ऑपरेशन क्लीन मनी: केन्द्र सरकार ने लॉन्च की वेबसाइट, डिफॉल्टर्स की सारी जानकारी होगी ऑनलाइन

केन्द्र सरकार ने टैक्स चोरी और कालेधन के खिलाफ ऑपरेशन क्लीन मनी के तहत मंगलवार को एक वेबसाइट लॉन्च की है। इस वेबसाइट पर सरकार इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के छापेमारी की रिपोर्ट सार्वजनिक करेगी। वेबसाइट में उस प्रक्रिया की पूरी जानकारी दी जाएगी जिससे टैक्स ना देने वाले लोगों की पहचान की गई थी।

वहीं नोटबंदी के बाद से देशभर में टैक्स देने वाले लोगों की संख्या में 91 लाख की वृद्धि हुई है। सेंट्रल बोर्ड फॉर डायरेक्ट टैक्सेस (सीबीडीटी) के चेयरमैन सुशील चंद्रा ने बताया कि नोटबंदी के बाद से 19,398 करोड़ की अघोषित आय का पता लगा है। इतना ही नहीं 30 करोड़ नए पैन जारी किए गए हैं।

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इस वेबसाइट में जिन लोगों के खिलाफ एक्शन लिया जाएगा, उन्हें कैटगिरी में बांटा गया है। जिसमें हाई रिस्क, मीडियम रिस्क, लो रिस्क और वेरी लो रिस्क जैसी कैटेगिरी शामिल है। हाई जिन लोगों के खिलाफ छापेमारी की कार्रवाई, जब्ती और सीधी पूछताछ की जाएगी ऐसे लोगों को हाई रिस्क लेवल में शामिल किया जाएगा। मीडियम रिस्क वाले लोगों को एमएमएस या ईमेल के जरिए जरूरी जानकारी देने को कहा जाएगा। वहीं वेरी लो रिस्क की कैटेगरी वाले डिफॉल्टर्स पर निगरानी रखी जाएगी।

तीन साल के जश्न में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस तो करें मोदी

देश मौनमोहन सिंह की चुप्पी से परेशान था, मोदी ने सन्नाटे को झन्नाटे के साथ तोड़ा, ‘सिंह गर्जना’ करने वाले नेता को जनता ने प्रधानमंत्री चुना.

लोगों को विश्वास दिलाया गया कि अगर पाकिस्तान गुस्ताख़ी करेगा, देश पर भीतर से या बाहर से हमले होंगे तो शेर ऐसा दहाड़ेगा कि सबकी बोलती बंद हो जाएगी.

भारी बहुमत से चुनाव जीते उन्हें तीन साल हो गए हैं, इन तीन सालों में लोग कंफ्यूज़ हो गए हैं कि वे न जाने कब किसकी बोलती बंद करे दें और कब अपनी बोलती बंद कर लें?

पहले अख़लाक, नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे मुद्दों पर लोग उनकी राय सुनने को तरस गए. अब सुकमा में हमला हुआ, कश्मीर सुलगता रहा, लेकिन पीएम नहीं बोले, दो भारतीय सैनिकों की अपमानजनक हत्या हुई, लेकिन पीएम के ज़ोरदार बयान का इंतज़ार ही रहा.

नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक के दौर में सरकार और उसके मुखिया की जगह बोलने वाली एक अदृश्य ताक़त उभरी जिसका नाम है ‘सूत्र’, आजकल प्रधानमंत्री और उनके मंत्रियों से ज़्यादा ‘सूत्र’ ही बोल रहा है, ख़ास तौर पर सरकार की ज़ोरदार कामयाबियों के बारे में.

अख़लाक की हत्या के बाद, लोग अनुभव से समझने लगे हैं कि गोरक्षकों के बढ़ते हमलों, पहलू ख़ान की हत्या और सहारनपुर की जातीय हिंसा को इतना गंभीर नहीं माना जाएगा कि पीएम उन पर बोलें.

ये आरोप ग़लत होगा कि पीएम जनता से संवाद नहीं करते. लगभग हर बार उनके ‘मन की बात’ वही होती है जो बाक़ी लोगों के मन में न हो. वे ‘मन की बात’ के ज़रिए लोगों को बताते हैं कि जनता का क्या सोचना राष्ट्रहित में होगा.

