चरमपंथ के ख़िलाफ़ सेना का साथ क्यों दे रहे कश्मीरी?

Thursday, August 3rd, 2017, 5:46 pm

पिछले दो महीनों से कश्मीर घाटी में जारी हिंसक विरोध प्रदर्शनों को रोकने की कार्रवाइयों में खासा वृद्धि हुई है. खासकर उस दक्षिणी हिस्से में जिसे नई पीढ़ी के चरमपंथ का गढ़ माना जाता है.
जून-जुलाई 2017 के महीने में लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख अबू दुजाना और लश्कर के ही एक और शीर्ष कमांडर बशीर लश्करी समेत कश्मीर घाटी में लगभग 36 चरमपंथी मारे गए, इनमें हिज़बुल मुज़ाहिद्दीन के कई शीर्ष चरमपंथी भी शामिल थे. इस सूची में नियंत्रण रेखा पर घुसपैठ की कोशिश में मारे गए चरमपंथी शामिल नहीं हैं.

एक ओर पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां चरमपंथ को बेअसर करने में मिली कामयाबी का जश्न मना रही हैं, तो वहीं दूसरी तरफ़ अलगाववादियों को यह पसंद नहीं आ रहा. जेल में बंद आसिया अंद्राबी के नेतृत्व वाले महिलाओं के कट्टरवादी संगठन दुख़्तरान-ए-मिल्लत ने मारे गए चरमपंथियों की संख्या में वृद्धि पर खुलकर अपनी चिंता व्यक्त की है.

दुख़्तरान-ए-मिल्लत की महासचिव नाहिदा नसरीन ने 22 जून को एक बयान में कहा, “मारे जा रहे चरमपंथियों की संख्या बढ़ गई है. हम आज़ादी के समर्थक और चरमपंथी गुटों से आग्रह करते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में मुजाहिदीनों की मौत के पीछे कमियों को तलाशें और साथ ही गोलीबारी के दौरान उन्हें बचाने की कोशिश में लगे युवाओं की पहचान करें.

पुलिस और सेना समेत अन्य सुरक्षाकर्मियों को चरमपंथियों की मौज़ूदगी की अधिक से अधिक सटीक सूचनाएं मिल रही हैं. जहां एक ओर यह उनके संबंधित ख़ुफ़िया विभागों की दक्षता को दिखाता है तो वहीं दूसरी तरफ़ एक कठोर सच को भी ज़ाहिर करता है कि अब पहले की तुलना में कश्मीर के लोग सुरक्षाबलों की मदद के लिए आगे आ रहे हैं. दुख़्तरान-ए-मिल्लत का बयान यही इशारा करता है.