‘इराक में रहना ख़तरनाक है पर यहां भी तो ग़रीबी जान ले रही थी’

Thursday, March 22nd, 2018, 5:21 pm

“इराक़ में रहना ख़तरनाक है लेकिन घर पर भी तो ग़रीबी परिवार की जान ही ले रही थी”, इराक़ के मूसल में मारे गए दविंदर सिंह की पत्नी मंजीत कौर के इन शब्दों में उनकी बेबसी साफ झलक रही थी.

52 साल के दविंदर उन 39 भारतीयों में शामिल थे, जिनकी हत्या कथित चरमपंथी संगठन आईएसने इराक के मूसल में कर दी थी.

यादों को आंसुओं में समेटे मंजीत आगे कहती हैं, ” जिस दिन वो जा रहे थे, उस दिन उनकी बहन ने बहुत समझाया कि इराक़ में युद्ध चल रहा है, लेकिन उन्होंने कहा कि चिंता मत करो, कुछ नहीं होगा मुझे.”

इतना कहते ही वो आंखें बंद कर लेती हैं. पलकों से ठोकर खाकर पुरानी यादें समेटे उनके आंसू जमीन पर गिरते हैं और लगता कि उनके तमाम सपने बिखर गए हैं.

मंजीत कौर ने बताया, “वो हमेशा कहते थे कि जहां धमाके और संघर्ष हो रहा है, वो जगह उनसे काफी दूर है और उनके आसपास माहौल ठीक है. जून 2014 में जब उनसे अंतिम बार बात हुई थी तब उनका अपहरण हो चुका था पर उन्होंने हमलोगों को जानकारी नहीं दी. वो हमें परेशान नहीं करना चाहते थे. लेकिन अब वो कुछ नहीं कर सकते हैं.”

दविंदर अपने पैतृक गांव रुड़का कलां में मजदूरी करते थे. वो 200 से 250 रुपए तक एक दिन में कमाते थे लेकिन उन्हें रोज काम नहीं मिलता था.

मंजीत कौर के तीन बच्चे हैं, जिनमें से दो जुड़वा हैं. पेट पालने के लिए मंजीत गांव के एक स्कूल में सिलाई सिखाती हैं. इस काम से वो हर महीने ढाई हज़ार रुपए कमाती हैं.

एक कमरे के जर्जर मकान में रहने वाली मंजीत याद करती हैं, “उन्होंने कहा था कि वो तीन-चार साल के लिए इराक़ जा रहे हैं और वहां से आने के बाद उनका अपना घर होगा.”

“वो इराक जा सकें इसके लिए हमलोगों ने एजेंट को देने के लिए डेढ़ लाख रुपए का कर्ज लिया था. एजेंट ने दावा किया था कि वो इलाका अमरीकी सैनिकों के नियंत्रण में हैं और वहां स्थिति बुरी नहीं है.”

दविंदर 2011 में इराक़ गए थे. उस समय उनका बड़ा बेटा छह साल का था और जुड़वा बच्चे महज आठ महीने के थे.

मंजीत कहती हैं, “अपहरण होने से पहले तक वो हर महीने अपनी कमाई के 25 हजार रुपये में से ज्यादातर भेज देते थे.”

पिछले चार सालों से मंजीत की अपने पति से किसी तरह की बात नहीं हुई पर उनकी आंखों में उनके आने की उम्मीदें बरकार थीं. “जब भी मैं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से मिलती थी तो वो हमें उम्मीद नहीं खोने को कहती थीं.”

कुछ महीने पहले सरकार ने उनका डीएनए सैंपल लिया था. वो कहती हैं, “डीएनए लेते वक्त हमलोगों को कुछ नहीं बताया गया था कि वो इसे क्यों ले रहे हैं, पर गांव वाले यह अनुमान लगा रहे थे कि शायद दविंदर वहां बीमार हैं, इसलिए ऐसा किया जा रहा है.”

बच्चे की चाहत

मंगलवार को गांव की कुछ महिलाओं ने जब उन्हें सरकार की ओर से दी गई जानकारी के बारे में बताया तो वो भागती हुई अपने मायके पहुंच गईं. “मैं मौत की बात जानकर हैरान थी. मैं अपने मायके चली आई.”

वो अपने जुड़वा बच्चों में से एक की तरफ देखते हुए कहती हैं, “ये अपने पिता के आने की बात पूछता रहता था और हमलोग हमेशा ये कहते थे कि वो विदेश में रहते हैं. जब वो लौटेंगे तो उनके लिए साइकिल लेकर आएंगे. लेकिन अब वो कभी नहीं आएंगे.”

मूसल में मारे गए 39 लोगों में से 31 पंजाब से थे. बेहतर अवसरों की तलाश में पंजाबियों के विदेश जाने की चाहत जगजाहिर है. राज्य में गरीबी और नौकरियों की कमी के चलते वो युद्ध क्षेत्र में भी जाने से नहीं कतराते हैं.

जाने वालों की मजबूरियां

32 साल के संदीप कुमार का नाम भी उन 39 मृतकों की सूची में शामिल हैं. मल्सियान के नजदीक एक गांव में रहने वाले संदीप भी दिहाड़ी मजदूर थे.

अपनी चार बहनों की परवरिश के लिए वो 2012 में इराक़ गए थे. संदीप के भाई कुलदीप कुमार कहते हैं, “परिवार हर महीने पैसे का इंतजार करता था.”

संदीप के परिवार की आर्थिक स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके घर के दरवाजे में किवाड़ तक नहीं हैं.

धूरी के प्रीतपाल शर्मा भी मारे गए 39 लोगों में से एक थे. उनकी पत्नी राज रानी कहती हैं, “वो वहां 2011 में गए थे क्योंकि यहां करने को कुछ नहीं था. हमलोगों को बताया गया था कि इराक़ में बहुत पैसा है लेकिन उन्हें वहां भी कमाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी.”