पीएम ने शायद पहला डेढ़ साल बोलने और विदेश यात्राओं के लिए तय किया था, अब वे शांति से काम कर रहे हैं तो लोग पूछ रहे हैं कि वे बोल क्यों नहीं रहे हैं? जब बोल रहे थे तो लोग कह रहे थे काम क्यों नहीं करते, इतना क्यों बोलते हैं?

बात केवल पीएम की ही नहीं है, बात-बेबात और पर्याप्त बोलने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी भ्रष्टाचार के आरोप लगने के बाद से मौन व्रत पर हैं.

माता और पुत्र की आवाज़ सुने तो न जाने कितना अरसा गुज़र गया, यहाँ तक कि दिग्विजय सिंह भी नहीं बोल रहे हैं, लालू भी चारा घोटाले की साज़िश का केस खुलने के बाद से चुप ही हैं. और तो और योगी आदित्यनाथ भी सहारनपुर पर कुछ नहीं कह रहे.

कुल मिलाकर देश में सन्नाटा है. देश के नेता चुनाव के पहले और अभिनेता फ़िल्म रिलीज़ होने से पहले बोलते हैं यानी अपनी ज़रूरत के हिसाब से, जनता की ज़रूरत के हिसाब से नहीं.

सिर्फ रिट्वीट कर रहे हैं केजरीवाल, ख़ुद क्यों ख़ामोश हैं?

जनता के हिसाब से सवाल उसके नुमाइंदे ही पूछ सकते हैं. सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता और पत्रकार अपने पाठकों-दर्शकों के नुमाइंदे के तौर पर सवाल पूछते हैं, उनके सवालों के जवाब देना लोकतांत्रिक नेताओं की ज़िम्मेदारी मानी जाती है.

पिछले तीन साल में पीएम ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है, अलबत्ता एक बार कुछ पत्रकारों को ‘सेल्फ़ी विद पीएम’ के लिए ज़रूर बुलाया गया. अपनी पसंद के दो विदेशी चैनलों और इक्का-दुक्का देसी मीडिया संस्थानों को उन्होंने इंटरव्यू दिया है, जो एकालाप की ही तरह थे.

सरकार अपनी तीन साल की कामयाबियों पर सैकड़ों करोड़ रुपए के विज्ञापन देगी, लेकिन वह पत्रकारों के सवालों के जवाब देने को तैयार नहीं है. प्रधानमंत्री ने अपनी विदेश यात्रों में पत्रकारों को ले जाना बंद कर दिया है जो एक स्वागत योग्य क़दम है, जिसे स्टोरी कवर करनी हो वह अपने ख़र्च पर जाए और अपना काम करे.

लेकिन पत्रकारों को सवाल पूछने का कोई मौक़ा नहीं देना स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी किसी तरह नहीं माना जा सकता.

संसद में सवालों के जवाब देने के मामले में मोदी का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है, वे जवाब देने की जगह भाषण देने में ज़्यादा सहज महसूस करते हैं. उन्हें ‘मन की बात’ करने और राजनीतिक सभाओं में बोलने में आनंद आता है, जहाँ सवाल न पूछे जाएँ, जहाँ टोका-टाकी न हो.

दुनिया के हर सुचारु लोकतंत्र में पीएम या सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति से उम्मीद की जाती है कि वह डेमोक्रेसी की अनिवार्य शर्त फ़्री-प्रेस और संसद की छानबीन के रास्ते बंद नहीं करेगा.

मसलन, ब्रिटेन में अगर सत्र चल रहा हो तो प्रधानमंत्री को हर बुधवार दोपहर सांसदों के सवालों के जवाब देने के लिए हाज़िर होना पड़ता है, यहाँ तक कि पीएम की विदेश यात्रा में इसका ध्यान रखा जाता है कि ‘पीएम क्वेश्चन टाइम’ को टाला न जाए.

इसी तरह व्हाइट हाउस में साप्ताहिक प्रेस ब्रीफ़िंग होती है, ज़रूरत पड़ने पर बीच में भी, जिसमें राष्ट्रपति के प्रेस सेक्रेटरी या दूसरे शीर्ष अधिकारी प्रेस के सवालों का जवाब देते हैं. अमरीकी राष्ट्रपति काफ़ी नियमित प्रेस कॉन्फ़्रेंस करते रहे हैं हालांकि ट्रंप के रवैए को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं.

