बड़े से बड़ा पुलिस ऑफिसर भी तुरंत सुनेगा आपकी बात, बस जान लें ये 7 बातें

Tuesday, March 27th, 2018, 5:54 pm

> फर्स्ट इंफॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) एक रिटन स्टेटमेंट होता है। कॉग्निजेबल ऑफेंस होने पर पुलिस एफआईआर लिखने के बाद इन्वेस्टिगेशन शुरू करती है। कॉग्निजेबल ऑफेंस वह होता है, जिसमें पुलिस बिना वारंट के संबंधित व्यक्ति को अरेस्ट कर सकती है। ऐसे में पुलिस को कोर्ट से भी किसी तरह की परमीशन नहीं लेना होती।

> वहीं नॉन कॉग्निजेबल ऑफेंस होने पर एफआईआर लिखने से पहले पुलिस को मजिस्ट्रेट की परमीशन लेना होती है। बिना वारंट के पुलिस गिरफ्तारी नहीं कर सकती।

शिकायतकर्ता को होता है कॉपी लेने का अधिकार,

> ऐसा जरूरी नहीं है कि सिर्फ पीड़ित व्यक्ति ही एफआईआर लिखवाए। कोई भी ऐसा व्यक्ति जिसे घटना की जानकारी है वे एफआईआर दर्ज करवा सकता

है। यदि किसी पुलिस अधिकारी को किसी घटना की जानकारी है तो वह खुद भी एफआईआर दर्ज करवा सकते हैं। वहीं एफआईआर लिखने में देरी नहीं की जा सकती। उचित कारण होने पर ही एफआईआर लिखने में देरी हो सकती है।

> शिकायतकर्ता को एफआईआर की एक कॉपी लेने का अधिकार होता है। पुलिस इसके लिए मना नहीं कर सकती। इसके एवज में किसी तरह का शुल्क भी शिकायतकर्ता से नहीं लिया जा सकता।

> वहीं एफआईआर लिखने के बाद यह पुलिस ऑफिसर की ड्यूटी होती है कि एफआईआर में जो लिखा गया है, वो शिकायतकर्ता को पढ़कर सुनाया जाए। शिकायतकर्ता इससे सहमत हुआ तो वो इस पर हस्ताक्षर कर सकता है। पुलिस अधिकारी एफआईआर में खुद कुछ टिप्पणी नहीं कर सकते। वे किसी पॉइंट को हाइलाइट भी नहीं कर सकते।

> यदि कोई भी पुलिस अधिकारी एफआईआर लिखने से मना करता है तो शिकायतकर्ता क्षेत्र के सीनियर ऑफिसर को इसकी शिकायत कर सकता है। वहां से भी समस्या का समाधान न हो तो मजिस्ट्रेट के पास शिकायत की जा सकती है।

मजिस्ट्रेट पुलिस को एफआईआर लिखने के लिए आदेश दे सकते हैं।

> एफआईआर में घटना की पूरी जानकारी लिखवाना होती है, जैसे अपराध कब हुआ, कहां हुआ, समय क्या था, किसने किया, किसने देखा, क्या नुकसान हुआ आदि। एफआईआर दर्ज होने के शुरुआती एक हफ्ते में प्रारंभिक जांच पुलिस को पूरी करना जरूरी होता है।