने कहा, फ़ेल है सरकार

बीजेपी समर्थकों ने ट्विटर पर #3SaalBemisal ट्रेंड चलाया और फ़ेसबुक पर भी मोदी सरकार के कामकाज की खूब चर्चा हुई.

कैलाश मेहरा ने लिखा,”तीन साल मेँ टूटी आस…और चलो मोदी के साथ, ना रोज़गार ना विकास, बस महँगाई और बकवास, सबके साथ समान विनाश…बस भाषण और मन की बात.”

नरेंद्र मोदी, बीजेपी

अग्रवाल गणेश ने लिखा,”मोदी सरकार का सबसे बड़ा काम आज़ादी के बाद बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ. मानवता को बचाने में मोदी सरकार की पहल काबिलेतारीफ़ है.”

ज़ाकिर खान ने कहा,”इन तीन सालों में विश्व भ्रमण कर लिया है. बस अंटार्कटिक रह गया है. अब देखो वहां कब जाते हैं. ग्रेट जॉब सर, अपने पीएम को मेरा सलाम.”

फ़ेसबुक

रविकांत दुबे ने लिखा,”जो लोग नहीं बोल रहे हैं वो सिर्फ़ ये जवाब दें कि मोदी जी नहीं तो कौन? मैं ना बीजेपी सपोर्टर हूं और ना मोदी सपोर्टर. बस इतना जानता हूं कि आज उपलब्ध विकल्पों में मोदी जी बेस्ट हैं. उन्होंने इन तीन सालों में देश की तरक्की के लिए दिन-रात मेहनत की.”

नरेंद्र मोदी, बीजेपी

मनोज कुमार ने कहा,”15 लाख में 5 लाख आपके…बाकी दे दो प्लीज़. हमको पता है कि गांव का प्रधान भी कोई काम करवाने के लिए कमीशन लेता है, लेकिन आप पांच लाख रुपयों को पार्टी फ़ंड में डाल देना. बाकी 10 लाख काफ़ी हैं…नोटबंदी के टाइम पर जो कुछ इधर-उधर करवाया, वो भी आपका ही…पर 10 लाख तो…?”

फ़ेसबुक

राहुल कुमार ने कहा,”मैं खुश हूं कि सिर्फ़ 2 साल बचे हैं. इससे ज़्यादा खुशी मैं बयान नहीं कर सकता.”

विनोद ने कहा,”हमारी उम्मीदें छोड़िए साहब. जो वायदे मेनिफ़ेस्टो में किए थे, उनका क्या हुआ? इसका विश्लेषण स्वयं करें. कुछ नहीं हुआ बल्कि विपरीत हुआ.”

विनेश के चौधरी ने कहा,”वादे बड़े थे, हमने समर्थन किया. सोचा कुछ नया होगा. दो साल और सही, हो सकता है कोई और वजह मिल जाए फिर से लाने की. भाजपा का समर्थक हूं, मोदी सरकार का नहीं.”

‘मोदी जी, मां को तो नहीं समझे, मुल्क की तो सोचें’

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के लापता छात्र नजीब के केस की जांच अब दिल्ली पुलिस की जगह केंद्रीय जांच ब्यूरो करेगी.

मंगलवार को दिल्ली हाई कोर्ट ने नजीब अहमद के ग़ायब होने के मामले की जांच सीबीआई को करने के लिए कहा.

नजीब अहमद बीते साल 15 अक्टूबर से लापता हैं. कोर्ट ने कहा है कि सीबीआई की ओर से की जाने वाली जांच की निगरानी डीआईजी स्तर के अधिकारी करेंगे.

कोर्ट ने ये आदेश नजीब की मां फ़ातिमा नफ़ीस की याचिका पर सुनाया है. इस आदेश को लेकर फ़ातिमा का क्या कहना है, पढ़िए.

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‘नजीब को ढ़ूढ़ने में प्रशासन लापरवाह’

फ़ातिमा के मन की बात

हमने तो कोर्ट से इससे कुछ ज़्यादा की मांग की थी. कोर्ट की देखरेख में अच्छे अधिकारियों की एक टीम बनाई जाए जो किसी के दबाव में न हो.

लेकिन कोई बात नहीं, हमें कोर्ट पर भरोसा है. कोर्ट ने जो आदेश दिए हैं वो बेहतर हैं. सीबीआई अच्छे से काम करे मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. मुझे मेरा बेटा चाहिए.