सिर्फ़ मोदी ही नहीं, प्रचार अभियानों, टीवी, रेडियो और होर्डिंग्स पर छाए रहने वाले सभी नेताओं को समझना चाहिए कि लोकतंत्र के हित में उन्हें जनता से ईमानदार दोतरफ़ा संवाद करना होगा.

लड़के कभी चुन्नी खींच लेते हैं कभी कुछ और’

हरियाणा में रेवाड़ी के गोठड़ा टप्पा डहीना गांव में 13 स्कूली छात्राएं सात दिन से अनशन पर बैठी हैं.

वे इस बात से नाराज़ हैं कि उनके लिए दसवीं के आगे की पढ़ाई की कोई सुविधा नहीं है. इसके लिए उन्हें ढाई-तीन किलोमीटर दूर एक स्कूल में जाना पड़ता है. उनका आरोप है कि रास्ते में उनसे अक़्सर छेड़खानी की जाती है.

इन छात्राओं के साथ उनके परिजन, गांव के लोग और सरपंच भी धरने पर बैठ गए हैं. इन सबकी मांग है कि गांव के स्कूल को अपग्रेड करके बारहवीं तक कर दिया जाए.

‘वे नक़ाब पहनकर आते हैं, चुन्नी खींचते हैं’

बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक लाइव में ओमवती ने कहा, ‘मेरा अपनी बच्चियों को पढ़ाने का मन नहीं है क्योंकि रास्ते में इनके साथ छेड़खानी होती है. लड़के कभी चुन्नी खींच लेते हैं, कभी कुछ और. ये दुबकती हुई जाती हैं. इस बार मैंने इन्हें इनकार कर दिया कि मैं तुम्हें पढ़ने नहीं भेजूंगी. पर ये पढ़ना चाहती हैं.’

सुजाता नाम की छात्रा ने बताया, ‘लड़के पीछे से बाइक पर नकाब पहनकर आते हैं, चुन्नी खींचते हैं. रास्ते में प्याऊ के मटके रखे होते हैं, हमें देखकर उन्हें फोड़ते हैं और हमारे ऊपर पानी गिराते हैं. दीवारों पर मोबाइल नंबर लिखकर चले जाते हैं. हम मीडिया के आगे हर चीज़ तो बता नहीं सकते. लिमिट होती है.’

ओमवती ने कहा, ‘हम मोदी जी से धन-दौलत नहीं मांगते. एक बारहवीं तक का स्कूल मांगते हैं बस.’

‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ के नारे का क्या मतलब है?’

पूजा ने दो-तीन साल पहले बारहवीं की पढ़ाई पूरी की थी. उन्होंने कहा, ‘इतनी धूप में पैदल चलकर देखिए. सुनसान रास्ता है. फिर बीच में लड़के कमेंट पास करते हैं. फिर मोदी जी ने ये भी लगा रखा है- बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ. क्या मतलब है इस नारे का. बंद कर देना चाहिए. क्यों यह मुहिम छेड़ रखी है?’

हालांकि शिक्षा मंत्री ने गांव के स्कूल को बारहवीं तक अपग्रेड करवाने का वादा कर दिया है. लेकिन प्रदर्शनकारी इस पर लिखित में आश्वासन चाहते हैं. पूजा कहती हैं, ‘वादे हर साल होते हैं, एक भी पूरा नहीं हुआ. गारंटी दो.’

इन छात्राओं के साथ हाल ही में बीएसएफ़ से बर्ख़ास्त किए गए तेज़ बहादुर यादव भी बैठे हुए मिले. उन्होंने कहा, ‘मैं यहां से 40-45 किलोमीटर दूर रहता हूं. यहां के सरपंच और समाज के लोगों ने मुझे यहां की समस्याओं के बारे में बताया.’

तेज़ बहादुर ने कहा, ‘दो बच्चियों की हालत पीछे देखो कितनी ख़राब है. बड़े शर्म की बात है.’

छात्राओं के परिवार के पुरुष सदस्य भी उनके साथ हड़ताल पर बैठे हैं.

नरेंद्र मोदी के तीन साल के कार्यकाल में इन पांच फैसलों से बढ़ी जनता की मुश्किलें

नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में महंगाई की मार सबसे ज्यादा रेल यात्रियों पर पड़ी।

भारतीय जनता पार्टी ने आज (16 मई) के ही दिन तीन साल पहले 2014 में लोक सभा में पूर्ण बहुमत हासिल किया था। तीन दशकों बाद देश में किसी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था।  इस प्रचंड जीत के बाद नरेंद्र मोदी 26 मई को शपथ ग्रहण कर देश के प्रधानमंत्री बने। चुनाव से पहले भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर नरेंद्र मोदी ने जनता से जो वादे किए थे उनकी वजह से उनसे लोगों की उम्मीदें बहुत बढ़ गयी थीं। चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में जनता से 60 महीने मांगे थे। अब इन 60 में से 36 महीने पूरे होने वाले हैं। आइए देखते हैं इस दौरान मोदी सरकार ने ऐसे कौन से फैसले लिए जिनसे सीधे-सीधे जनता की जेब पर असर पड़ा।

1- रेल का किराया- भारतीय रेलवे को भारत की जीवनरेखा कहा जाता है। नरेंद्र मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में महंगाई की मार सबसे ज्यादा इसी पर पड़ी। चाहे वो फ्लेक्सी फेयर सिस्टिम हो (जिसे बाद में वापस लिया गया) या प्रीमियत तत्काल रेल या साधारण यात्रा  मोदी सरकार के दौरान महंगी हुई है।

2- कच्चे तेल की कीमतें कम होने का कोई फायदा नहीं- केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आते ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 135 डॉलर प्रति बैरल से 35 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गईं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके लिए खुद को “भाग्यवान” भी बताया था। पेट्रोल और डीजल की कीमतें केंद्र सरकार डीरेगुलेट कर चुकी है। यानी पेट्रोल-डीजल की कीमत बाजार भाव के अनुसार घटनी-बढ़नी चाहिए लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में 10 गुना कम होने के बावजूद आम भारतीयों के भाग्य में कम कीमत देना नहीं लिखा था। केंद्र सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर टैक्स बढ़ा दिया जिसकी वजह से उनकी कीमत कच्चे तेल की कीमत गिरने से पहले वाली दर के आसपास ही बनी रहीं। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने इस कदम के लिए सफाई देते हुए कहा था कि इससे इकट्ठे पैसे को इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में खर्च किया जाएगा। लेकिन बहुत से लोग सरकार के इस फैसले से ठगा हुआ महसूस कर रहे थे।

3- छोटी बचत, पीएफ पर ब्याज दर में कटौती- संगठित क्षेत्र में नौकरी करने वाले ज्यादातर भारतीयों के लिए बचत खाता, पीपीएफ, किसान विकास पत्र पैसे बचाने के सबसे लोकप्रिय साधन हैं। मोदी सरकार ने इन सभी खातों में मिलने वाले ब्याज की तिमाही समीक्षा करने का फैसला लिया है। अप्रैल से जून 2017 तक की तिमाही के लिए केंद्र सरकार ने बचत खाता, पीपीएफ और किसान विकास पत्र पर मिलने वाले ब्याज पर पिछली तिमाही के मुकाबले 0.10 प्रतिशत की कटौती कर दी।

फिर आया Nokia 3310: 30 दिन चलेगी बैटरी, बिना इंटरनेट होगा कैशलेस ट्रांजेक्शन

2000-07 तक का वह दौर था जब हमारे बीच नोकिया की 3310 को अपने हाथों में लेकर चलना स्टेटस सिंबल से कम नहीं था. चंद ही दिनों में यह मोबाइल हमारे बीच इतनी लोकप्रिय हो गई थी, जैसे यह हमारे परिवार का हिस्सा हो गई थी.

नई दिल्ली: भारतीयों के दिलों पर कई साल तक राज करने के बाद मार्केट से अचानक गायब हो हुआ मोबाइल फोन नोकिया 3310 एक बार फिर हमारे बीच लौट आई है. फिनलैंड की कंपनी नोकिया ने 3310 भारत में लांच कर हमें मोबाइल का मतलब समझाया था. 2000-07 तक का वह दौर था जब हमारे बीच नोकिया की 3310 को अपने हाथों में लेकर चलना स्टेटस सिंबल से कम नहीं था. चंद ही दिनों में यह मोबाइल हमारे बीच इतनी लोकप्रिय हो गई थी, जैसे यह हमारे परिवार का हिस्सा हो गई थी. वो कहते हैं न कि हम जब कभी मुश्किल में होते हैं तो परिवार को याद करते हैं. ठीक वैसे ही जब यात्रा में हों या गांव-कस्बे में, जब कभी मुश्किल में पड़ते तो हम झट से पॉकेट से 3310 मोबाइल निकालकर मदद के लिए अपने किसी परिचित को कॉल लगा देते थे. कुछ साल पहले नोकिया ने 3310 को बंद कर दिया था. अब एक बार फिर से नोकिया का 3310 लांच हुई है.