अगर क्राइम ब्रांच ने सही से काम किया होता तो ये नौबत नहीं आती. लेकिन मुझे ख़ुदा पर भरोसा है.

सच्चाई की जीत होती है. इंशा अल्लाह मेरा बच्चा जहां कहीं भी, जिसके पास भी है, उसने किस वजह से रखा है, मुझे नहीं मालूम.

सीबीआई से मांग

मेरा दिल कहता है कि मेरा बच्चा जहां भी है सुरक्षित है और सीबीआई अब ढूंढकर लाएगी.

अगर मेरे पास कोई जानकारी होती तो क्या मैं भटक रही होती? मैं सिसक रही होती?

मैं हर लम्हा अपने बच्चे के लिए यही दुआ करती रहती हूं कि मेरा बच्चा जहां भी हो अल्लाह की हिफ़ाज़त में हो.

जेएनयू के साथियों के साथ हम सीबीआई के प्रमुख से गुरुवार को मिलेंगे.

हालांकि अभी वक्त तय नहीं हुआ है. सीबीआई से यही मांग होगी कि जल्दी से जल्दी मेरे बच्चे को लाया जाए.

राजनाथ से गुहार

जो गुनहगार हैं, उनसे सवाल किए जाएं. उन्हें इस तरह कैसे छोड़ा जा सकता है?

लोग मुझसे ये सवाल करते हैं कि आपने पुलिस से शिकायत नहीं की? मैं क्या जवाब दूं उन लोगों को?

मैं कैसे समझाऊं उन लोगों को कि मैं हर मुमकिन कोशिश कर चुकी हूं. जिस तरह से कर सकती थी, किया.

मैं यही उम्मीद करती हूं कि सीबीआई को दो महीने का वक्त मिला है. वो मेरे और मेरे बच्चे के हक में जानकारी लेकर आएंगे. हो सकता है वो मेरे बच्चे को ले ही आएं.

मैं राजनाथ सिंह से मिली थी. उन्होंने कहा था कि हमने एसआईटी बनाई है. वो काम कर रही है. वो एसआईटी फ़ेल हो गई. क्राइम ब्रांच फ़ेल हो गया.

सुषमा से अपील

जो चीज़ें सरकार के अधीन हैं, अगर वो फ़ेल हो रही हैं तो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी है.

अब यही साबित करना है कि क्या सरकार चाहती है कि मेरा बच्चा सामने लाया जाए? अगर चाहती है तो ज़रूर लाया जाएगा वो.

मैंने किसी से कोई मदद नहीं ली है. केजरीवाल बेचारे की कोई औकात नहीं जो मेरी मदद कर सके किसी भी तरह से.

मेरी मदद बंदायू के सांसद धर्मेंद यादव ने की जिन्होंने दिल्ली आकर प्रदर्शन किया. डीयू के बच्चे, अलीगढ़ के बच्चे, जेएनयू के बच्चे यही मेरे अपने हैं.

मदद चाहिए थी तो हुकूमत से चाहिए थी जिसने आज तक वक्त नहीं दिया मिलने का. सुषमा स्वराज को मैंने हज़ारों ट्वीट किए. वो विदेशों से लोगों को छुड़ाती हैं.

नंबर एक यूनिवर्सिटी

अपने देश में क्या हो रहा है, वो ये नहीं देख रही हैं. कितनी बार मैंने उनसे मिलने की कोशिश की. कितनी बार ट्वीट कराया अपने बच्चों से. मोदी जी से मिलने की कोशिश की.

मैंने योगी जी से मिलने के लिए नौ अप्रैल को मेल कराया. मेरी बात का जवाब कोई क्यों नहीं देना चाहता. नजीब के मामले में सब चुप क्यों हो जाते हैं?

नजीब एक हिंदुस्तानी है. देश की नंबर एक यूनिवर्सिटी से उसका ताल्लुक है. वो यहां का छात्र है. क्या इनकी ज़िम्मेदारी नहीं है? विदेशों से यहां लोग पढ़ने आते हैं.

क्या ये हमारे देश की बदनामी नहीं है? एक मां को नहीं समझें. कम से कम अपने मुल्क के बारे में ही सोच लें. मेरा परिवार तितर-बितर हो गया है. मैं कभी दिल्ली होती हूं, कभी बदायूं होती हूं.