इस फोन का भारत में लोग कितनी बेसब्री से इंतजार कर रहे थे इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है सोशल नेटवर्किंग साइट ट्विटर पर यह Nokia 3310 टॉप ट्रेंड में है.

इस बार नोकिया ने 3310 को चार रंगों में लांच किया है. दिलचस्प बात यह है कि 3310 की कीमत भी 3310 रुपए रखी गई है. इस मोबाइल का लुक बेहद प्यारा है. देखते ही इसे हाथ में लेने की ललक होती है. हालांकि इस बार नोकिया 3310 ज्यादा फीचर्स के साथ लांच किया गया है.

-इस फोन की बैटरी 30 दिनों यानी एक महीने तक चलेगी.
-नोकिया 3310 भीम ऐप (BHIM) से लैस होगा. यानी इस फोन में बिना इंटरनेट कनेक्शन के भी आप कैशलेस ट्रांजेक्शन सेवा से जुड़ सकेंगे.
-फोन में 2 मेगापिक्सल का रियर कैमरा है.
– फोन में एमपी3 प्लेयर, एफएम रेडियो है.
– इसमें  2.4 इंच की QVGA डिस्प्ले, 1200 mAh की बैटरी, न्यूमेरिक कीबोर्ड, 16 एमबी स्टोरेज जिसे 32 जीबी तक माइक्रोएसडी कार्ड के जरिए बढ़ाया जा सकता है.
– फोन में 3.5 mm की हेडफोन जैक है. एक एलईडी फ्लैश लाइट भी है.
– फोन में सांप वाला गेम भी है.
-नोकिया  3310 में डुअल सिम सपोर्ट है.

मालूम हो कि नोकिया ने साल 1996 में पहला मोबाइल फोन लांच किया था. हालांकि साल 1982 में नोकिया ने एक मोबाइल फोन लांच कयिा था, जिसका नाम Mobira senator लांच किया था, जिसका वजन 10 किलोग्राम था. 3310 के चलते नोकिया को 9 बार भारत का सबसे पॉवरफुल ब्रांड माना गया.

भारत के 12वीं के छात्र ने बनाया दुनिया का सबसे छोटा सैटेलाइट, NASA करेगा लांच

तमिलनाडु के पलापटी में रहने वाले 12वीं के छात्र ने दुनिया का सबसे छोटा सेटेलाइट बनाया है. रिफत शारूक के बनाए इस सैटेलाइट को नासा अगले महीने 21 जून को लांच करेगा.

ई दिल्ली: भारतीय बच्चों की प्रतिभा का लोहा दुनिया भर में माना जाता है. इस उदाहरण एक बार फिर से देखने को मिला है. तमिलनाडु के पलापटी में रहने वाले 12वीं के छात्र ने दुनिया का सबसे छोटा सेटेलाइट बनाया है. रिफत शारूक के बनाए इस सैटेलाइट को नासा अगले महीने 21 जून को लांच करेगा. नासा पहली बार किसी भारतीय छात्र के एक्सपेरियमेंट को अपने मिशन में शामिल कर रहा है.  यह सैटेलाइट सबसे छोटा होने के साथ सबसे कम वजन का भी है. यह महज 64 ग्राम का है. 18 वर्षीय छात्र ने इस सैटेलाइट का नाम ‘कलामसैट’ रखा है. रिफत का कहना है कि उसने इस यह नाम पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से प्रेरित होकर रखा है.

शारूक का चयन ‘क्यूब्ज इन स्पेस’ नामक कार्यक्रम के जरिए हुआ है. नई प्रतिभाओं की तलाश के मकसद से इस कार्यक्रम को नासा और ‘आई डूडल लर्निंग’ ने आयोजित किया था. इस कार्यक्रम में 57 देशों के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था. भारतीय छात्र का बनाया हुआ यह सैटेलाइट 86 हजार मॉडलों में से चुना गया है. रिफत के अलावा दुनिया के 80 और छात्रों के मॉडल चुने गए.

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक शारूक का बनाया हुआ यह सैटेलाइट अंतरिक्ष के सूक्ष्म-गुरुत्वाकर्षण (माइक्रो-ग्रेविटी) वाले वातावरण में करीब 12 मिनट तक संचालित होगा. इस दौरान यह 3-डी प्रिंटेड कार्बन फाइबर के कार्य-निष्पादन (परफॉर्मेंस) को प्रदर्शित करेगा.

दिलचस्प बात यह है कि रिफत ये सैटेलाइट बेकार चीजों से तैयार किया है. रिफत ने इसे अपने दोस्तों के साथ मिलकर तैयार किया है. इसे बनाने में अब्दुल कासिम, तनिष्क द्वेवदी, विनय भारद्वाज और गोगी नाथ ने रिफत की मदद की. 64 ग्राम की वेबसाइट बनाने में दो साल का वक्त लगा और एक लाख रुपए खर्च हुए.

लालू यादव के ठिकानों पर आयकर का छापा, 1000 करोड़ की बेनामी लैंड डील मामले में छापे

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक 1000 करोड़ की बेनामी लैंड डील मामले में यह छापेमारी की गई है.

नई दिल्ली: लालू यादव के दिल्‍ली, गुड़गांव समेत 22 ठिकानों पर आयकर विभाग ने छापा मारा है. पीटीआई के मुताबिक सूत्रों के मुताबिक 1000 करोड़ की बेनामी लैंड डील मामले में यह छापेमारी की गई है. इसके साथ राजद नेता और लालू के करीबी प्रेम चंद गुप्‍ता के ठिकानों पर भी छापे मारे गए हैं. इससे पहले मंगलवार सुबह कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता पी चिदंबरम और उनके बेटे कार्ति के आवास पर सीबीआई ने छापा मारा है. सूत्रों के मुताबिक आईएनएक्‍स मीडिया समूह को विदेशी निवेश पर क्‍लीयरेंस देने के मामले में यह छापेमारी की गई है. सोमवार को इस मामले में एफआईआर दर्ज की गई थी. चिदंबरम के घर समेत चेन्‍नई में 14 जगहों पर छापे मारे गए हैं. सूत्रों के मुताबिक कथित रूप से कार्ति चिदंबरम पर आरोप है कि उनकी कंपनी ने आईएनएक्‍स मीडिया समूह को विदेशी निवेश के मामले में क्‍लीयरेंस दिलाने की एवज में 2008 में रिश्‍वत ली थी. पी चिदंबरम कांग्रेस के दिग्‍गज नेताओं में से एक हैं और मनमोहन सिंह सरकार में वित्‍त मंत्री और गृह मंत्री रह चुके हैं. उस दौरान आईएनएक्‍स मीडिया पर पूर्व मीडिया टायकून पीटर मुखर्जी और पत्‍नी इंद्राणी मुखर्जी का स्‍वामित्‍व था जोकि अपनी बेटी शीना बोरा की हत्‍या के मामले में जेल में हैं.

सीबीआई सूत्रों के मुताबिक वे इस मामले की जांच कर रहे हैं कि कार्ति चिदंबरम की कंपनी को आईएनएक्‍स मीडिया समूह से 10 लाख रुपये मिले थे. उसके बदले में कार्ति की कंपनी ने आईएनएक्‍स मीडिया को चार करोड़ रुपये पाने के लिए एफआईपीबी यानी फॉरेन एक्‍सचेंज प्रमोशन बोर्ड क्‍लीयरेंस दिलाने में मदद की थी. वास्‍तव में आईएनएक्‍स को इसके जरिये चार करोड़ नहीं बल्कि 305 करोड़ रुपये मिले थे.

सीबीआई की छापेमारी पर प्रतिक्रिया देते हुए पी चिदंबरम ने कहा कि इसके माध्‍यम से सरकार मेरी आवाज दबाने की कोशिश कर रही है. लेकिन इसके बावजूद मैं यह कहना चाहूंगा कि मैं सरकार के खिलाफ लिखता और बोलता रहूंगा. इस संबंध में कांग्रेस के प्रवक्‍ता टॉम वडक्‍कन ने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, ”यह लोगों का ध्‍यान आकर्षित करने के लिए और एक धारणा विकसित करने के लिए किया गया है.”